भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १४ ) रन्ध्र मिलने पर विभीषण प्रहार कर सकता है, इस भीति को दूर कर शरणागत की रक्षा करना परमं धर्म है। राम ने कहा—सुना जाता है कि एक कपोत ने शरण में आये हुए शत्रु-रूप व्याध का यथान्याय अर्चन किया और अपना मांस भोजन करने की उससे प्रार्थना की । जब कि इस प्रकार शरणागत भार्याहर्ता की तिर्यक् प्राणी ने भी उपेक्षा नहीं की तो मेरे सदृश सकल धर्मों के रहस्य को जाननेवाला क्षत्रिय अपकार न करनेवाले शरणा- गत की उपेक्षा कैसे कर सकता है ? सत्यवादी महर्षि कण्डु ने शरणागत रक्षा सम्बन्धिनी गाथा गायी है— हाथ जोड़े हुए दीनता से शरण मांगते हुए शत्रु को भी आश्रितरक्षणरूप परम धर्म की सिद्धि के लिए नहीं मारना चाहिये । इतना ही नहीं आर्त हो अथवा दृप्त हो जो भी शत्रुओं के भय से शरणागत हुआ हो, भले वह शत्रु ही क्यों न हो कृतात्मा प्राणी को चाहिये कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी उसकी रक्षा करे । शरण में आया हुआ व्यक्ति यदि रक्षक की दृष्टि के सामने विनष्ट होता है तो वह अरक्षित अरक्षक का सब पुण्य लेकर चला जाता है । इस प्रकार प्रपन्न के अरक्षण से महान् दोष होता है । वह अस्वर्ग्य, अयशस्य और बलवीर्य का विनाशक है । अतः मैं कण्डु के धर्मिष्ठ, यशस्य तथा फलोदयकाल में स्वर्ग्य वचन का अवश्य पालन करूँगा । इसके अतिरिक्त मुझ परमदयालु राम का तो सर्वभूतों के लिए अभय प्रदान करना एक व्रत ही है । सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ सब प्राणियों के लिए अथच सब भूतों से भयभीत सभी प्राणियों के लिए अभय-प्रदान करना मेरा नित्य सत्सहज धर्म है । कोटि बिप्रबध लागे जाही। आये सरन तजहुँ नहि ताही ॥ भगवान् राम का कथन सुनकर आश्चर्य एवं सौहार्द से परिपूर्ण होकर सुग्रीव ने कहा—धर्मज्ञ, लोकनाथ- शिखामणे, आप सत्त्ववान् एवं सत्पथ में स्थित हैं अतः आपका ऐसा कल्याण भाषण आश्चर्यजनक नहीं है । आपका पुण्य कथन सुनकर मेरा भी अन्तरात्मा विभीषण को ग्राह्य मानने लगा । उसे शरण में लेने के विषय में पहले सबसे प्रमुख विरोधी सुग्रीव द्वारा रामसंनिधि में आनीत विभीषण के साथ राम की वैसी ही मित्रता हुई जैसी गरुड़ से इन्द्र की मैत्री हुई है । विभीषण ने राम के निकट आते ही राम के चरणों में गिरकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा—भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः । भगवन्, सब भूतों के शरण्यभूत परमपुरुष आपकी शरण में आया हूँ । राम की सत्य प्रतिज्ञा श्रीरामजी ने अभय प्राप्ति के लिए उनकी (श्रीरामजी की) पुण्यसंनिधि में समागत दण्डकारण्यवासी ऋषियों के अभिरक्षण के लिए युद्ध में राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की थी । परन्तु श्रीसीता को बिना वैर पर-प्राणों का अभिहिंसन रुचिकर नहीं हुआ । इसी लिए ऐहिक सुख और पारलौकिक निःश्रेयस के लिए शस्त्रास्त्रों को अपने निकट न रखने का निवेदन करते हुए उन्होंने एक प्राचीन इतिहास श्रीरामजी को सुनाया । श्रीरामजी ने सीता के कथन की सर्वथा अति प्रशंसा कर कहा— हे सीते, मैं अपने जीवन का त्याग कर सकता हूँ एवं लक्ष्मण सहित तुम्हारा भी त्याग कर सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता— अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् । न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ॥