भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं हैं,' किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण या वेद के भाष्यरूप में ही निर्मित हैं— “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्” । वस्तुस्थितिमूलक होने के कारण ही पुराणों में वेदविरोधी बुद्ध को भी विष्णु का अवतार माना गया है । फिर जब वेदस्वरूप तैत्तिरीय आरण्यक में वासुदेव और विष्णु की एकता का प्रमाण मिलता है तब तो भिन्नता का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिये । विष्णु का महत्त्व भी अनादि ही है । वह किसी के संसर्ग से बढ़ने लगा, यह कल्पना भी निर्मूल है । पाश्चात्यशिक्षादीक्षितों का यह भी कहना कि “इधर अवतारवाद की भावना फैलती जा रही थी उधर कई शतियों से राम का आदर्श चरित्र भारतीय जनता के सामने आ रहा था । रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ राम का महत्त्व भी बढ़ रहा था । उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता की मात्रा बढ़ने लगी । रावण पाप और दुष्टता का प्रतीक बन गया और राम पुण्यवान् और सदाचारी थे, अतः इस विकास की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की तरह राम भी विष्णु के अवतारों में गिने जाने लगे । राम तथा विष्णु की अभिन्नता की धारणा कब उत्पन्न हुई इसका ठीक समय निर्धारित करना असम्भव है । फिर भी अवतारवाद वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड में इतना व्याप्त है कि इसे उत्तरकाण्ड की अधिकांश सामग्री के पूर्व का मानना चाहिये । अतः बहुत संभव है कि पहली शती ई० पू० से ही रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी थी । रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत तथा वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों को तालिका में दाशरथि राम का भी नाम आया है ।” सरासर धोखा देना है । वस्तुतः यह कथन नितान्त भ्रम एवं दुरभिसन्धि पूर्ण है, कारण, वेदों तथा उपनिषदों में अनादिकाल से ही राम के अवतार का तथा उनकी उपासना का वर्णन है । जब मन्त्रों, ब्राह्मणों, उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों में परमात्मा का सगुण साकार होना वस्तुस्थिति है तब अवतार केवल भावना की वस्तु कैसे कहा जा सकता है ? पाश्चात्य वातावरण में पले हुओं का कथन केवल प्रतिज्ञामात्र है, उसमें कोई हेतु नहीं है । हेतु के बिना अनुमान अकिञ्चित्कर ही होता है। जैसे धूम का अग्नि से कार्यकारणभाव होने से निश्चित व्याप्ति है, तभी धूम से वह्नि का अनुमान होता है । इस प्रकार राम विष्णु के अवतार नहीं हैं, इसकी किसी हेतु के साथ व्याप्ति नहीं है। विष्णु और राम दोनों ही पाश्चात्यों एवं उनके अनुयायियों के लिए अप्रत्यक्ष ही हैं। फिर, उनका भेद या अभेद भी अप्रत्यक्ष ही है । अप्रत्यक्ष साध्य के साथ साधन की व्याप्ति का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है ? जिन ग्रन्थों के आधार पर विष्णु एवं राम का अस्तित्व सिद्ध होता है, उन्हीं से ही उनका अभेद सिद्ध होता है । अतएव जब प्रामाणिक वेदों, आर्ष रामायण, महाभारत इतिहासों से राम की ब्रह्मरूपता सिद्ध है, तब तो तद्विरुद्ध नगण्य जनों की निराधार कल्पना का कोई महत्त्व हो ही नहीं सकता । प्रामाणिक आधार के बिना केवल वीरता एवं लोकप्रियता के कारण ही किसी को अवतार नहीं माना जाता । सिद्धान्ततः महाभारत, भागवत तथा अन्य पुराणों की अपेक्षा भी रामायण अति प्राचीन तथा प्रामाणिक सद्ग्रन्थ है । अतएव कृष्ण से प्रथम ही राम का अवतार प्रसिद्ध है । इसी लिए संसार में राम का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है । भारत में तो बच्चे-बच्चे आस्तिक नास्तिक सभी की जिह्वा पर राम का नाम प्रख्यात है । कृष्ण की कथाओं में भी आता है कि कृष्ण की माता यशोदा कृष्ण को राम की कथा सुना रही थीं, जब सीताहरण की बात आयी तो सोते-सोते कृष्ण बोल पड़े “सौमित्रे क्व धनुर्धनुर्धनुरिति ।” वस्तुतः जब वेद, उपनिषद् तथा रामायण से अवतारवाद सिद्ध है, तब वह भावनामात्र कैसे हो सकता है ? यदि वेद आदि प्रमाण नहीं तो पाश्चात्य कल्पक जैसे लोगों के नगण्य वचनों का ही क्या प्रामाण्य हो सकता है ? कुछ व्यक्तियों की तुच्छ कल्पनाओं के बल पर वेद, उपनिषद्, महर्षियों के रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण तथा श्रीमद्भागवत को झूठा मान लेना सर्वथा अनुचित है ।