भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( २४ ) वस्तुतः जगज्जननी राम के हृदय को पहचानती थीं । पहले उन्होंने वन में छोड़कर लौटते हुए लक्ष्मण से कहा था— वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धामपि यत्समक्षम् । मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य किं तत् सदृशं कुलस्य ॥ (रघुवंश १४।६१) हे लक्ष्मण ! तुम मेरी तरफ से उस राजा से यह कहना कि आपके सामने ही मेरी अग्निपरीक्षा एवं अग्निशुद्धि हुई थी, फिर भी आपने लोकापवाद-श्रवण के कारण जो मेरा परित्याग किया है क्या यह आपके कुल एवं शास्त्रानुशीलन के सदृश है ? परन्तु दूसरे ही क्षण सीता ने कहा नहीं-नहीं प्रभो ! आप तो प्राणिमात्र के हितैषी एवं कल्याण की कामना करनेवाले हैं, फिर मेरे सम्बन्ध में आपकी अन्यथाबुद्धि कैसे हो सकती है । वज्रोपम, असह्य श्रीचरणविप्रयोगरूप दुःख तो मेरे ही पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है । पतिव्रतामुकुटशिरोमणि सीताजी ने आगे कहा कि मैं प्रसव के पश्चात् सूर्य में दृष्टि लगाकर ऐसी तपस्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्त्ता हों और फिर कभी ऐसा विप्रयोग न हो । श्रीराम ने सीता को वन भेजकर स्वयं तपस्या करते हुए ग्यारह हजार वर्षों तक अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए यागादि के लिए विहित होने पर भी दूसरा परिणय नहीं किया । सुवर्णमयी सीता को ही अपने दक्षिणाङ्क में बैठाकर अश्वमेधादि बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया था । इस प्रकार श्रीराम ने नीति के साथ ही साथ पूर्णरूप से प्रीति का परिपालन किया था । श्रीराम ने अनन्त अद्भुत अनुराग के साथ ही सीता को वनवास देकर, सीता को भी अवसर दिया कि वे महर्षियों के मुखार- विन्द से अध्यात्म-चर्चा श्रवण कर सकें और समाधिनिष्ठ होकर आध्यात्मिक उच्च-स्थिति की परमार्थ-साधना में प्रतिष्ठित हों और स्वयं भी विषयविमुख होकर ब्रह्मनिष्ठा का सम्पादन कर सकें । इस प्रकार प्रजारञ्जन के साथ-साथ परमार्थ साधन भी सम्पन्न हो । सीता के निर्मल चरित्र की एक झलक वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के ९४वें सर्ग के अनुसार राम ने अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग से महामुनि, राजा, नैगम, वैदिक, शब्दविद्, वृद्ध, द्विजाति सब श्रेणियों के विशेषज्ञों को निमन्त्रित कर उनकी महती सभा में कुश और लव को रामायण का गान करने के लिए आमन्त्रित किया । कुश और लव के अतिमानुष मधुर गन्धर्वस्वर से सभी श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये, मुनिगण एवं पार्थिव-गण बारम्बार चक्षु से पान करते हुए से उन दोनों बालकों, कुश और लव को बारम्बार देखते हुए आपस में कह रहे थे कि ये दोनों इस तरह राम के समान लगते हैं जैसे सूर्यबिम्ब से दूसरा सूर्यबिम्ब ही उदित हुआ हो । यदि ये दोनों बालक जटा और वल्कलधारी न होते तो राघवेन्द्र श्रीराम और इन दोनों बालकों में कोई भेद अवगत न होता । उत्तरकाण्ड के ९५ वें सर्ग में कहा गया है कि राम ने बहुत दिनों तक परम शुभ गीत को मुनियों, राजाओं एवं सुग्रीव, हनुमान् आदि के साथ सुना और उस गानप्रसङ्ग में ही कुश और लव को सीता के पुत्र रूप में जान लिया । उपर्युक्त प्रकरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माणकाल राम का सिंहासनारूढ़ होने का ही काल था, क्योंकि राम द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर ही कुश और लव द्वारा इसका गान हुआ था, अतः पूर्ण निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि "इसका निर्माण काल ई० पू० दूसरी शती कदापि नहीं हो सकता ।"