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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 28

ऐसे अवसरों पर रावण में श्रीसीता के सामने स्थित रहने की हिम्मत नहीं रहती थी। यह कोई कवि- कल्पना नहीं अपितु तु महर्षि की समाधिभाषा की सत्य वाणी है। वहीं कुछ क्षणों के पश्चात् जब राक्षसियों ने सीता को यह समाचार सुनाया कि हे सीते ! जो वानर आपके पास आया था, वह पकड़ लिया गया और उसकी पूंछ में घृत और तेल में सने वस्त्र लपेट कर आग लगा दी गयी । जब सीता ने यह समाचार सुना तो उन्होंने अग्नि से कहा, अग्निदेव ! यदि मैंने समुचित रूप से पति-शुश्रूषा, तपस्या तथा पातिव्रत्य धर्म का पालन किया है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ । सीता के आदेशानुसार दहनशील अग्निदेव परम शीतल हो गये । श्रीहनुमान् को आश्चर्य हो रहा था कि मेरी पुच्छाग्नि से सम्पूर्ण लङ्का भस्मीभूत हो रही है, परन्तु मेरी पूंछ में तो उष्णता का लेश भी नहीं प्रतीत होता है। प्रत्युत दहनशील अग्निदेव मुझे हिम से अधिक सुशीतल प्रतीत हो रहे हैं। हनुमान् ने यह निश्चय किया था कि यह महाशक्ति सीता के तप एवं त्याग तथा पातिव्रत्य का ही प्रभाव है। जो सीता अपने प्रभाव से दाहक अग्नि को ठंडा कर सकती थी वह अपने तेज से रावण की अवश्य ही भस्म कर सकती थी। साध्वी सीता के विरोधी कुटिल समाज ने भी उनका भक्त होकर पश्चात्ताप की अश्रुधाराओं से अपने कल्मषों को धो डाला। यह भी महर्षि वाल्मीकि की लोकोत्तर सुमधुर कृति की कुशलता। वे अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल हुए और यह थी श्रीरामचन्द्र की नीति जिसके फलस्वरूप ये घटनाएं घटित हुईं। जो काम किसी दण्डविधान से कभी भी सम्भव नहीं था वह उनकी नीति से अनायास सुसम्पन्न हुआ। फिर तो वसिष्ठजी ने भी अपनी तपस्या एवं योगबल के प्रभाव से सत्य-वस्तुका साक्षात्कार करके जनता को सीताचरित्र की निर्मलता का ज्ञान कराया। त्रिजटा एवं विभीषण की पत्नी ने भी सीता के परम-पवित्र चरित्र का बखान किया। अन्त में परमानन्द सच्चिन्मयी पराम्बा सीता का अपने परम दिव्यरूप से महामहिम वैभवशालिनी माता धरादेवी के अङ्क में प्रत्यक्ष प्राकट्य भी सबकी भ्रान्तियों को मिटाकर उनकी परम उपास्यता का प्रमाण बना। श्रीसीता रामचन्द्र की छाया थी। रामरूप भानु की प्रभा एवं रामरूप चन्द्र की चन्द्रिका थी। रामरूप ईश्वर की महाशक्तिरूपा प्रकृति थीं। आनन्दसिन्धु श्रीराम के, माधुर्यसारसर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी थी। बहिराङ्ग दृष्टि से ही राम-सीता का विप्रयोग सम्भव था, अन्तरङ्ग दृष्टि से तो यह विप्रयोग कभी सम्भव न था। इसी लिए जैसे लङ्का में सीता की छाया ही रह सकी थी वैसे वनवास में भी छाया मात्र ही थी। वस्तुतः तो अमृत से जैसे उसकी मधुरिमा का पार्थक्य असम्भव है, वैसे ही आनन्दसिन्धु राम की माधुर्यसार-सर्वस्वभूता सीता का भी पार्थक्य असम्भव ही था। परन्तु वह काल्पनिक विप्रयोग भो राम के लिए असह्य वेदना का विषय था। अपने हाथों को राम निष्करुण कहते थे। हे हस्त ! तुम आसन्नप्रसवा सीता के निर्वासन में दक्ष राम के हस्त हो, अतः तुममें करुणा कैसे हो सकती हैं। परन्तु स्नेह एवं प्रेम के उद्वेग में राम ने कर्तव्य से विचलित न होने की प्रतिज्ञा ले रखी थी। वे किसी भी स्नेह, दया या सुख के मोह में पड़कर लोकाराधन, प्रजारञ्जन, के कार्य से कैसे विमुख हो सकते थे एवं उन्होंने सीता का भी इसी में हित समझा था और वह हुआ भी। इस कठोरता का आश्रयण किये बिना महर्षि वाल्मीकि का समागम नहीं हो सकता था। और न ही उनके द्वारा विश्वपावन रामायण-महाकाव्य का निर्माण ही सम्पन्न हो पाता। इसके अतिरिक्त सीता के सुपुत्र लव-कुश इस प्रकार के संस्कारी विद्वान्, बलवान्, धनुष्मान्, कीर्तिमान् तथा प्रति- भावान् नहीं बन सकते थे। सीता का कष्ट राम का ही कष्ट था। स्वयं राम ने ही सीता को वनवास देकर स्वयं को कष्ट में डालकर सीता के निर्मल, निष्कलङ्क, परमपवित्र उज्ज्वल चरित्र को संसार के सामने उपस्थित किया था। परम सानुक्रोश होते हुए भी राम निरनुक्रोश से बन गये थे।