भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

उनके सामने उपस्थित हो जाता था। कितना सुन्दर, सत्य, सरल एवं हृदयस्पर्शी था वह चरित्र-चित्रण ? उसे सुनकर सबको आश्चर्य होता था। लोग बालकों के गान से प्रभावित होकर उन्हें बहुत कुछ देना चाहते थे, किन्तु वे बालक कुछ लेते न थे । यह समाचार भगवान् राम के दरबार में भी जा पहुँचा। वहाँ भी सबको उस आश्चर्यजनक चरित्रचित्रण के श्रवण-रसास्वादन की उत्सुकता हुई । अश्विनीकुमारों के तुल्य सुभग सीतापुत्रों ने राजर्षि-कुमारों के रूप में वहाँ भी अपने मधुर स्वर, संगीत-सौष्ठव तथा सौम्य सुन्दर दिव्य आकृति से सभी को प्रभावित कर दिया । उनके रामायण-गान से राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, वसिष्ठादि महर्षि एवं अमात्यवर्ग आदि सभी मोहित हो उठे । श्रीरामचन्द्र ने रामायण-गान के अन्त में लक्ष्मण को आदेश दिया कि इन बालकों को शतभार सुवर्ण एवं रत्न प्रदान किये जायँ, परन्तु उन्होंने तो परमनिःस्पृहरूप से स्पष्ट कहा कि हम लोग कन्द-मूल-फलाशी, वल्कलवसनधारी आश्रम- वासी हैं, हमें आपके सुवर्ण-रत्नों की अपेक्षा नहीं है। यदि आप लोगों की इच्छा हो तो हम लोग रामायण श्रवण करा सकते हैं फिर विशेष रूप से रामायण श्रवण का प्रबन्ध किया गया । संसार के सभी गण्य-मान्य ऋषि-महर्षि, राजर्षि, चातुर्वर्ण्य प्रजा के विशेष प्रतिनिधि एवं देव, असुर, गन्धर्व सभी वहाँ उपस्थित हुए । लोकोत्तर सौन्दर्य, अद्भुत वेदवेदाङ्ग-पाण्डित्य, दिव्य-वीणावादन और मनोहर स्वर से गायन, परम निःस्पृहता एवं अद्भुत त्याग ने सबके मन को वश में कर लिया। ऊँचे से ऊँचे गुण भी सस्पृहता से फीके पड़ जाते हैं । सस्पृह की अच्छी से अच्छी बातों पर भी लोगों को आदर एवं विश्वास नहीं होता, परन्तु जो वक्ता निःस्पृह एवं त्यागी होता है उसी का जनता पर समुचित प्रभाव पड़ता है । फिर भी यहाँ तो कहना ही क्या है ? निःस्पृह परमविरक्त महर्षि की ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्यक्ष दृष्ट “सत्य शिव सुन्दर” रामायण महाकाव्य का निःस्पृह राजर्षिकुमारों द्वारा गायन सुनकर सबको वर्णित घटना के सम्बन्ध में पूर्ण विश्वास हो गया। स्थाली-पुलाक-न्याय से सम्पूर्ण चरित्र की सत्यता में सबको विश्वास हो गया । अयोध्याकाण्ड की सत्य घटनाओं को सुनकर अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लङ्का काण्डों के चरित्र-श्रवण की सबको उत्कट उत्कण्ठा हुई । सीताचरित्र की जिज्ञासा भी जागरूक थी ही । सभी ने सत्य घटनाओं को मन्त्रमुग्ध की भाँति सुना और श्रद्धा तथा विश्वास से भगवती सीता के परम पवित्र चरित्र की प्रशंसा की । उसमें प्रधानरूप से सीता- चरित्र का वर्णन था, परन्तु पतिव्रता सीता का चरित्र जबतक उनके पति भगवान् के चरित्र का वर्णन न होता, तबतक वह अपूर्ण ही रहता, अतः उसमें रामचरित का भी वर्णन किया गया । यह वर्णन राजकीय प्रचारमात्र न था, न किसी राज्याश्रित कवि की काव्य-कल्पना थी, किन्तु यह थी राज्याश्रय से दूर रहकर, राजान्न से बचकर, कन्द-मूल, फल तथा वल्कल वसन पर निर्भर रहनेवाले तपोनिष्ठ, समाधिसम्पन्न, त्रिकालज्ञ महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि की समाधिभाषा, जिसका गान कर रहे थे उन महर्षि के ही परम- प्रिय शिष्य, परम विद्वान्, परमत्य़ागी, वनवासिनी, वनदेवी के पुत्र लव और कुश । ऐसी स्थिति में जनता का सुस्थिर विश्वास क्यों न होता और कुटिल हृदयों के भी काले कल्मष उससे क्यों न घुल जाते । सभी के हृदय पिघल गये, कण्ठ गद्गद हो गये, अङ्ग रोमाञ्च से कण्टकित हो उठे, आँखों से आनन्दाश्रु एवं शोकाश्रु की धाराएँ बह निकलीं । राम भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न एवं माताएँ परिवार के अन्य लोग प्रेम-समुद्र में निमग्न हो गये । वसिष्ठादि महर्षिगण भी प्रेमोद्रेक में अधीर हो उठे ! महाशक्ति भगवती चिदानन्दस्वरूपा सीता के उज्ज्वल चरित्र ने सबके अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा को उद्योतित कर दिया । महर्षि वाल्मीकि की रामायण से सबको स्पष्ट विदित हुआ कि सीता के असाधारण तेज के सामने रावण का प्रभाव सर्वथा नगण्य था । श्रीसीता अपने अखण्ड-पातिव्रत्य तेज के प्रताप से रावण की लङ्का में रहती हुई भी रावण को तृणतुल्य समझती थीं और रावण के साथ बात करते समय सिँही के समान निर्भीकतापूर्वक वाणी में श्रीसीता ने कहा था, दुष्ट रावण, सावधान, मेरे भगवान् राम का सन्देश एवं आदेश न होने और अपनी तपस्या के पालन करने के अभिप्राय से मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं कर रही हूँ ।