भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३३८ रामायणमीमांसा द्वादश. देवताओं की अनेक पौराणिक कथाएँ वर्णित हैं । रावण का वैश्रवणविजय तथा वैश्रवण-पुत्र के विल्मनरंज (विमान) का रावण का वाहन बन जाना वर्णित है । अनन्तर रावण विष्णु के अवतारों से युद्ध करता है । सेरतकाण्ड के अनुसार वासुकि तथा श्री अवतार लेने के उद्देश्य से पृथिवी की ओर प्रस्थान करते हैं । मार्ग में रावण उनसे युद्ध करता है । विष्णु तथा वासुकि भाग कर दशरथ के पुत्रों के रूप में प्रकट होते हैं । रावण के डर से श्री अपने को एक भेड़ के रूप में बदल देती है । रावण उसे खा जाता है । फलस्वरूप श्री मन्दोदरी के गर्भ से सीता के रूप में जन्म लेती है । अन्य कथा सेरीराम के समान है । सीता के पुत्र का नाम बुतुलव होता है । वह लक्ष्मण से युद्ध करता है । अनन्तर सीता और रोम के सम्मिलन के पश्चात् लव को राज्यभार सौंप कर राम सीता और लक्ष्मण के साथ तपस्या करके अग्नि में प्रवेश करते हैं । इस कथा में भी मूल वाल्मीकिरामायण की छायामात्र होने पर भी विकार अधिक हैं । हिन्दचीन, श्याम, ब्रह्मदेश ३२३ अनु० : बुल्के कहते हैं, “इतिहासज्ञों का अनुमान है कि पहली शती से लेकर भारतीय व्यापारी अपने यहाँ की संस्कृति का प्रचार हिन्दचीन में करने लगे थे । फलस्वरूप चम्पाराज्य की स्थापना हुई थी, जिसका सातवीं शताब्दी के शिलालेखों से पता चलता है कि वाल्मीकिरामायण का वहाँ पर्याप्त प्रचार हुआ होगा । राजा प्रकाशधर्म (६५३-६७८) के समय में एक वाल्मीकि-मन्दिर में वाल्मीकि की मूर्ति मिली है। इस मन्दिर के एक शिलालेख में श्लोकोत्पत्ति तथा वाल्मीकि के विष्णु-अवतार होने का उल्लेख किया गया है । “यस्य शोकात् समुत्पन्नं श्लोकं ब्रह्माभिपूजितम् । विष्णोः पुंसः पुराणस्य मानुषस्यात्मरूपिणः ॥” श्लोकार्थ यह है—जिसके शोक से ब्रह्मा से पूजित श्लोक उत्पन्न हुआ था, उस पुराण पुरुष मानुषरूपी विष्णु की यह मूर्ति है । उस समय का कोई साहित्य सुरक्षित नहीं है । अनाम में अठारहवीं शताब्दी की एक संक्षिप्त रामकथा का प्रचार था, जिसका कथानक वाल्मीकिरामायण से बहुत भिन्न नहीं है । अन्तर यह है कि दशानन का राज्य अनाम के दक्षिण भाग में तथा दशरथ का राज्य अनाम के उत्तरीय भाग में माना जाता है और रावण सेनासहित दशरथ के राज्य पर आक्रमण कर सीता को हर लेता है । छठीं शताब्दी ई० में एक सामन्त ने चम्पा के राजा के विरुद्ध विद्रोह कर कम्बोडिया (खूमेर) में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था । वहाँ सैकड़ों मन्दिरों के खण्डहर मिलते हैं, जिनका काल नवी और तेरहवीं शताब्दी के बीच माना जाता है। प्राचीन राजधानी अंगकोरवाट के एक विशाल मन्दिर में रामायण, महाभारत तथा हरिवंश की कथाओं को लेकर बहुत से पाषाण-चित्र अङ्कित किये गये हैं जिन पर जावा की कला का प्रभाव स्पष्ट है । इस मन्दिर का समय ११वीं या १२वीं शती ई० है ।” वस्तुतः आधुनिक पाश्चात्य ईसाई इतिहासज्ञों को एक भयंकर रोग यह है कि वे ईसवी सन् से पहले की ओर बढ़ना ही नहीं चाहते, वे संसार के सर्वप्राचीन साहित्य वेद, रामायण तथा महाभारत को भी ईसा के आस- पास ही का सिद्ध करने के फेर में लगे रहते हैं । वे संसार की सभी सभ्यताओं एवं उनके इतिहासों को भी इसी दायरे में लाने का प्रयास करते हैं । अतः उनकी इतिहासकल्पना प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । अन्य देश के लोग भी उनकी इस कल्पना से प्रभावित हुए हैं। इस कथन में इतना ही तथ्य है कि हिन्दचीन में बहुत प्राचीन काल से वाल्मीकिरामायण का प्रचार था और वहाँ भी वाल्मीकि के शोक से आविर्भूत “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः” यह श्लोक माना जाता था । कम्बोडिया के मन्दिर खण्डगृहों और अंगकोरवाट के मन्दिर के