भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४७ होगा । डर कर रावण ने लड़की विभेक को देकर कहा इसको ले जाओ, जो चाहो करो । विभेक ने उसे एक हाँडी में बन्द कर नदी में बहा दिया । दैवी-शक्ति से नदी के तल पर एक कमल दिखायी पड़ा । हाँडी बहती हुई उसपर टिक गयी । समुद्र की देवी मणिमेखला ने अन्य देवियों के सहयोग से उस बच्ची की रक्षा की । लक्ष्मी की दैवी शक्ति से हाँडी एक ऋषि के स्नान करने के घाट से जा लगी । दैवयोग से वह जनक थे । राजा ने उसका पालन किया । ईश्वर की प्रार्थना से राजा जनक की अंगुली में दूध हो गया । राजा ने वन में एक गड्ढा खोद कर कहा यदि इस कन्या को नारायण के अवतार की पत्नी बनना हो तो इसमें एक कमल उत्पन्न हो जाय । वैसा ही हुआ । जनक ने उसी कमल पर लड़की की हाँडी रख दी और पत्रों से छिपा कर गड्ढे को पाट दिया । जनक तपस्या छोड़कर घर लौटना चाहते थे, परन्तु उनको उससे मोह हुआ कि उस स्थान को छोड़कर जाने की उन्हें इच्छा नहीं हुई । सेवकों ने जमीन खोद कर हाँडी निकालना चाहा पर वह हाँडी हाथ न लगी । जनक ने सैनिकों और हलवाहों को भी बुलाया पर फिर भी वह हाँडी हाथ न आयी । तब राजा ने स्वयं हल हाथ में पकड़ा तुरन्त हाँडी प्रकट हो गयी । उसपर एक कमल था । कमल से एक सुन्दर कन्या निकली । हल की लकीर के साथ निकलने के कारण लड़की का नाम सीता रखा गया । उसको लेकर राजा अपने राज्य में लौट आये । महारानी रत्नमणि निःसन्तान थी । सीता उस रानी की आँखों का तारा थी । इधर राम और उनके भाई बड़े हुए एवं गुरु वसिष्ठ और स्वमित्र के पास शिक्षित हुए । उनकी विद्या से प्रसन्न होकर गुरुओं ने एक यज्ञ रचा कि उससे ऐसे शस्त्रास्त्र प्रकट हों जिनसे राक्षसों का संहार हो । हवन की अग्नि प्रज्वलित होने पर ईश्वर ने अग्नि में १२ बाण छोड़े । उस यज्ञ से प्रत्येक भाई के लिए तीन-तीन धनुष-बाण निकले । उनपर हरएक भाई के नाम अङ्कित थे । राम के शस्त्र सर्वोत्कृष्ट थे । उनके नाम थे ब्रह्मास्त्र, अग्निवत और प्लैवत । इस तरह विद्या और बल से युक्त पुत्रों को देखकर दशरथ और गुरुजन बहुत प्रसन्न हुए । कैकेयी के पिता ने शस्त्रनिपुणता सुनकर राक्षसों को मारने के लिए भरत और शत्रुघ्न को अपने यहाँ बुला लिया । रावण ने भयभीत होकर ऋषियों की तपस्या भङ्ग करने के लिए काकनासुरी राक्षसी को भेजा । वह सहेलियों के साथ कौआ बनकर ऋषियों के यज्ञों में विघ्न डालने लगी । ऋषि लोग तंग आकर वसिष्ठ और स्वमित्र के पास गये । दोनों ऋषि दशरथ से माँगकर राम और लक्ष्मण को ले आये । काकनासुरी रामबाण से मारी गयी । सुबाहु और मारीच अपनी माता का बदला लेने के लिए युद्ध करने लगे । सुबाहु मारा गया और मारीच लङ्का भाग गया । राम-सीता का परिणय जनक के पास ईश्वर का धनुष था । ईश्वर ने इससे त्रिपुर को मारा था । राजा ने घोषित कर दिया जो कोई इस कोदण्ड को उठा सकेगा सीता उसके साथ ब्याही जायगी । स्वमित्र राम और लक्ष्मण को जनक-दरबार में ले गये । राजमहल में सीता ने राम को देखा, राम ने भी सीता को देखा । दोनों परस्पर मुग्ध हो गये । राम- लक्ष्मण के पास धनुष लाया गया । लक्ष्मण ने परीक्षा ली । धनुष उठाना उनके लिए कठिन न था, परन्तु वे ताड़ गये कि राम के हृदय में सीता के लिए प्रेम उत्पन्न हो गया है, अतः उन्होंने नहीं उठाया । राम की बारी आयी तो उन्होंने अनायास ही पक्षी के पंख के समान धनुष उठा लिया । अयोध्या से दशरथ आये । धूम-धाम से सीता और राम का विवाह हुआ । राम-रामासुर युद्ध बारात जङ्गल से होकर गुजर रही थी । एक देवता रामासुर ने उसे रोका । उसका अस्त्र परशु था ।