रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ रामायणमीमांसा द्वादश इधर स्वाहा की दशा देखकर ईश्वर को दया आयी, अतः राम की सहायता के लिए उन्होंने सब दैवी शस्त्रों की शक्ति को अलग कर दिया और वायु को आदेश दिया कि वह इन सब शक्तियों को उसके मुख में भर दे जिससे एक ऐसा पुत्र बन सके जिसमें सब शस्त्रों की शक्ति एकत्र हो जाय । गदा को उसकी रीढ़ की हड्डी बना दो जिससे वह आकाश में यात्रा कर सके । त्रिशूल से उसका शरीर तथा हाथ पैर बन जायँ । वह शस्त्र सदा उसकी छाती में चिपका रहे । चक्र से उसका सिर बने और वायु उसका पिता बने । वायु ने ईश्वर की आज्ञा का पालन किया । स्वाहा गर्भवती हो गयी । तीस मास के बाद एक सफेद बन्दर उत्पन्न हुआ जो सोलह साल के लड़के के समान था । परन्तु उसका जन्म माता के मुख से हुआ । वायु ने उसका नाम हनुमान् रखा । माता ने कहा तुम्हारे कानों में दो बालियाँ हैं, दो चमकदार दाँत हैं और एक श्वेत घुंघराला बाल है । इनको नारायण ही देख सकते हैं । जिसको ये चिह्न दिखायी दें उसको नारायण का अवतार समझ उसकी सेवा करना । इस पुत्र के जन्म से स्वाहा का शाप छूट गया । उमा के बाग में यह हनुमान् तोड़फोड़ कर रहे थे । उमा ने आधी शक्ति हो जाने का शाप दिया, परन्तु हनुमान् की प्रार्थना से वे प्रसन्न हो गयीं और वरदान दिया कि जिस दिन नारायण राम के रूप में स्पर्श करेंगे तुम्हारी पुरानी शक्ति ज्यों की त्यों फिर प्राप्त हो जायगी । वायु के साथ हनुमान् ईश्वर का दर्शन करने गया । ईश्वर ने उसे अन्तर्धान होने की विद्या दी ! अमर होने का वरदान भी दिया । हनुमान् वाली और सुग्रीव का भानजा था । ईश्वर ने ही वाली और सुग्रीव से उसका परिचय कराया । ईश्वर ने अपने चमड़े से वाली की सहायता के लिए एक बन्दर उत्पन्न किया । उसका नाम जम्बुवान था, जो बहुत अच्छा चिकित्सक भी था । जब वाली के पास से मण्डो दशकण्ठ के पास आयी तब वह गर्भवती थी । दशकण्ठ के गुरु अङ्गद ने उसके गर्भ को लेकर बकरी के गर्भाशय में रख दिया । जन्म के समय उस गर्भ को निकाल कर उसे अपना ही नाम देकर वाली को लौटा दिया । रावण अङ्गद के स्नान के समय केकड़े का रूप धारण कर उसे जल में डुबा देना चाहता था । सब बन्दर बचाने में असमर्थ रहे तब वाली आया उसको देखकर लङ्केश ने युद्ध किया और हार कर वाली का बन्दी हो गया । बन्दर उसकी हँसी उड़ाते थे । सात दिन बाद बाली ने उसे छोड़ दिया । दशकण्ठ का वरदान अपने गुरु अङ्गद की राय से रावण ने एक यज्ञ किया जिससे उसे ऐसी शक्ति मिल गयी कि वह अपनी आत्मा को शरीर से निकाल कर अन्यत्र सुरक्षित स्थान पर रख सकता था । इससे युद्ध में आहत होने पर भी मरता नहीं था । इस तरह अमरत्व के समान उसे चमत्कारिणी शक्ति मिल गयी । इससे उसका अत्याचार और बढ़ गया । उसने कुबेर पर चढ़ायी कर पुष्पक विमान छीन लिया । ईश्वर से उसकी शिकायत की गयी । ईश्वर ने उसकी छाती पर हाथी के दाँत से आक्रमण किया । रावण आहत होकर लङ्का को भागा और विश्वकर्मा को हाथी दाँत काटने का आदेश दिया । स्वस्थ होने पर उसने मछली का रूप धारण कर मछली से सहवास किया । उससे मत्स्यपरी उत्पन्न हुई । उसका नाम सुवर्णमच्छा हुआ । उसने हाथी बनकर हथिनियों से भी दो पुत्र उत्पन्न किये । उनका शरीर मनुष्य जैसा किन्तु मुख हाथी जैसा था । उनका नाम किरीधर और किरीवन हुआ । सीता-जन्म जब रावण के आदेशानुसार राक्षसी काकना कौए का वेश धारण कर दशरथयज्ञ से उत्पन्न दैवी भोजन का थोड़ा अंश चुराकर लायी तो उसके खाने से मण्डो गर्भवती हुई । उससे कन्या उत्पन्न हुई । उत्पन्न होते ही लड़की चिल्ला उठी "दशकण्ठ को मारो, मारो, मारो" परन्तु उसकी यह आवाज माँ बाप को नहीं सुनायी पड़ी । ज्योतिषियों ने, जिनमें विभेक (विभीषण) भी था, भविष्यवाणी की कि इस लड़की के द्वारा दशकण्ठ के सारे परिवार का नाश