रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 422, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४५ वाली-सुग्रीव की उत्पत्ति साकेत का राजा गौतम सन्तानहीन होने के कारण तप कर रहा था । उसकी जटा और दाढ़ी इतनी बढ़ी कि उसमें दो बया पक्षियों ने घोंसला बना लिया । एक दिन पक्षी किसी कमल-वन में रात भर कमल में बन्द रहा । सबेरे आया तो उसकी पत्नी ने उसकी देह सूंघ कर सोचा कि यह रात भर किसी दूसरी स्त्री के सम्पर्क में रहा है । पक्षी ने कसम खाते हुए कहा कि यदि मैंने ऐसा किया हो तो इस साधु का सारा पाप मुझे लगे । गौतम को बड़ा दुःख हुआ, क्योंकि वह समझता था कि उसमें कोई पाप नहीं है । पूछने पर चिड़िया ने कहा सन्तानहीन होना ही उसका पाप है । उसने तप छोड़कर यज्ञ किया । उससे एक सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई । उसका नाम काल अचना हुआ । गौतम ने उससे विवाह कर लिया । इससे एक लड़की हुई । उसका नाम स्वाहा रखा गया । इधर इन्द्र आदि देवता सोच रहे थे कि हम अपने कर्मों का बँटवारा कैसे करें जिससे कि मृत्युलोक में सैनिकों के रूप में जन्म लेकर लड़ाई में परस्पर सहायता कर सकें । उनकी दृष्टि अचना पर पड़ी । इन्द्र नीचे आया और अपनी दैवी शक्ति से उसको गर्भवती बनाया । उसको पुत्र हुआ, उसका नाम काकाश (वाली) हुआ । आदित्य भी ऊपर से निकले । उन्होंने भी उससे पुत्र उत्पन्न किया । उसका नाम सुग्रीव हुआ । गौतम ने दोनों को अपने पुत्र समझा । स्वाहा को अपनी माता के दुष्कृत्यों की जानकारी थी । एक दिन गौतम नहाने जा रहे थे, सुग्रीव गोद में था, काकाश कन्धे पर था और स्वाहा अंगुली पकड़े जा रही थी । स्वाहा के मन में डाह हुआ । गौतम को इस बात पर आश्चर्य हुआ। पूछने पर उसने पिता को सब बात बता दी । गौतम को यह विश्वास नहीं हुआ कि मेरी स्त्री अचरित्रा है । उसने सबको नदी में फेंक दिया और कहा जो मेरी सन्तान होगी मेरे पास लौट आयेगी जो दूसरे की होगी वह बन्दर बनकर जङ्गल में चली जायेगी । परिणामतः काकाश और सुग्रीव बन्दर बनकर बन में चले गये । घर लौटकर गौतम ने पत्नी को शाप दिया तू पत्थर बन जा । जब नारायण राक्षसों का संहार करने के लिए लङ्का पर चढ़ायी करेंगे तब तू सेतु बाँधने के काम में आयेगी और सदा समुद्र में डूबी रहेगी । अचना को लड़की पर बड़ा गुस्सा आया । उसने लड़की को शाप दिया तू एक टाँग पर खड़ी रहेगी, एक हाथ में वृक्ष की शाखा पकड़े रहेगी । जब तू एक अतुल बलधारी वानर को जन्म देगी तब शापमुक्त होगी । इन्द्र ने किष्किन्धा बना कर काकाश और सुग्रीव को दी और संसार के सभी बन्दरों को बुला कर आदेश दिया तुम लोग काकाश को राजा बना लो । देवता वसन्तोत्सव मना रहे थे । समुद्र की देवी मणिमेखला आनेवाली थी । उसके पास एक दैवी मणि थी । उसकी ख्याति विश्व में फैली थी । एक रामसुर नामक असुर उसके पीछे पड़ा । वह बहुत बली था । अपने पीछे बली असुर को दौड़ते देखकर मणिमेखला प्रसन्न होकर उसे चिढ़ा रही थी । वह बहुत दौड़ा परन्तु देवी और मणि उसके हाथ न आयी । वह असुर अपना क्रोध उतारने के लिए अर्जुन नामक देव से युद्ध कर ठण्डा हो गया । इधर ईश्वर ने देखा सुमेरु का कोना टेढ़ा हो गया है । उसे ठीक करने के लिए देवता बुलाये । उन्होंने सुमेरु को साँप से बाँध कर खोंचा पर सफलता न मिली । सुग्रीव ने साँप की नाभि को दबाया, साँप को गुदगुदी लगी । उसने अपने शरीर से सुमेरु को जकड़ लिया । काकाश ने एक ओर कन्धा दिया सुमेरु ठीक हो गया । ईश्वर दोनों पर प्रसन्न हुए । काकाश को त्रिशूल देकर वाली नाम रखा । सुग्रीव उपस्थित न था । उसके लिए रूपवती स्त्री उसके भाई को दे दी । वाली ने उसे हाँडी में रख दिया । नारायण को यह बुरा लगा; उन्होंने कहा किसी युवती का किसी युवक को देना वैसा है जैसे किसी भौंरे को कोई फूल देना । वाली ने आश्वासन दिया कि मैं अपने वचन का पालन करूँगा । यदि न करूँ तो राम के बाण से मारा जाऊँ । वाली आया तो तारा पर मुग्ध हो गया । अपने वचन को भूल गया । सुग्रीव को न देकर उसे अपने ही घर में रख लिया । ४४