रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ रामायणमीमांसा द्वादश चक्रकाल का राज्य आया। अंशधन्वा वादकन का राजा हुआ। भारन सीलाश का, दवन रोमगल का, दुखन चारिक का ओर त्रिशिरा मक्षवारी का राजा हुआ। संुमनक्खा का विवाह राजा जिह्वा से कर दिया गया। दशकण्ठ सबसे अधिक प्रतापी हुआ। कैलास में एक नन्दक देव रहता था। वह ईश्वरदर्शनार्थ कैलास जानेवालों का पैर धोता था। सब उसे छेड़ते थे। उसके सिर पर चपत मारते थे। परिणामस्वरूप वह गंजा हो गया। उसने पीड़ित होकर ईश्वर की शरण ली और यह वरदान माँगा कि मैं जिसकी ओर संकेत कर दूँ वह वहीं गिरकर मृत्यु का ग्रास बन जाय। ईश्वर ने उसे वैसा ही वरदान दे दिया। फलस्वरूप बहुत से देवता मारे गये। इन्द्र ने ईश्वर से प्रार्थना की कि उससे वरदान वापस लिया जाय। ईश्वर ने नारायण को आदेश दिया कि वे नन्दक को पराजित करें। नारायण ने अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को मोह में फाँस लिया। उसने अप्सरा को प्राप्त करना चाहा। उसने कहा तुम पहले मेरे साथ नाचो, उसके बाद मैं विवाह करूँगी। उसने स्वीकार कर लिया; अप्सरा ने अपनी अंगुली अपने पैरों की ओर दिखायी नाच की धुन में नन्दक वरदान भूल गया, अतः उसने भी अपनी अंगुली अपने पैरों की ओर दिखायी, फलतः उसकी टांग टूट गयी। अप्सरा ने अपना असली रूप धारण किया और नन्दक को मारने दौड़े। नन्दक ने नारायण से कहा कि यह तो धोखा है, वीरोचित न्याय नहीं है। नारायण ने कहा आगे तुम दशकण्ठ २० भुजावाले होओगे। मैं एक सिर दो भुजा से ही तुम्हें मारूँगा। नन्दक दशकण्ठ और नारायण राम हुए। विभेक के पास एक चमत्कृत सीसा था जिससे वह भविष्य जान लेता था। इसलिए उसको दशकण्ठ के षड्यन्त्रों का पता लग जाता था। विभेक ने उसी के बल से रावण-नाश में राम की सहायता की। दशकंठ-मंडो-विवाह हिमालय में चार ऋषि तप करते थे। वे गायों का दूध पीते थे। गायें स्वयं आकर शीशे के पात्र में दूध डाल जाती थीं। ऋषि लोग बचे हुए दूध को निकट की एक मेढकी को दे देते थे। पाताललोक की एक नागकन्या बहुत कामुकी थी, वह अतृप्त हो मृत्युलोक में आकर एक साँप से रमण कर रही थी। ऋषियों ने उस कुकृत्य को देख कर उसकी पूँछ पर कुछ मार दिया वह लज्जित हो पाताल चली गयी। वह पुनः मृत्युलोक में आयी और ऋषियों के दुग्धपात्र में विष मिला दिया। मेढकी देख रही थी, वह ऋषियों की भक्त थी। ऋषियों को मृत्यु से बचाने के लिए वह दूध में कूद पड़ी और मर गयी। ऋषियों ने सोचा मेढकी दूध की लालच में फँस कर मर गयी। उन्होंने मन्त्रों से उसे जीवित कर दिया। उसने ऋषियों से सारा हाल बताया। ऋषियों ने उसपर प्रसन्न होकर उसे सुन्दरी कन्या बना दिया। वह मण्डो थी। ऋषियों ने उसे ईश्वर को सौंप दिया। वह उमा की सेवा करती थी। इधर किसी प्रसङ्ग से कैलास पर्वत का कोना धँस गया था। ईश्वर ने कहा जो उसे ठीक करेगा, उसे मुंह माँगा वरदान मिलेगा। बहुत से देवताओं ने प्रयत्न किया, पर वह टस से मस नहीं हुआ। दशकण्ठ ने उस पहाड़ को ठीक कर दिया और पुरस्कारस्वरूप में उसने उमा की माँग की। ईश्वर ने उमा को दे दिया। दशकण्ठ ने उमा को पकड़ लिया, परन्तु उसे अनुभव हुआ कि वह अग्नि के समान तप्त हो रही है। वह उमा को सिर पर लेकर लङ्कापुरी चला। देवता बड़े चिन्तित हुए। तब नारायण एक बूढ़े माली का रूप धारण कर बाग में एक वृक्ष को इस प्रकार लगाने लगे कि जिसका मूल ऊपर की ओर रहे। दशकण्ठ ने देखकर कहा मूर्ख क्या कर रहा है। मालीरूप नारायण ने कहा तू मुझसे भी मूर्ख है जो एक सन्तप्त स्त्री को, जिसका शरीर जल रहा है, कन्धे पर उठाये फिरता है। वह तेरे वंश का विध्वंस कर डालेगी। तुझे तो इससे अच्छी स्त्री माँगनी चाहिये थी। जैसी मण्डो है। यह सुनकर दशकण्ठ ने उमा को लौटा दिया और मण्डो को माँग लिया। इसी बीच खिदखिन (किष्किन्धा) के वाली ने उससे युद्ध कर मण्डो को छीन कर अपनी स्त्री बना लिया। अन्त में उसके गुरु अङ्गद के समझाने पर मण्डो दशकण्ठ को लौटा दी गयी।