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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 420

नाम का पुत्र हुआ। उसके शासन से सब संतुष्ट थे। इसी समय असुर ब्रह्मनामक राक्षस हुआ जिसको ईश्वर ने वरदानरूप गदा दी। उसके प्रभाव से वह अत्याचारी हो गया। अजपाल ने मालीवग नामक अन्य देव की सहायता से उसको मारा उसके बाद दशरथ ने उस वंश-परम्परा को जारी रखा। अजपाल के बाद दशरथ गद्दी पर बैठा। उसकी कोसुरिया, समुद्रा और कौयकेशी तीन रानियाँ थीं। वह पुत्र न होने के कारण दुःखी था। वसिष्ठ, स्वमित्र, वज्जवग्ग और भारद्वाज के परामर्श से सिंगमुनि के पुत्र कलैकटी जो हरिणी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था, उसका शरीर मनुष्य जैसा था पर मुँह हरिण का सा था। उसका घोर तप था। उसके तेज से रोमवचन नामक देश में अकाल पड़ गया। उस देश के राजा ने अपनी कन्या को भेजा कि वह ऋषिपुत्र के तप को भङ्गकर ऋषि को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराये। उसके लावण्य से मोहित होकर ऋषि ने तप छोड़ दिया। जिससे विपुल वृष्टि हुई। ऋषि-पुत्र जामाता के रूप में राजमहलों में रहने लगा। राजा दशरथ के निमन्त्रण से ऋषिपुत्र अयोध्या आया और पुत्रेष्टियज्ञ की तैयारी में लग गया। पूर्वोक्त चार ऋषियों को लेकर वह कैलास पर गया। उसी समय देवों के प्रताप से राक्षसों को विशेष वरदान मिले थे। उससे वे बड़े अन्याय करते थे। ऋषि कलैकटी ने ईश्वर से प्रार्थना की, आप नारायण को मृत्युलोक में भेजिये। वे दशरथ के पुत्र के रूप में अवतार लें और पृथ्वी को विपत्ति से मुक्त करायें। ईश्वर की प्रेरणा से नारायण राजी हो गये, परन्तु उनकी शर्त थी कि लक्ष्मी, अनन्त नाग, गदा, चक्र और शङ्ख भी अवतार लें। ईश्वर ने सब शर्त मान लीं। ईश्वर ने ऋषियों से कहा आप चल कर यज्ञ आरम्भ करें। यज्ञाग्नि से एक देवता का प्रादुर्भाव होगा। उनके सिर पर एक पात्र होगा। उसमें चार रोटियाँ होंगी। उसी समय एक कौवा उस पात्र पर झपट्टा मारेगा और आधी रोटी लेकर दक्षिण में भाग जायगा। शेष रोटियों को दशरथ की रानियों में बांट दिया जाय। रानियों को चार पुत्र होंगे। ईश्वर की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया गया। नारायण ने कोसुरिया के पुत्र के रूप में अवतार लिया। वह हरे वर्ण के थे। चक्र कौयकेशी के पेट से भरतरूप में उत्पन्न हुए। वह रक्त वर्ण के थे। नाग और शङ्ख दोनों ने संयुक्त रूप से जन्म लिया। समुद्रा के पेट से लक्ष्मण हुए वे पीत वर्ण के थे। गदा ने समुद्रा से जन्म लिया उनका नाम शत्रुद था। वे बेगनी वर्ण के थे। भविष्यवाणी के अनुसार कौआ भी प्रकट हुआ। उसके द्वारा अपहृत रोटी से सीता के रूप में लक्ष्मी की उत्पत्ति लङ्का में हुई। कौए को दशकण्ठ ने भेजा था। उस आधी रोटी को मण्डो ने खाया। उससे सीता का जन्म हुआ। पहले लङ्का का नाम रङ्गका था। नीलकाल पर्वत पर कौए का बहुत बड़ा घोंसला था। इसी लिए इसका नाम रङ्गका था। श्यामी भाषा में का का अर्थ कौआ और रङ्ग का अर्थ घोंसला है। ब्रह्मा ने इसको अपने एक भक्त सहमलिबन के लिए बसाया था। वही लङ्का का पहला राजा था, परन्तु नारायण के डर से वह राजधानी छोड़ कर पाताल चला गया। ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा ने नीलकाय पर्वत पर एक नया घोंसला बनाया और ब्रह्मा ने उसे अपने भक्त चतुर्वक्र को दे दिया। उसकी रानी मालिका थी। उसका पुत्र लस्तियन गद्दी पर बैठा। यह शक्तिशाली राक्षस था। उसकी पाँच रानियाँ थीं। सुनन्दा कुबेरन की माँ थी, चित्रमाली देवनासुर की, स्वर्णमाले अंशधन्वा की, वरप्रभा भारन की माँ थी। पाचवीं रानी का नाम रजटा था। उसके ६ पुत्र और एक पुत्री थी। उनके नाम दशकण्ठ, कुम्भकर्ण, विभेक, दुःखन, खर, त्रिशिरा और सुमनकवा था। लस्तियन की सहायता से पाताल के राजा कालनाग ने सहमलिबन पर चढ़ायी कर दी। उस समय सहमलिबन की लङ्का के राजा से मैत्री हो गयी थी। उसने लङ्काधिपति चतुर्वक्र की अधीनता भी स्वीकार कर ली थी। अतः इस समय उसने लस्तियन से सहायता माँगी। उनकी सहायता से कालनाग पराजित हो गया। उसके बाद कालनाग ने अपनी लड़की काल अग्गी लस्तियन को दे दी। लस्तियन ने उक्त लड़की का विवाह अपने लड़के दशकण्ठ से कर दिया। वृद्धावस्था में लस्तियन ने अपने राज्य को बाँट दिया। दशकण्ठ लङ्का का राजा हुआ। कुबेरन कालचक्र का अधिपति हुआ, पुष्पक भी उसी को मिला। देवनासुर के भाग में

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