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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३४२ रामायणमीमांसा द्वादश (५) रामकियेन की एक अन्तिम विशेषता यह भी है कि उसमें हनुमान् की बहुत सी प्रेमलीलाओं का वर्णन किया गया है। स्वयंप्रभा (अध्याय २३), बेंनजकाया (अध्याय २५), नागकन्या सुवर्णमच्छा (अध्याय २६), अप्सरा वानरी (अ० ३१) के अतिरिक्त मन्दोदरी के साथ भी वह क्रीड़ा करते हैं । मन्दोदरी के संजीवनयज्ञ को भङ्ग करने के लिए वह दशकण्ठ के रूप में मन्दोदरी के पास पहुँच कर उसका आलिङ्गन करते हैं (अध्याय ३४) । एक अन्य अवसर पर वह रावण के पास पहुँच कर राम की भर्त्सना करते हैं तथा रावण की ओर से युद्ध करने का प्रस्ताव करते हैं । वास्तव में वह एक दिन तक ऐसा करते हैं और पुरस्कारस्वरूप इन्द्रजित् की समस्त सम्पत्ति के अतिरिक्त मन्दोदरी को भी रावण से प्राप्त कर रातभर उसके साथ क्रीड़ा करते हैं (अध्याय ३५)। रामकियेन का अनुवाद हिन्दी में रामकीर्ति नाम से प्रकाशित है। यह स्वामी सत्यानन्द पुरी के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर सस्ता-साहित्यमण्डल नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। स्वामी सत्यानन्द पुरी के अनुसार जिन काव्य-रचनाओं ने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है उनमें रामायण महाकाव्य का स्थान सर्वोपरि है। धर्म और कथा के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किसी ने किया तो वह मानवता के आदि कवि संस्कृतकाव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। दूर-दूर देश के कवियों ने उनकी अनुकृति के असीम भण्डार से रत्न चुन-चुन कर अपने साहित्य को समृद्ध किया है। कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृति को अमर बनाया है। खेतों में काम करनेवाले किसान अथवा नाव चलानेवाले नाविक लोग भी उनसे अप्रभावित न रह सके—उनके गीतों को गुनगुनाते हुए अपनी थकावट भूल जाते हैं। उनकी लेखनी ने जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा और किसी ने नहीं डाला। स्वामी सत्यानन्दपुरी के अनुसार थाई देश के छठे राम राजा को ही यह श्रेय है कि उन्होंने रामकीर्ति के मूलरूप रामायण का पता लगाकर उसके रचयिता वाल्मीकि के बारे में जानकारी दी है। कोई लोकप्रिय गीत जब लोगों को अपने माधुर्य से मोह लेता है जब लोग उसके सम्मोहन में फँस जाते हैं तो धीरे-धीरे इस बात को भूल जाते हैं कि इसका रचयिता कौन है। वाल्मीकि के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ । थाई देश में रामायण का प्रभाव १३ वीं शती से ही है। फिर भी इस रामकीर्ति के सुन्दर काव्य का १७८१ ई० के प्रारम्भ में निर्माण हुआ। राम की महिमा का जैसा बखान थाई देश में पाया जाता है, उसपर रामायण का सीधा प्रभाव नहीं पड़ा' । रामकीर्ति में ऐसी कहानियों का समावेश है जो उत्तर भारत से लेकर मलाया तक अनेक देशों में लोकप्रिय हैं, अतः रामकथा अनेक देशों से होती हुई थाई देश में पहुँचती है। रामकीर्ति के अनुसार देवताओं में सबसे बड़े ईश्वर (शिव) हैं। राम उनके अनुग्राह्य हैं। इसमें राम, हनुमान् आदि कुछ नाम रामायण से बिलकुल मिलते हैं, परन्तु कुछ नये नाम हैं। उनमें मन्थरा का नाम कुच्ची लिखा गया है जो कुब्जा का बिगड़ा हुआ रूप है। शत्रुघ्न को शत्रुत, कुवेर को कुवेरन, लक्ष्मण को लक्षण तथा भरत को वरत कहा गया है। इसमें हिरण्याक्ष को हिरन्तयक्ष कहा गया है। ईश्वर से अपराजित होने का वरदान पाने के कारण वह अत्यन्त उद्धत होकर भूमि को जम्बूद्वीप, उत्तरकुरु अमर गोपाल की भूमि से काटकर चटायी की तरह बगल में दबा कर पाताल चला जाता है। उसकी उद्दण्डता से देवताओं का भी हृदय कम्पित हो जाता है। वे सब कैलास पर्वत पर ईश्वर की शरण लेते हैं। ईश्वर द्रवित होकर नारायण को बुलाकर कहते हैं तुरन्त जाकर संसार को हिरन्त के अत्याचार से मुक्त करो । फलतः नारायण ने सूकररूप से हिरन्त का वध किया। नारायण अपने स्थान क्षीरसमुद्र में वेद-ध्वनि में लवलीन हो गये। समुद्र के तल से एक कमल निकला जिसकी सुन्दर सुगन्धित पत्तियों से एक बच्चा निकला। उसे गोद में लेकर नारायण कैलास में ईश्वर के पास गये। ईश्वर की आज्ञा हुई इस बालक को संसार का सबसे पहला सम्राट् नियुक्त किया जाय। उसने संसार की रक्षा करने के लिए नारायण-वंश की नींव डाली। उसकी राजधानी द्वारावती या अयुध्या हुई । बालक का नाम अनोमान था। उसको नारायण का अवतार मानते थे। उसके अजपाल