भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 418

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४१ का धनुष ईश्वर ( शिव ) का है जब कि रामकेर्ति में जनक स्वयं इन्द्रजाल से बनाते हैं। रामकियेन में वाल्मीकीय कथा के अनुसार अगस्त्य राम को दिव्य अस्त्र प्रदान करते हैं, किन्तु इसका उल्लेख रामकेर्ति में नहीं हुआ है। उपर्युक्त विश्लेषण का निष्कर्ष यह है कि रामकेर्ति के अतिरिक्त रामकियेन पर वाल्मीकिरामायण का भी सीधा प्रभाव पड़ा है। ( ३ ) रामकेर्ति की भांति रामकियेन भी बहुत से अर्वाचीन वृत्तान्तों के लिए मलयन सेरीराम पर निर्भर है। वाल्मीकि से भिन्न जो सामग्री सामान्यरूप से रामकेर्ति तथा सेरीराम में मिलती है वह प्रायः सब रामकियेन में भी पायी जाती है। अन्तर यह है कि रामकियेन में सुग्रीव से मैत्री करने के पूर्व राम की किसी परीक्षा का उल्लेख नहीं है और लक्ष्मण के संयम का भी निर्देश नहीं मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामकियेन पर सेरीराम का सीधा प्रभाव भी पड़ा है, क्योंकि निम्नलिखित सामग्री रामकेर्ति में नहीं हैं किन्तु वह रामकियेन तथा सेरीराम दोनों में विद्यमान हैं। महिरावण का राम को पाताल ले जाना। भस्मलोचन की कथा। वाली, सुग्रीव तथा अञ्जना का अहल्या की सन्तान के रूप में उल्लेख। अङ्गद की जन्मकथा जिसके अनुसार वह वाली तथा मन्दोदरी का पुत्र हैं। सीता का लङ्का में जन्म। हनुमान् तथा नल का कलह। रामकेर्ति, वाल्मीकिरामायण तथा सेरीराम के अतिरिक्त रामकियेन का और कोई आधार ग्रन्थ रहा होगा कि नहीं इस प्रश्न का निश्चयात्मक उत्तर तभी संभव होगा जब रामकेर्ति की कोई पूरी हस्तलिपि मिल जायगी। रामकियेन में विभीषण मन्दोदरी के विवाह का उल्लेख मिलता है। यह प्रसङ्ग सेरीराम अथवा रामकेर्ति में नहीं आया है, किन्तु वह अनेक भारतीय राम-कथाओं में उल्लिखित है। निम्नलिखित सामग्री श्याम देश को छोड़ कर अबतक और कहीं नहीं मिली है। सेतुबन्ध के पूर्व रावण का तपस्वी के रूप में राम के पास पहुँचना और युद्ध छोड़ देने के लिए उनसे अनुरोध करना। रावण के इस निष्फल प्रयत्न के अनन्तर बेंजकाया ( विभीषण की पुत्री ) का सीता का रूप धारण कर मृतवत् राम के शिविर के पास की नदी के ऊपर बह जाना। रावण का ब्रह्मा को बुला भेजना; लङ्का में ब्रह्मा का आगमन, रावण द्वारा राम पर अभियोग। ब्रह्मा का राम को बुलाना और बाद में सीता को भी। अन्त में ब्रह्मा का सीता को लौटाने की आज्ञा देना तथा रावण के अस्वीकार करने पर ब्रह्मा का रावण को शाप देना। रावण-वध तथा राम के अयोध्या में प्रत्यागमन के बाद रावण के एक पुत्र का विभीषण के विरुद्ध विद्रोह करना। भरत तथा शत्रुघ्न का रामसेना के साथ लङ्का की ओर प्रस्थान करना और रावण के 'पुत्र को पराजित कर विभीषण को पुनः राज्य दिलाना। इस युद्ध का विस्तृत वर्णन प्रथम युद्ध की पुनरावृत्तिमात्र है। यह प्रसङ्ग रामकेर्ति में तो नहीं मिलता, किन्तु सर्ग ७६ में इसकी ओर संकेत किया गया है। इसका आधार भारतीय है। समस्त युद्ध की इस पुनरावृत्ति के अतिरिक्त और बहुत से वृत्तान्त दुहराये गये हैं। इन्द्रजित् के यज्ञ-भङ्ग के अतिरिक्त रामकियेन में ऐसा वर्णन कुम्भकर्ण ( अध्याय २८ ), रावण ( अध्याय ३१ ) तथा मन्दोदरी ( अध्याय- ३४ ) के विषय में भी मिलता है।