भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 417

३४० रामायणमीमांसा द्वादश 'अप्रतिषिद्धमनुमतं भवति' न्याय के अनुसार प्रमाणभूत मूल ग्रन्थ से जो विरुद्ध नहीं है वह अनुमत समझा जाता है, अतः रामकेर्ति तथा अन्यान्य रामायणों की अविरुद्ध विशेषताएँ मान्य ही समझी जाती हैं। यह कहा ही जा चुका है कि महाभारत, पुराण और संहिताएँ भी आर्ष हैं। ऋषियों को विप्रकृष्ट देशकाल की वस्तुओं का भी ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा ज्ञान हो सकता है, अतः वे वाल्मीकिरामायण के पूरक समझे जाते हैं। श्याम ३२५ अनु० : श्यामदेश में राम-कथा रामकियेन (अर्थात् रामकीर्ति) के नाम से प्रसिद्ध है। अपेक्षाकृत प्राचीनकाल से वहाँ के नाटकों में राम-कथा का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। प्रारम्भिक नाटकों के दो वर्ग (कोन और रखम) का एकमात्र विषय राम-कथा ही था और एक तीसरा वर्ग (नंग अर्थात् छाया-नाटक) प्रधानतया राम-कथा के दृश्य प्रस्तुत करता था। १८वीं शताब्दी में नाटकों के एक नवीन रूप का प्रचलन हुआ (वेणुक रोंग) जिसकी कथावस्तु रामकियेन पर आधारित थी। १८वीं तथा १९वीं शताब्दी की हैं। इस रामायण के दो भिन्न संस्करण १८ वीं शताब्दी उत्तरार्द्ध में निकाले गये थे तथा इसका एक तीसरा संस्करण नाटक के रूप में १९वीं शती पूर्वार्द्ध में प्रकाशित हुआ था। बांकाक के बिरला ओरियण्टल सीरीज में रामकियेन का अंग्रेजी संक्षेप रामकीर्ति के नाम से प्रकाशित किया गया है। अगले अनुच्छेद में जो रामकियेन के कथानक का विश्लेषण किया गया है, वह उस रामकीर्ति के दूसरे संस्करण (सन् १९४१) पर निर्भर है। १७वीं शताब्दी की अनेक छोटी रचनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनकी कथावस्तु रामायण की किसी घटना से सम्बन्ध रखती है, उदाहरणार्थ वाली का सुग्रीव को उपदेश देना कि किस प्रकार राम के दरबार में व्यवहार करना चाहिए तथा दशरथ का राम को राजनीति तथा धर्म के विषय में शिक्षा देना। १८वीं तथा १९वीं शती में कई कवियों ने रामकियेन नामक महाकाव्यों की रचना की है। उदाहरणार्थ थोनबुरी, फुत्तायोत्फा (इनका रामकियेन सर्वाधिक विस्तृत है) तथा फुत्तालेउतला। ३२६ अनु० : रामकियेन का संक्षिप्त अंग्रेजी रूपान्तर ४५ अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय में अयोध्या के राजवंश का परिचय मिलता है तथा द्वितीय अध्याय में राम तथा उनके भाइयों के जन्म का वर्णन दिया गया है। अनन्तर लङ्का का निर्माण, रावण के कृत्य तथा राम-कथा के अनेक पात्रों अर्थात् वाली, सुग्रीव, हनुमान्, अङ्गद और सीता की जन्मकथा मिलती है (अध्याय ३-११)। इसके बाद विश्वामित्र के यज्ञ से लेकर सीता-त्याग के पश्चात् राम-सीता सम्मिलन की समस्त कथा प्रस्तुत की गयी है (अध्याय १२-४५) रामकियेन के कथानक की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं— (१) रामकियेन के पात्र सबके सब श्याम देश के निवासी हैं तथा रामायण का घटनास्थल श्याम में ही माना गया है। (२) इसका मुख्य आधार खमेर भाषा का रामकेर्ति है। दोनों में कथा का निर्वहण सदृश है। रामकेर्ति की भाँति रामकियेन भी सेरीराम की अपेक्षा वाल्मीकीय कथा के अधिक निकट है। रामकेर्ति तथा वाल्मीकिरामायण की तुलना करते हुए रामकेर्ति की जितनी विशेषताओं का उल्लेख हुआ है, वे प्रायः सब रामकियेन में भी विद्यमान हैं। अन्तर यह है कि रामकियेन में हनुमान् को अञ्जना तथा शिव का पुत्र माना गया है तथा लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र का वध वर्णित है। रामकियेन का एक अन्य प्रसङ्ग राम-सीता का पूर्वानुराग, न वाल्मीकिरामायण में मिलता है और न रामकेर्ति में, किन्तु कुछ बातों में रामकियेन रामकेर्ति की अपेक्षा वाल्मीकीय कथा के अधिक निकट है। अयोमुखी का वृत्तान्त रामकेर्ति में नहीं है, किन्तु वह रामकियेन में विद्यमान है। रामकियेन के अनुसार सीता-स्वयंवर