रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४९ संमनखा संमनखा और जिह्वा के पुत्र राक्षस कुम्भकस से राम-लक्ष्मण का सामना हो गया। तपस्या से विपुल शक्ति प्राप्त करना उसका उद्देश्य था। ब्रह्मा ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसके लिए एक तलवार फेंक दी। उसने इसे अपना अपमान समझा, अतः उसने तलवार स्वीकार नहीं की। उसी समय लक्ष्मण फल-फूल लेने जङ्गल में गये थे। तलवार पड़ी देखकर उन्होंने उठा ली और यों ही हिलाने लगे। पास ही कुम्भकस भी समाधि में बैठा था। उसकी आँखें खुली थीं। उसे क्रोध आया, दोनों में युद्ध हुआ। लक्ष्मण के हाथ राक्षस मारा गया। उसका पिता जिह्वा भी उसी समय मारा गया। दशकण्ठ वनयात्रा की तैयारी कर रहा था। लङ्का का रक्षण जिह्वा के अधीन था। उसने साहस और बुद्धिमत्ता से सप्ताह तक बिना नींद के लङ्का की रक्षा की थी। प्रकृतिवश नींद आयी, परन्तु सोने से पहले उसने अपना शरीर इतना बढ़ाया कि उसकी जिह्वा ने लङ्का को चारों ओर से घेर लिया जिससे कि उसके सोते समय कोई लङ्का पर चढ़ाई न कर सके। दशकण्ठ वन से लौटा। उस समय आधी रात थी। चारों ओर अन्धकार था। नगरी में घुसने का कोई मार्ग नहीं था। उसने सोचा किसी शत्रु ने नगरी को घेरा है। उसने मार्ग बनाने के लिए चक्र फेंका जो उसकी जिह्वा पर लगा और वह मर गया। पीछे मालूम होने पर उसे बड़ा दुःख हुआ। उसकी बहन संमनखा विलासिनी थी। वैधव्य जीवन उसके लिए असह्य था। वह कुम्भकस को देखने गयी। नये पति की तलाश में थी। सुन्दर स्त्री का वेश बनाकर वह राम के पास पहुँची। उनपर मोहित हो गयी। राम ने उसपर ध्यान नहीं दिया। उसकी आँख सीता पर पड़ी। तो उसने सोचा सीता को समाप्त करने पर राम को उसके आगे झुकना ही पड़ेगा। वह राक्षसी वेष से सीता से लड़ने लगी। राम ने उसे मार भगाया। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट लिये। वह रोमगन नगर गयी। खर से झूठी शिकायत की। खर लड़ने गया। राम ने रामासुर के बाण से मार दिया। दूषक और तिसिर भी मारे गये। सीता-हरण वह झूठ बोलने में दक्ष थी। उसने दशकण्ठ से कहा मैंने जङ्गल में एक सुन्दरी रमणी देखी है। मैं तुम्हारे लिए उसे ला रही थी, लक्ष्मण ने मेरा जङ्ग-भङ्ग कर दिया। सीता के रूप का हाल सुनकर दशकण्ठ मोहित हो गया। मण्डो से राय ली तो उसने बहुत समझाया, पर वह सीता के लिए विह्वल था। उसने मारीच को आदेश दिया कि तुम हरिण का रूप बना कर जाओ और राम तथा लक्ष्मण को सीता से पृथक् कर दो। मारीच ने आज्ञा का पालन किया। सीता ने सुनहला चुलबुला हरिण देखकर राम से उसे पकड़ने को कहा। राम ने समझाया, पर उन्होंने हठ किया। राम ने उसका पीछा किया, वह थक गया एवं राक्षसरूप में प्रकट हो गया। राम ने तीर मारा, वह घायल हो गया। लक्ष्मण बचाओ कह कर वह चिल्लाया। आवाज सीता के कानों में आयी। उसने लक्ष्मण को जाने को कहा। लक्ष्मण समझ गये कि ये राम के शब्द नहीं हैं, पर सीता ताने मारने लगी। अन्त में लक्ष्मण देवों से सीता-की रक्षा की प्रार्थना करते हुए राम की तलाश में चल दिये। दशकण्ठ को अवसर मिला। वह साधु का रूप बनाकर सीता के पास आया। सीता आतिथ्य करने लगी। उसने कहा 'सीते ! तुम मेरी रानी बन जाओ। मैं दशकण्ठ हूँ।' सीता ने उसे कुटी से निकाल दिया। रावण जबरदस्ती सीता को रथ पर बैठा कर चल पड़ा। एक बलिष्ठ पक्षी शतायु ने, जो राम का मित्र था, कहा सीता को छोड़ दो। रावण नहीं माना, उसने युद्ध किया। उसकी सब सेना मार डाली। रावण ने बड़े प्रबल अस्त्रों को छोड़ा, पर वह हँस रहा था, उसपर कुछ असर नहीं होता था। उसने कहा सिवाय उस अंगूठी के जो सीता के हाथ में है मुझपर किसी का प्रभाव नहीं हो सकता। दशकण्ठ ने यह सुनकर सीता के हाथ से अंगूडी छीन ली और पक्षी पर दे मारी जिससे वह गिर गया, परन्तु वह अपनी चोंच में अंगूठी को पकड़े रहा। उसकी आत्मा राम की प्रतीक्षा कर रही थी। दशकण्ठ लङ्का पहुँच गया। उसने सीता को अपने सहस्र पुत्रों के संरक्षण में रख दिया।