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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 427

३५० रामायणमीमांसा द्वादश मारीच को मार कर राम लौट रहे थे। मार्ग में लक्ष्मण मिले । राम को भय हुआ । उन्होंने समझ लिया कि किसी ने चालाकी से लक्ष्मण को अलग किया है । सीता अकेली छूट गयी होगी । दोनों भाई जल्दी कुटिया की ओर दौड़े । देखा तो आशङ्का ठीक निकली । आनन्दवर्धिनी सीता वहाँ नहीं थी । दोनों बहुत दुःखी हुए । भाग्यवशात् उसी समय इन्द्र आ गये । उन्होंने बताया कि सीता को इस मार्ग से ले जाया गया है । उसी रास्ते राम और लक्ष्मण चल पड़े । आगे घायल शतायु (जटायू) राम की प्रतीक्षा करता हुआ मिला । पक्षी ने राम को सीता की अंगूठी देकर 'दशकण्ठ सीता को ले गया' कह कर प्राण छोड़ दिये । कृतज्ञ राम ने एक बाण छोड़ा जो अर्थी बन गया, दूसरा बाण छोड़ा जिसने आग प्रज्वलित कर पक्षी के शरीर को जला दिया । तीसरा बाण छोड़कर जलती हुई अग्नि को शान्त कर दिया । आगे चल कर राम को राक्षस मिला, जिसका नाम कुम्बल ( कबन्ध ) था । उसको ईश्वर ने शाप दिया था जिससे उसका केवल ऊपरी शरीर ही बन पाया था। शाप मिटने की शर्त यह थी कि जब राम वन में आयेंगे तो इस दोष से मुक्त करेंगे। उसने राम और लक्ष्मण को अपने हाथों में पकड़ कर चबा डालना चाहा, परन्तु उसकः शरीर विचित्र भय से कम्पित हो गया। उसने समझ लिया कि मैंने जिन मनुष्यों को पकड़ा है वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। उसने झट उनको छोड़ दिया । जब उसने राम की विपत्ति का हाल सुना तो उनको परामर्श दिया कि वे किष्किन्धा में राजा वाली से सहायता लें। खिदखिन और जम्बू की सेनाएँ लङ्कापर चढ़ाई कर सीता को छुड़ा लायें । राम ने उसकी बात सुनकर उसको उस योनि से छुड़ाने के लिए तीर छोड़ा और वह मर गया । आगे एक राक्षसी मिली जिसका नाम अशमुखी (अयोमुखी) था। वह भी दोनों भाइयों पर मोहित हो गयी। अपनी माया से चारों ओर अन्धकार फैला कर लक्ष्मण को गोद में लेकर आकाश में उड़ गयी । राम भाई की सहायता के लिए दौड़ न सके, परन्तु राम के बाणों से अन्धकार छिन्न-भिन्न हो गया । लक्ष्मण सावधान हो गये । उन्होंने कुछ मन्त्र पढ़े जिनके प्रभाव से लक्ष्मण सहित वह भूमि पर जा पड़ी। लक्ष्मण ने उसकी भुजाएँ काट डालीं। इसपर वह भाग गयी । वे एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठे । दैवयोग से उसपर हनुमान् बैठे थे । उन्होंने जानना चाहा कि ये दोनों कौन हैं ? हनुमान् ने ध्यान आकर्षित करने के लिए एक शाखा हिलायी । राम थक कर सो गये थे । लक्ष्मण ने बन्दर को भगाना चाहा, क्योंकि वे पहरे पर थे। परन्तु बन्दर नहीं टला, आग्रहपूर्वक शाखा हिलाता रहा। लक्ष्मण ने धनुष उठाया । हनुमान् ने धनुष छीन लिया । इस धृष्टता को देखकर राम को जगाना पड़ा । राम ने ऊपर देखा तो बन्दर के शरीर पर पूर्वोक्त कुण्डल आदि चिह्न दिखाई पड़े। हनुमान् ने देखा कि उसके चिह्नों को राम ने पहचान लिया। यह अवश्य नारायण के अवतार राम हैं। हनुमान् वृक्ष से उतर आये और अपनी सेवाएँ राम को अर्पित कर दीं । राम-सुग्रीव भेंट राम की विपत्ति का हाल सुनकर हनुमान् ने अपने मित्र सुग्रीव से भेंट कराना उचित समझा । कैलास पर्वत का द्वारपाल एक राक्षस नन्दकाल था । ईश्वर की कुछ भक्त अप्सराएँ एक उद्यान में फूल चुनने गयीं । वह राक्षस एक पर मोहित हो गया। अतः उसपर एक पुष्प फेंक दिया। उसकी शिकायत पर ईश्वर ने उसे दरवनामक भैंसा हो जाने का शाप दे दिया और कहा कि तेरा पुत्र तुझे मारेगा तब तेरी मुक्ति होगी । वह भैंसों का सरदार हो गया। वह बहुत सी भैंसों में रहता था। जब कोई नर भैंसा उत्पन्न होता था तो वह उसे मार देता था। एक भैंस गर्भिणी होकर किसी खोह में जा छिपी और वहाँ नर बच्चा पैदा हुआ। उसका नाम दरवी हुआ । उसकी मां ने उसे बाप की स्थिति बता दी । देवों की रक्षा में वह बड़ा हुआ। उसने बाप से युद्ध कर उसे मार दिया । विजय के घमण्ड से वह उद्दण्ड होकर देवताओं से लड़ने के लिए उत्सुक हुआ। देवताओं ने समुद्र देव को बड़ा कहा पर वे लड़ने को तैयार न हुए। उन्होंने उसे ईश्वर के पास भेज दिया । ईश्वर ने कहा तुम वाली के पास जाओ उसके हाथ से मर कर खर के पुत्र मङ्कुरकण्ठ होकर राम के तीर से मारे जाओगे । दरवी