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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 428

युद्ध के लिए वाली के पास गया, खुले मैदान में दोनों बराबर रहे। दूसरे दिन खोह में लड़ाई होने का निश्चय हुआ। वाली ने सुग्रीव को खोह के द्वार पर नियुक्त करके कहा बहता हुआ रुधिर देखना, रुधिर काला हो तो दरवी का रुधिर होगा। रुधिर का रङ्ग हल्का हो तो समझना वाली मारा गया। उस समय खोह का द्वार बन्द कर तुम चले जाना। सात दिन तक युद्ध होता रहा। अन्त में वाली ने पूछा तुममें इतनी शक्ति कैसे आयी। शक्ति के नशे में कृतज्ञता भूल कर वह बोल उठा मेरी शक्ति मेरे सींगों में है। वाली ने देवताओं से कहा यह कृतघ्न है। इसका साथ छोड़ दो। देवों की सहायता से वञ्चित होते ही वाली के घूंसे से वह मर गया। वर्षा के कारण उसके रक्त का काला रंग फीका हो गया। सुग्रीव को वाली के मरने की भ्रान्ति हो गयी। वह खोह का द्वार पाषाण से बन्द कर चला गया। वाली ने दरवी का सिर काट लिया द्वार पर आया तो द्वार को बन्द पाकर सोचा सुग्रीव मेरी गद्दी लेना चाहता है। क्रोध में दरवी का सिर द्वार के पत्थर पर दे मारा जिससे खोह का द्वार खुल गया। महल में आकर उसने सुग्रीव को निकाल दिया। सुग्रीव जङ्गल में भटक रहा था। हनुमान् से भेंट हो गयी। दोनों साथ- साथ रहने लगे। सुग्रीव ने अपनी गाथा राम को सुनायी। दोनों में यह निश्चय हुआ कि सुग्रीव राम की सहायता से वाली से लड़े और सुग्रीव की सहायता से दशकण्ठ को पराजित कर सीता को वापस लाया जाय।

वाली-वध सुग्रीव ने बताया कि वाली ने प्रतिज्ञा-भङ्ग कर मेरी तारा को धर्मभ्रष्ट किया और ईश्वर का शाप है कि नारायण के अवतार के हाथ उसका वध होगा। वाली को ईश्वर ने एक वर दिया था कि जिस किसी के साथ तुम लड़ोगे उसका आधा बल तुममें आ जायेगा। सुग्रीव को बचाने के लिए राम ने अपने तीरों को जल में भिगोया और जल को सुग्रीव के सिर पर छोड़ दिया। अब किष्किन्धा जाकर सुग्रीव ने वाली को युद्ध करने के लिए ललकारा। राम ने सुग्रीव को वचन दिया था कि लड़ते समय वे वाली को तीर मारेंगे। परन्तु दोनों की कुश्ती होते समय दोनों की तेजी से राम को पहचानना कठिन हुआ। वाली ने शीघ्र ही सुग्रीव को पछाड़ दिया और चक्रवाल पहाड़ पर दे मारा। परन्तु तीर के पवित्र जल ने सुग्रीव की रक्षा की। सुग्रीव ने राम के द्वारा बाण न छोड़ने की शिकायत की। राम ने कहा कि वे वाली को पहचान न सके। सुग्रीव के हाथ में चिह्न बाँध दिया। दूसरे दिन कुश्ती के समय राम ने बाण छोड़ा। बाली ने बाण पकड़ लिया। वाली ने राम को धिक्कारा तब राम ने नारायण रूप धारण कर उसको अपनी प्रतिज्ञा-भङ्ग की याद दिलायी। वाली डर गया, उसने सुग्रीव और अङ्गद को राम की शरण में सौंपा और अपना अन्त करने को तैयार हो गया। राम ने उसकी शर्त को समझा और चाहा कि उसका प्राणान्त न हो। राम ने कहा केवल एक रक्त-बिन्दु दे दो जिससे ब्रह्मास्त्र का प्रभाव बना रहे। तुम्हारे शरीर के बाल के सातवें भाग से अधिक घाव न होगा। परन्तु वाली ने अपमान सूचक घाव को अङ्गीकार नहीं किया और मृत्यु को ही अपनाना उचित समझा, क्योंकि वह यश का पुजारी था। उसने सुग्रीव को रामभक्ति करने का उपदेश दिया और तीर अपने हृदय में वेध कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं।

युद्ध की तैयारी वाली की अन्त्येष्टि और सुग्रीव को गद्दी हुई। राम नगर में नहीं गये। सुग्रीव ने राम से गन्धामास पर्वत पर रहने की प्रार्थना की और स्वयं खिदखिन में सेना एकत्रित करने के लिए गया। राम को गन्धामास में एक मोर मिला, जिसने सीता की सूचना दी। एक बन्दर मिला, जिसकी ओर सीता ने वस्त्र फेंक दिया था कि राम को दे देना। राम ने सात दिन प्रतीक्षा की, लेकिन सुग्रीव के लौटने के कोई लक्षण नहीं दीख पड़े। लक्ष्मण उसकी तलाश में निकले। सुग्रीव ने कहा कि देश में कुछ गड़बड़ मची है। सेना एकत्रित करने में समय लगेगा। प्रातः सुग्रीव और हनुमान् राम से मिले। सुग्रीव ने बताया कि वाली का मित्र जम्बू, मित्र की मृत्यु का बदला लेने के लिए,