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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 429

३५२ रामायणमीमांसा द्वादश खिदखिन के लोगों को एकत्रित कर रहा है। राम ने पत्र लिख कर उसको बुलाया। जम्बू को पत्र तो मिला, पर उसे विश्वास नहीं हुआ कि राम का ही पत्र है। फिर भी उसने अपनी भक्ति का आश्वासन दिया। हनुमान् इससे सन्तुष्ट नहीं हुए, अतः उन्होंने माया से महल के सब लोगों को सुला दिया और पलंग सहित जम्बू को राम के समक्ष उपस्थित कर दिया। वह जागा तो देखा कि वह नारायण के समक्ष है। उसने निःसंकोच नारायण के प्रति भक्ति प्रकट की। इस तरह जम्बू और सुग्रीव दोनों की सेना इकट्ठी हो गयी। हनुमान् की लङ्का-यात्रा जब सेना की तैयारी हो गयी तब निश्चय हुआ कि हनुमान्, जम्बू, नल तथा नीलवद् की अध्यक्षता में एक परीक्षक दल भेजा जाय । वह सीता के निवास-स्थान का पता लगाये। राम ने हनुमान् को अँगूठी दी और सीता का चीर दिया जिससे सीता जान सके कि यह राम का ही दूत है। हनुमान् को भय था कि शायद वे मुझे शत्रु ही समझें, क्योंकि राक्षस भी इन चिह्नों को कपट से प्राप्त कर सकते हैं। इसपर राम ने मिथिला के महलों की खिड़की में से विवाह के पहले उन दोनों ने एक दूसरे को देखा था और जिस प्रकार दोनों के हृदयों में प्रेम का बीज उगा था इत्यादि ऐसी बातों को बताया जिन्हें वे दोनों ही जानते थे और कोई नहीं। ये लोग उड़ते हुए यमन नगर में आये । वहाँ एक अप्सरा पुष्पमाली दिन काट रही थी। राम के सैनिकों से भेंट होने पर उसकी शाप-मुक्ति होनी थी। हनुमान् ने उससे कहा मैं राम का दूत हूँ; उसे इसमें शङ्का हुई । इसपर हनुमान् ने चतुर्मुखी विराट् रूप दिखाया । उनके चारों मुखों से अनेक सूर्य, चन्द्र तथा तारागण चमकने लगे। पुष्पमाली मान गयी और उसने हनुमान् को लङ्का का रास्ता बता दिया। हनुमान् को उस अप्सरा से प्रेम हो गया। उन्होंने उसे स्वर्ग भेज दिया। वह शाप-मुक्त हो गयी। आगे चलने पर एक अत्यन्त वेगवती नदी मिली, जिसको पार करना कठिन था। हनुमान् ने अपनी पूँछ फैला दी उसी पर चढ़कर सब बन्दर पार हो गये। आगे समुद्र मिला। वह पारावारविहीन था। हनुमान् बोले कि शतायु के समान यशस्वी मृत्यु मुझे प्रिय है, परन्तु यह स्वीकार नहीं कि समुद्र से हार मान लूँ । शतायु का नाम आते ही एक जादू हो गया। निकटस्थ पहाड़ की खोह से समवादी नाम का एक पक्षी निकला जो शतायु का बड़ा भाई था। उसके पर कटे हुए थे। जब शतायु अनजान बालक था तब उसने उषःकाल में खिड़की से सूर्य को देखा तो उसने उसे कोई सुन्दर फल समझा और उसे लेने के लिए उड़ा । भाई को विपत्ति से बचाने के लिए समवादी ने उसको अपने परों में छिपा लिया, अतः सूर्य भगवान् का समस्त क्रोध अपने ही ऊपर ले लिया। उसके समस्त पङ्ख जल गये। सूर्य- नारायण ने कहा कि उसके नये पङ्ख तभी उगेंगे जब राम का दल तीन बार स्वागत-ध्वनि करेगा। अन्त में आज वह अवसर आ ही गया। वह समय हर्ष का भी था, शतायु की मृत्यु का दुःखद समाचार सुना, परन्तु स्वागत-ध्वनि ने नये पर उपजा दिये जिससे नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार हुआ। वह आकाश में उड़ने लगा। कृतज्ञ पक्षी ने कहा कि मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं तुम सबको गन्धशिखर पर ले चलता हूँ, जो हेमतीरन और लङ्का के बीच में है। जब वे वहाँ पहुँचे तो समवादी ने हनुमान् को नीलाचल पर्वत दिखलाया जिसकी ऊँची चोटी आसमान से बात करती थी । हनुमान् ने एक छलाँग मारी और वहाँ से निर्दिष्ट स्थान की ओर उड़े। मार्ग में एक भयानक राक्षसी मिली, जिसको दशकण्ठ ने समुद्र को सुरक्षित रखने के लिए नियुक्त किया था। हनुमान् उसके मुँह में घुस गये और उसकी आँते बाहर निकाल लीं। वह मर गयी । उनकी छलाँग इतनी बड़ी थी कि वे नीलकाल पर्वत के भी आगे बढ़ गये और मौलाह पर्वत पर पहुँच गये, जहाँ नारद ऋषि रहते थे। हनुमान् ने एक रात रहने की अनुमति माँगी, नारद ने एक झोपड़ी बता दी। हनुमान् ने नारद की महत्ता देखने के लिए अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि वह झोपड़ी में न समाये। पर नारदजी की शक्ति से झोपड़ी बढ़ती गयी। नारद ने ऐसी वर्षा बरसायी कि हनुमान् का शरीर ठिठुर कर पहला जैसा ही हो गया। ऋषि हनुमान् को जाड़ा खाते छोड़ कर तालाब में घुस गये। एक लकड़ी