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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३५३ को जोंक बना दिया। हनुमान् प्रातः स्नानार्थ घुसे तो वह हनुमान् की दाढ़ी में चिपक गयी। हनुमान् ऋषि की शरण गये, तब वह छूट गयी। लङ्का-दहन हनुमान् लङ्का पहुँच गये। उसके संरक्षक चतुर्भुजी और अष्टभुजी थे। उन्हें मार कर हनुमान् राक्षस के रूप में लङ्का में प्रविष्ट हुए। अँधेरी रात थी। सहस्रपति ब्रह्मा की सृष्टि का सौन्दर्य नहीं दिखता था। हनुमान् ने माया के जोर से सब को सुला दिया। दशकण्ठ के महलों में घुस गये। पर सीता को न पाया। नारद के पास जाकर परामर्श किया। उनके परामर्श से छोटे बन्दर के रूप में वाटिका में घुसे। वहाँ सीता इस प्रकार छिपी थी जिस प्रकार बादलों में चन्द्रमा। फिर रात का समय हुआ तो दशकण्ठ नारायण-पत्नी सीता को मनाने लगा। अनुनय- विनय की, परन्तु सीता के भक्तिपूर्ण शुद्ध हृदय में बुरी भावना नहीं उठ सकती थी। वह निराश होकर लौट गया। सीता ने संतप्त होकर फाँसी लगानी चाही। यह देख हनुमान् चौंक पड़े। वह वृक्ष पर चढ़ गये रस्सी की गाँठ खोल दी। सीता को जीवित जानकर उन्हें प्रसन्नता हुई। उन्होंने सीता को अपना परिचय दिया। सीता को हनुमान् की सत्यता पर विश्वास हुआ तो मुख पर हर्ष के आँसू बहने लगे। हनुमान् ने चाहा कि सीता को अपनी हथेली पर बैठा कर राम के पास ले जायें, परन्तु सीता इसके लिए राजी नहीं हुई। दशकण्ठ द्वारा अपहरण किये जाने से उसका बहुत बड़ा अपमान हो चुका था। वह नहीं चाहती थी कि दूसरी बार वह किसी पुरुष के द्वारा भाग निकले। वह राम के लिए जीवित रहने को तैयार हो गयी। हनुमान् ने दशकण्ठ के बाग के बहुत से पेड़ उखाड़ दिये। बहुत से राक्षस उनपर झपटे पर सब मारे गये। दशकण्ठ के सहस्र कुमार भी कुछ न कर सके। इन्द्रजित् आगे बढ़ा, राक्षस की शक्ति की परीक्षा के लिए इन्द्रजित् की रस्सी से बँध गये। दशकण्ठ के सामने लाये गये। दशकण्ठ ने उनकी वीरता की प्रशंसा की और अपनी सेना में सम्मिलित होने को कहा। हनुमान् ने स्वीकार नहीं किया। राक्षसों ने उनकी पूँछ में रुई लपेट कर आग लगा दी। समस्त शरीर जल उठा। हनुमान् पर्वताकार हो गये। एक झटके से उन्होंने बन्धन तोड़ दिये। एक छत से दूसरी छत पर कूद कूद कर सारी लङ्का जला डाली। रावण का महल जल कर राख हो गया। समुद्र में कूद कर उन्होंने आग बुझायी, परन्तु पूँछ जलती ही रही। नारद से पूछा तो उन्होंने कहा तुझे अपने छोटे से कुएँ का पता नहीं है। हनुमान् समझ गये। पूँछ मुख में रख ली आग बुझ गयी। बाद में अपने साथियों के पास पहुँच कर राम के पास पहुँच गये। राम को सब समाचार सुनाया। राम की सेना लङ्का पर चढ़ायी करने चल पड़ी। समुद्रदेव लङ्का घेरे हुए हलरें मार रहे थे। विसेक (विभीषण) की रामभक्ति लङ्का-दहन से हानि अवश्य हुई थी पर दशकण्ठ निश्चिन्त था, क्योंकि सब देवता उसके वश में थे। उसने स्वप्न में देखा काली चील पश्चिम से आयी और सफेद दक्षिण से आयी, दोनों लड़ पड़ीं। काली मर गयी। उसके शरीर से एक राक्षस उत्पन्न हुआ। उसने यह भी देखा कि नारियल में तेल डाल कर बत्ती रख कर अपने हाथ में लिये एक स्त्री आयी। उसने बत्ती जलायी। बत्ती ने समस्त दीपक को जला दिया। आग हथेली तक पहुँच गयी। उसके शरीर में जलन होने लगी। उसकी आँखें खुल गयीं। वह भय से काँप उठा। सुबह उसने विसेक को बुलाया और स्वप्न का अर्थ पूछा। विसेक ने बताया काली चील दशकण्ठ हैं और सफेद चील राम हैं। नारियल लङ्का है, तेल दशकण्ठ-वंश है, बत्ती दशकण्ठ है, स्त्री समनखा है और ज्वाला सीता है। नक्षत्रों द्वारा दशकण्ठ पर आनेवाली विपत्ति के सूचनार्थ ही स्वप्न है। इसका एक ही उपाय है कि सीता को लौटा कर क्षमा माँग ली जाय। पर रावण ४५