रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको यह सब नहीं सुहाया। वह विभेक पर क्रुद्ध हुआ। विभेक को लङ्का से निकाल दिया। त्रिजटा को सीता पर पहरा देने को नियुक्त कर दिया। विभेक बन्दरों की छावनी में आया। सेना देख कर उसे आश्चर्य हुआ। सुग्रीव ने बन्दरों को आज्ञा दी। वे अपनी शक्ति प्रदर्शन करें। किसी ने पहाड़ हथेली पर रख लिये, किसी ने सूर्य को छिपाकर संसार को अन्धकारमय बना दिया, किसी ने समुद्र को सुखा डाला और किसी ने प्रलय का तूफान उठा दिया। इसकी खबर दशकण्ठ तक पहुँची। बीसों कान खड़े हो गये। कोलाहल मच गया। दशकण्ठ ने राक्षस शुक्रसर को शक्ति जांचने के लिए भेजा, क्योंकि उन सबको रामसेना की शक्ति पर विश्वास न था। राक्षस चील बन कर गया। वहाँ जाकर बन्दर बन गया। विभेक ने उसे जान लिया एवं हनुमान् को सूचित कर दिया। हनुमान् ने तुरन्त हथेली इतनी बड़ी बना ली मानो वह कोई बड़ा तम्बू हो। उससे सेना को ढंक लिया। सारे बन्दर एक एक करके उसकी अङ्गुलियों की सन्धियों से निकलने लगे। अन्त में शुक्रसर निकला। उससे और बन्दरों से भिन्नता थी। उसकी छाया नहीं पड़ती थी। उसकी आँखों की पलकों में कम्पन नहीं था। वह पहचान लिया गया। उसपर मार पड़ी। उसने जाकर अपने राजा को सब हाल बताया। दशकण्ठ स्वयं साधु बन कर आया। राम ने आतिथ्य सत्कार किया। विभेक ने पहिचान लिया। फिर भी दशकण्ठ ने अपनी माया से उसे गूँगा कर दिया, जिससे वह बोल न सका। दशकण्ठ राम को लङ्का पर चढ़ाई करने से रोकना चाहता था, परन्तु उसका प्रयत्न व्यर्थ हुआ, क्योंकि राम पीछे हटना जानते ही न थे। दशकण्ठ ने विभेक की लड़की बेंजकाया को आज्ञा दी कि तू सीता का रूप धारण कर शत्रुदल के निकट जलधारा में ऐसे तैरने लग जिससे सब समझें कि सीता मर गयी। राम प्रातः स्नान को गये तो वैसे दृश्य देखकर वे बड़े दुःखी हुए। लक्ष्मण भी मृत सीता को देख कर रोने लगे। विभेक, हनुमान् आदि भी वहाँ गये। राम को लगा कि हनुमान् की धृष्टता का ही रावण ने यह बदला चुकाया होगा। हनुमान् सीता की उस लाश को देखते रहे। उन्होंने सोचा यह बहाव के ऊपर की ओर तैर रही है और सड़ी भी नहीं है। हनुमान् की सूचना पर उसे चिता पर रखा गया तब बेंजकाया चीख पड़ी। पवनसुत ने लपक कर उसे पकड़ लिया। सुग्रीव की मार से उसका भेद खुल गया। विभेक की लड़की जान कर राम ने कहा इसका न्याय विभीषण ही करेंगे। विभेक ने निष्पक्ष हो उसे मृत्युदण्ड सुनाया। इससे प्रसन्न होकर राम ने उसे क्षमा प्रदान किया। हनुमान् का उससे प्रेम हो गया। उससे एक पुत्र हुआ जिसका नाम असुरपाद था। सेतुबन्ध सेना पार करने के लिए समुद्र में पुल बाँधने का निर्णय हुआ। काम करने में नीलवद् का हनुमान् से झगड़ा हो गया। राम ने नीलवद् से कहा तुम सुग्रीव के स्थान में राज करो और रसद पहुँचाओ। हनुमान् को सात दिन में पुल तैयार करने की आज्ञा हुई। हनुमान् ने बड़े जोर से काम लगा दिया। दशकण्ठ को पुल बनने का शोर सुनायी पड़ा। उसकी नींद उड़ गयी। उसने अपनी पुत्री स्वर्णमच्छा को पुल में विघ्न डालने को कहा। वह अपनी सहेलियों के साथ समुद्र में डाले गये पत्थरों को समुद्र की तह में लुप्त करने लगी। हनुमान् ने गोता लगा कर सब कुछ जान लिया और उनको वैसा करने से विरत होने को बाध्य कर दिया। हनुमान् का स्वर्णमच्छा से प्रेम हो गया। उससे भी हनुमान् का पुत्र मच्छानु हुआ। पुल तैयार हो गया। इन्द्र ने अपना रथ दिया जिसको मातलि हाँक रहा था। राम पुल से लङ्का पहुँचे। एक हरे भरे स्थान पर जहाँ मखमल के समान घास उगी थी, सेना ने पड़ाव डाला। परन्तु वह एक मायावन था, वहाँ न कोई पक्षी गीत गाता था, न फल खाता था। दशकण्ठ की आज्ञा से भानुराज वानरसेना सहित जंगल को जमीन में धंसा देना चाहता था। हनुमान् यह चाल समझ गये। उन्होंने भूमि के भीतर प्रविष्ट होकर उस भानुराज को एक ही घूंसे से खत्म कर दिया।