रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 432, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३५५ राम ने शान्ति की कामना से अङ्गद को दूत बनाकर भेजा। अनेक राक्षसों को मार कर वे दरबार में पहुँचे। अङ्गद ने रावण के दरबार में दूत के बैठने का स्थान न देख कर अपनी पूंछ बढ़ा कर कुण्डली बना कर दशकण्ठ के मंच से भी ऊँचा स्थान बना लिया। उस गद्दी पर बैठकर राम का संदेश बड़ी तीव्र भाषा में कहना उसने आरम्भ किया। दशकण्ठ को क्रोध आया। उसने अपने चार वीरों को अङ्गद को मारने के लिए नियुक्त किया। अङ्गद ने सबको मार गिराया और अपने पड़ाव पर आ गये। दशकण्ठ ने राम की सेना को मारने के लिए माया रचने का स्वयं भी यत्न किया। ब्रह्मा ने उसको एक छत्र दिया था। उसके खुलने से सूर्य छिप जाता था। जगत्भर में अँधेरा छा जाता था। उसने वह छत्र खोल दिया। चारों ओर अँधेरा छा गया। राम-सेना को लङ्का दिखायी नहीं पड़ती थी, परन्तु सुग्रीव ने आक्रमण करके उस छत्र को तोड़ डाला। सूर्य किरणें फिर निकल आयीं। आकाश से लौटते हुए सुग्रीव ने दशकण्ठ के मुकुटों को छीन कर राम के चरणों पर लाकर रखा। अब रावण चिन्तित होने लगा। राम का हरण दशकण्ठ ने मारीच-पुत्र वैयविक को पाताल भेजा। सहमालिवन के पुत्र मैयराव को लङ्का बुलाया। उससे सभी डरते थे। उसने अपने गुरु सुमेध मुनि से युद्धविद्या के रहस्य सीखे थे। सुमेध मैयराव से बहुत खुश था। उसने मैयराव की आत्मा को उसके शरीर से निकाल कर भौंरे के रूप में त्रिकूट पर्वत पर छिपा दिया था, इससे वह अमर सा हो गया था। उसको मृत्यु का भय न था। उसके पास एक मायावी राख थी जिससे वह नींद बुला सकता था। वह इस राख को लेकर बन्दरों के पड़ाव पर आया। बहुत सावधानी से आने पर भी वह विभीषण की आँख से न बच सका। विपत्ति से बचने का उपाय सोच लिया गया। हनुमान् ने ब्रह्मा के बराबर मुख बनाकर उसमें राम को रख लिया। फिर भी मैयराव की माया के सामने उसकी कुछ न चल सकी। मैयराव बन्दर बन कर बन्दरों में मिल गया। वहाँ उसे मालूम हुआ कि विभेक पहले ही सचेत कर रहा था कि यह माया प्रातःकाल के पूर्व ही समाप्त हो जावेगी। मैयराव के पास एक बाँसुरी थी। वह सेनादल को छोड़कर पहाड़ पर चढ़ गया और वहाँ उसने अपनी बाँसुरी उठायी। माया के बल से आकाश एक स्थिर समुद्र जैसा दिखाई पड़ने लगा। प्रातःकाल के तारे चमकने लगे, बन्दरों ने हर्ष मनाते हुए सोचा कि वह रात बीत गयी। निश्चिन्त होकर पहरे ढीले कर दिये। मैयराव अपनी माया की राख लेकर आया और बाँसुरी बजाने लगा। धीरे-धीरे सब बन्दरों को नींद आ गयी। सुग्रीव सोया पड़ा था। हनुमान् निर्जीव से दिखायी पड़ते थे। सीता के प्राणप्रिय राम भी बेहोश थे। सबको बेहोश देख मैयराव धीरे-धीरे आया। राम को उठाकर पाताल ले गया। बन्दर जागे तो विपत्ति का पता लगा, पर विभेक तो अपने दिव्य चक्षु से अदृश्य को भी देख रहा था। विभेक के बताये मार्ग से हनुमान् दौड़े। एक तालाब पर पहुँचे। उसमें कमल खिले थे। उन्होंने एक कमल का पत्ता तोड़ा, उसके डंठल में एक खोखला मार्ग दिखायी दिया। हनुमान् उसमें होकर एक दीवार के पास पहुँचे, जहाँ एक राक्षस पहरा दे रहा था। उसे हनुमान् ने लात से मारा, वह मर गया और दीवार टूट गयी। हनुमान् आगे बढ़े। वहाँ एक मदमत्त हाथी मिला। हनुमान् ने उसको पछाड़ दिया। पुनश्च आगे बढ़े, एक पर्वत मिला, जिसपर आग की ज्वाला धधक रही थी। उन्होंने लात मार कर पर्वत की आग बुझा दी। फिर आगे बढ़े, मच्छर मिले जो मुर्गों के बराबर थे। हनुमान् थके नहीं बढ़ते गये। एक अन्य तालाब मिला। उसमें कमल खिले थे। वहाँ एक ऐसे व्यक्ति का मुकाबला करना पड़ा जो उनके जोड़ का था। इसपर हनुमान् के पुत्र मच्छानु का पहरा था। सुवर्णम छा उसे तट पर छोड़कर चली गयी थी। मैयराव ने उसे पाला था। पिता और पुत्र का भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध होता रहा पर किसी की विजय नहीं हुई। दोनों एक दूसरे की वीरता से चकित रह गये। पूछने पर दोनों पिता-पुत्र निकले। दोनों में युद्ध के बदले प्रेम हो गया। हनुमान् ने पाताल आने का प्रयोजन बताया। मच्छानु