रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृतघ्न न था। वह अपने पालक पिता का भेद बताने को तैयार न था पर वह अपने पिता को भी निराश नहीं कर सकता था। अजी, मार्ग तो दीखता है उसी पर क्यों नहीं चलते। हनुमान् समझ गये, उन्होंने एक कमल तोड़ा उसमें एक खोखला मार्ग दिखायी पड़ा। उसी मार्ग से वे पाताल पहुँच गये। उन्हें एक रोती हुई स्त्री के विलाप की ध्वनि सुनायी पड़ी जो समस्त पाताल में गूँज रही थी। वह मैयराव की बहन बीरबक्कन थी, जो पुत्र के लिए शोक कर रही थी। उसको आज्ञा हुई थी कि वह एक कड़ाही चढ़ाये उसमें अपने पुत्र वैयविक को राम के साथ भून डाले, परन्तु कोई माता अपने ही पुत्र को कैसे भूनती ? वह रोती पीटती कड़ाही चढ़ा कर पानी डाल रही थी। चुपके से हनुमान् आ गये। उन्होंने ढाढस दिया और कहा कि यदि तुम मुझे वहाँ ले चलो जहाँ राम को रखा गया है तो मैं तुम्हारे पुत्र की जान बचा दूंगा। यह काम कठिन था, क्योंकि बड़े-बड़े बलवान् राक्षस पहरा दे रहे थे यहाँ से गुजरने पर सबको एक तराजू पर तुलना पड़ता था। वह इतना बारीक था कि उसपर बाल बराबर भेद भी मालूम हो जाता था। तिल भर भी बोझ बढ़ने पर मौत निश्चित थी। फिर भी हनुमान् ने फाटक पर ले चलने का आग्रह किया। हनुमान् ने एक बारीक कमलतन्तु का रूप धारण कर लिया। उसके वस्त्र में लग गये, परन्तु जब वह राक्षसी तराजू पर रखी गयी तो तराजू टूट गया, राक्षसों ने उसे मारने को तलवार उठायी। वह चिल्लायी कि मेरा कोई दोष नहीं है, मेरे पास कुछ नहीं है। तलाशी में कमलतन्तु के सिवा और कुछ भी न निकला, अतः उन्होंने उसे जाने दिया। हनुमान् वहाँ पहुँचे, ताड़ वृक्षों में लोहे का पिंजड़ा रखा था उसमें राम पड़े सो रहे थे। उन्हें कुछ पता नहीं था। रामभक्त हनुमान् ने उन्हें धीरे से उठाया और सुरक्षित स्थान पर रख दिया। वे स्वयं मैयराव की खोज में चले। वह मिल गया। दोनों में इतना घोर युद्ध हुआ कि पाताल हिल गया। हनुमान् ताड़ वृक्षों से उसे मारते थे पर उसपर असर नहीं होता था। उस समय बीरबक्कन ने स्मरण दिलाया कि उसकी आत्मा त्रिकूट में भौंरे के रूप में छिपी है। हनुमान् ने अपना शरीर बढ़ाया, अपना हाथ त्रिकूट तक फैलाया। भौंरे के रूप में छिपी उसकी आत्मा को मसल डाला। भौंरे के मरते ही मैयराव प्राणहीन हो गया। हनुमान् ने वैयविक को पाताल की गद्दी दी, मच्छानु को युवराज बनाया और राम को लेकर बन्दरों की छावनी में आ गये। सबको बड़ी खुशी हुई, पर राक्षसों को इससे अवर्णनीय दुःख हुआ।
कुम्भकर्ण
दशकण्ठ मैयराव के मरने से काँप उठा। उसने कुम्भकर्ण से मैयराव का बदला चुकाने के लिए कहा। उसको न्याय में श्रद्धा थी, वह सीता को लौटाने के पक्ष में था। दशकण्ठ ने कहा तू राम से डरता है। वह अस्त्र उठाकर भाई की सहायता के लिए तैयार हो गया। विभेक हाथ जोड़ कर आगे बढ़ा, पर कुम्भकर्ण न्यायप्रिय होने पर भी राजा और देश से मुंह नहीं मोड़ सकता था। उसने विभेक से कहा तुम्हारे पास यही बहाना है कि राम नारायण के अवतार हैं, पर मैं तब यह मानूंगा जब मेरे प्रश्न का समाधान करें। मूर्ख साधु कौन ? सीधे दाँत का हाथी कौन ? चालाक स्त्री कौन ? दुष्ट मनुष्य कौन ? पर इसका उत्तर किसी को नहीं सूझा। अङ्गद कुम्भकर्ण के पास भेजा गया कि वह उससे ही उत्तर लाये। अङ्गद ने कहा राम उत्तर जानते हैं, पर सही उत्तर से मिलाना चाहते हैं। कुम्भकर्ण ने राम की खिल्ली उड़ा कर अभिमान से कहा मूर्ख साधु आदमी तो स्वयं राम हैं, जो सीता को जंगल में छोड़कर चले गये। सीधे दाँतवाला हाथी दशकण्ठ है जो अपनी स्त्री से सन्तुष्ट न होकर अन्य पर दृष्टि डालता है। चालाक स्त्री सम्मनखा है। दुष्ट मनुष्य विभेक है जो अपने देश और नरेश का विरोधी है। सुग्रीव कुम्भकर्ण का युद्ध हुआ। सुग्रीव अत्यधिक बलवान् थे। वह पर्वत से विशाल वृक्ष उखाड़ कर लड़ने लगे। सुग्रीव थक गये उन्हें बगल में दबाकर कुम्भकर्ण लङ्का को चल पड़ा। हनुमान् सहायता के लिए दौड़ पड़े। कुम्भकर्ण हनुमान् का मुकाबला न कर सका। सुग्रीव को वहीं छोड़कर लङ्का भाग गया। हनुमान्