रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 434, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंने उसके नाक-कान नोच लिये । अन्त में यश की रक्षा के लिए अपनी मोक्खशक्ति महान् अस्त्र छोड़ने को तैयार हुआ, पर उसके पहले देवों की आराधना आवश्यक थी । इसलिए वह शुभ मुहूर्त में नदी किनारे अनुष्ठान करने लगा । हवन की सुगन्ध फैल गयी, फूल खिल गये, अस्त्र सामने था एवं वह समाधि लगाये बैठा था । कुम्भकर्ण की आँख खुल गयी । दुर्गन्ध से वह घबड़ा गया । देखा तो एक मृत कुत्ता नदी में बहा आ रहा है । कौए नोचकर माँस खा रहे हैं, पर यह विभेक की माया थी । विभेक ने अपने शीशे से कुम्भकर्ण का अभिप्राय जान लिया था । हनुमान् मृत कुत्ता बन गये एवं अङ्गद कौआ । कुम्भकर्ण की समाधि टूट गयी, अतः अस्त्र के महत्त्व का लाभ नहीं मिला । फिर भी वह निराश नहीं हुआ । मोक्खशक्ति लेकर शत्रुदल पर टूट पड़ा । लक्ष्मण ने सामना किया । मोक्खशक्ति लक्ष्मण के शरीर में घुस गयी । पर विभेक ने उपाय निकाल लिया । हनुमान् को स्वयं पर्वत भेजकर अमरबूटी मँगवायी और साथ ही यह कहा कि सूर्य निकलते ही उसका प्रभाव नष्ट हो जायगा । हनुमान् उड़ पड़े । उनके श्वेत अङ्ग पर लाली आ गयी । पता चला सूर्योदय होना ही चाहता है । वैसा होने पर आशाओं पर पानी फिर जाता । वह सूर्य का रथ रोकने के लिए आगे बढ़े, पर सूर्य के ताप से झुलस गये । सूर्य को भेद मालूम हुआ । उनको पश्चात्ताप हुआ कि रामदूत को भ्रम से क्षति पहुँची । सूर्य ने हनुमान् के शरीर को स्वस्थ कर दिया । हनुमान् ने गति मन्द करने की सूर्य से प्रार्थना की । मानवी घृणा या दुःख सृष्टि के नियम को रोक नहीं सकते; परन्तु सूर्य ने कहा मैं चलता तो रहूँगा पर बादलों की ओट में रहूँगा । हनुमान् आगे बढ़े, अमर बूटी को आवाज दी । उसने कहा मैं यहाँ हूँ । वहाँ गये, तो कहा मैं इधर हूँ । हनुमान् हैरान हो गये । हनुमान् ने शरीर बढ़ाकर सारा पर्वत पूँछ से लपेट 'लिया जिधर से आवाज आई वहीं से उन्होंने बूटी उखाड़ ली । बूटी तो मिल गयी, पर पाँच नदियों का जल भी चाहिये था । अयोध्या भरत के अधिकार में थी । हनुमान् डरना तो जानते ही न थे । तुरन्त अयोध्या दौड़ गये । जल लाये, बूटी आयी । लक्ष्मण स्वस्थ हो गये । लक्ष्मण के स्वस्थ होने पर राम की सेना में हर्ष फैल गया । कुम्भकर्ण ने ब्रह्मा जैसा शरीर बढ़ाकर पहाड़ की उस नदी को रोक दिया जिससे सेना पानी लेती थी । वह सात दिनों तक नदी रोके रहा । बन्दर प्यास से मरने लगे । विभेक जान गया कि कुम्भकर्ण का काम है । परन्तु उसे पता नहीं था कि वह कहाँ है । उसकी फूलदासियों को ही पता था । विभेक की सूचना पर हनुमान् चील बनकर उड़ गये । एक फूलदासी को मार डाला और उसका रूप धारण कर अन्य फूलदासियों के साथ वहाँ पहुँचे जहाँ वह पानी रोके पड़ा था । वहाँ पहुँच कर हनुमान् ने अपने रूप में प्रकट होकर कुम्भकर्ण को ऐसी लात मारी कि वह खड़ा हो गया । पानी बहने लगा । प्यासे बन्दरों की मृत्यु टल गयी । कुम्भकर्ण हनुमान् का सामना न कर सका । दूसरे दिन राम ने उसका सामना किया और वह नारायण के ब्रह्मास्त्र से मर गया । मरते समय उसने देखा साक्षात् नारायण चारों हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और त्रिशूल लिये हैं । उन्होंने पश्चात्तापशील रामभक्त के लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया ।
लक्ष्मण-इन्द्रजित् का युद्ध
इन्द्रजित् मण्डो का पुत्र था । ईश्वर से ब्रह्मपाश, ब्रह्मा से नागपाश तथा विष्णु से विष्णुयन उसे प्राप्त थे । इन्हीं अस्त्रों के बल पर उसने इन्द्र को जीता था । लक्ष्मण ने उसका सामना किया । भयंकर युद्ध हुआ । यह पहला अवसर था । जब वह विजय के बिना रणक्षेत्र से लौटा था । उसने कुम्भनीय यज्ञ से अस्त्र-शक्तियों को जगाना चाहा । वह आकाशगिरि में जाकर यज्ञ करने लगा । लड़का की रक्षा में मङ्कुकण्ठ खरपुत्र, जो पिछले जन्म में दरवी था, नियुक्त हुआ । उसने खूब युद्ध किया और राम के हाथ मारा गया । विभेक ने इन्द्रजित् के यज्ञ में बाधा डालने के लिए सब उपाय बना दिये । जिस वृक्ष के नीचे वह यज्ञ करता है, यदि कोई रीछ उसे तोड़ दे तो यज्ञभङ्ग हो जायगा । जम्बूवान ने यह काम अपने ऊपर लिया । रीछ का रूप धारण कर वह वहाँ पहुँचा । इन्द्रजित् ध्यानमग्न था । मन्त्रों के प्रभाव से संसार भर के सर्प नागपाश को घोर विषैला बनाने हेतु अपना विष प्रदान कर रहे थे । इतने में वृक्ष टूट