रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंगया। सर्पों ने समझा गरुड़ आ गये, वे सब भूमि में समा गये। जाम्बवान आकाश में उड़ कर राम-सेना में पहुँच गये। विघ्न के कारण इन्द्रजित् प्रसुप्तशक्ति बाणों को ही लेकर युद्ध के लिए चल पड़ा। उसने बड़ी शक्ति से राम-सेना पर आक्रमण किया, परन्तु लक्ष्मण के सामने राक्षस मरने लगे। घोर युद्ध हुआ। किसी की जीत निश्चित नहीं थी। इन्द्रजित् ने विरूपमुख को परामर्श दिया कि वह इन्द्रजित् का रूप धारण कर उसकी सेना को लेकर लड़ाई करता रहे और आकाश में जाकर नागपाश को छोड़ दे। लक्ष्मण को इसका पता लगने न पाये। शीघ्र वैसा ही हुआ। असली इन्द्रजित् को अवसर मिल गया, नागपाश से सैकड़ों साँप निकल पड़े और विष छोड़ने लगे। सेना के वानर तथा लक्ष्मण सब साँपों की लपेट में आकर बेहोश हो गये। इन्द्रजित् विजय-दुन्दुभि बजाता हुआ घर लौट गया। वानर और लक्ष्मण सब रणक्षेत्र में पड़े रहे। राम रणस्थल पर पहुँचे तो विभेष की प्रेरणा से राम ने अपना क्षैब्रत तीर आकाश में छोड़ा। फलस्वरूप गरुड़ आ गये और सर्पों का सफाया करने लगे। लक्ष्मण और उनके साथी बन्दर ऐसे उठे मानो वे सो कर उठे हों। इन्द्रजित् को आश्चर्य हुआ। फिर भी इन सबको मौत के जबड़ों में रखने के लिए वह समुद्रतट पर जाकर अस्त्रशक्ति जाग्रत् करने के लिए ईश्वर की आराधना करने लगा। हनुमान् ने इसी बीच कम्पन को मारा। दशकण्ठ ने उसकी सूचना इन्द्रजित् को दी। इस अशुभ समाचार से इन्द्रजित् का यज्ञ खण्डित हो गया। अब एक ही उपाय था कि कृष्ण गोवलि से पाशशक्ति जाग्रत् करे। वैसा करके उसने पाशशक्ति जाग्रत् कर ली। अजेय ब्रह्मास्त्र को लेकर उसने आक्रमण किया। माया के बल से इन्द्रजित् इन्द्र बन गया। देवगणों से आवृत इन्द्र के द्वारा रणक्षेत्र में स्वर्ग का-सा दृश्य आ गया। लक्ष्मण तथा वानर जो कार्य कर रहे थे क्षण भर के लिए वह भूल गये कि हम स्वर्ग में हैं या रणक्षेत्र में। उसने ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण पर छोड़ दिया। समस्त सेना धराशायी हो गयी पर हनुमान् जीवित थे। उन्होंने देख लिया अस्त्र किसने छोड़ा। उन्होंने आकाश में छलाँग मार कर नकली इन्द्र के ऐरावत की गर्दन तोड़ दी। पर इन्द्रजित् ने ऐसा घूंसा मारा कि हनुमान् भूमि पर गिर पड़े। वह विजय का डंका पीटकर घर चला गया। राम घटना स्थल पर पहुँच कर लक्ष्मण तथा सेना का हाल देखकर मूच्छित हो गये। सारा रणक्षेत्र श्मशान हो गया। रावण ने प्रसन्न होकर सीता को समाचार भेजा कि तुम्हारे पति का अन्त हो गया है तथा वानर-सेना नष्ट हो गयी है, तुम चाहो तो देख लो। त्रिजटा के साथ सीता पुष्पक पर चढ़ कर घटना-स्थल पर पहुँचीं। वहाँ का भयानक दृश्य देखकर अयोध्या-नरेश राम की लाश पड़ी है, लक्ष्मण पड़े हैं —सीता का हृदय व्याकुल होकर फटने लगा, पर त्रिजटा ने कहा ध्यान से देखो। राम मूच्छित हैं, मरे नहीं हैं। पुष्पक विमान विधवा को लेकर उड़ नहीं सकता। मण्डो ने इस बात की परीक्षा ली थी। सीता विमान पर बैठ गयी। विमान उड़ गया सीता अशोकवाटिका में आ गयीं। सीता को विश्वास हो गया कि राम मरे नहीं हैं। एक न एक दिन मेरा दुःख दूर करेंगे। विभेष कहीं काम से गये थे। लौटने पर उन्होंने सेना की यह दुर्गति देखी, पर वे निराश नहीं हुए। वह जानते थे कि हनुमान् को ईश्वर की ओर से अमरत्व का वरदान मिला है। उन्होंने एक मन्त्र पढ़कर हनुमान् की ओर फूँक मारी। हनुमान् ने आँखें खोल दीं। उन्हें परिस्थिति का ज्ञान हो गया। वे उठ खड़े हुए। रात का समय था। पड़ी हुई लाशों पर ओस की बूंदों का अमृततुल्य प्रभाव पड़ रहा था। एक एक करके सैनिक उठने लगे, पर लक्ष्मण और ब्रह्मपाश से आहत सैनिक अभी पड़े ही थे। ब्रह्मास्त्र के व्रणों का इलाज विदेह देश के आबुद्ध पर्वत की बूटियाँ ही थीं। उनका ज्ञान जाम्बवान को ही था, क्योंकि ईश्वर सेवा के समय उसे उनका परिचय हुआ था। बूटी के ऊपर एक चक्र घूमता रहता था। बूटी लेनेवाले को वह मार देता था। हनुमान् ही उसे ला सकते थे। हनुमान् दौड़कर उस पर्वत पर पहुँचे। वे जब वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि चाँद छिप गया। आकाश में अन्धकार हो गया। उन्होंने पूरा पहाड़ उठा लिया, पर पहाड़ रखा कहाँ जाय? लङ्का तो जङ्गम द्वीप था, उस पर पर्वत का टिकना संभव नहीं था। उसे उत्तर दिशा में रखा गया। उन बूटियों की सुगन्ध लगने से ब्रह्मास्त्र द्वारा मूच्छित सैनिक जागने लगे। लक्ष्मण एवं उनके साथी सब जी उठे। इन्द्रजित् चिन्तित हुआ, पर उसने सोचा