रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकि सीता के लिए ही यह सब उपद्रव हो रहा है; सीता का ही अन्त कर दिया जाय तो युद्ध का भी अन्त हो जायगा। परन्तु दशकण्ठ ऐसा नहीं चाहता था, इसलिए नकली सीता बनायी गयी। शुक्रसर ने अपना कर्तव्य पालन नहीं किया था, अतः उसे प्राणदण्ड का हुक्म हो चुका था। इन्द्रजित् के सुझाव पर दशकण्ठ ने शुक्रसर को आदेश दिया कि वह सीता का रूप धारण कर इन्द्रजित् के साथ रथ पर बैठ जाय। इस प्रकार नकली सीता को लेकर इन्द्रजित् रणक्षेत्र में पहुँचा। लक्ष्मण का सामना हुआ, परन्तु लक्ष्मण का तीर उनके धनुष में ही लटका रह गया। दुःखित सीता के ऊपर लक्ष्मण की दृष्टि पड़ी तो उनके होश उड़ गये। इन्द्रजित् ने ललकारा तो उन्हें होश आया। इन्द्रजित् ने कहा आगे आकर सीता को लो और लङ्का का पिण्ड छोड़ो। लक्ष्मण सहर्ष आगे बढ़े, पर वह सीता को शत्रु के हवाले कर अपने यश में बट्टा नहीं लगाना चाहता था। उसने तलवार से सिर काट कर लक्ष्मण की गोद में फेंक दिया। लक्ष्मण सन्न रह गये। इन्द्रजित् ने दहाड़ कर कहा अभी क्या अभी तो तुम्हारी राजधानी अयोध्या पर भी चढ़ाई करूँगा। इस तरह विजय-पताका फहरा कर अपने स्थान को लौट गया। विभेक जान गया कि यह तो शुक्रसर का सिर है। असली सीता तो अभी जीवित है, क्योंकि इन्द्रजित् कुम्भनीय यज्ञ करना चाहता है, जिससे वह अजेय हो जायेगा। विभेक लक्ष्मण को उसी स्थान पर ले गये जहाँ वह अपने को सुरक्षित समझकर यज्ञ कर रहा था। विघ्न देखकर वह उठ खड़ा हुआ। विघ्नकारियों को ढूँढने लगा वह अन्धकार उत्पन्न कर माता-पिता के दर्शनार्थ गया। आज लक्ष्मण इन्द्रजित् का सिर काटने का निश्चय कर चुके थे, परन्तु ब्रह्मा का उसे ऐसा वरदान था कि इन्द्रजित् का सिर कटकर जिस दिन भूमि में पड़ेगा उसी दिन प्रलय हो जायेगा। प्रलय की अग्नि प्रज्वलित होगी और समस्त संसार उसमें जल जायगा, इसलिए अङ्गद आकाश में उड़ गये। स्वर्गलोक में जाकर वहाँ से ब्रह्मा का एक पात्र उठा लाये, जिससे भूमि पर इन्द्रजित् का सिर गिरने न पाये। ज्यों ही वे लौटे लक्ष्मण ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उसका सिर कट कर ब्रह्मा के पात्र में गिर पड़ा। अब राम ने एक ऐसा बाण छोड़ा जिसने अग्नि उत्पन्न कर इन्द्रजित् का सिर जला कर राख कर दिया। जगत् भस्म होने से बच गया। उसका धड़ रणक्षेत्र में गिर पड़ा। वानर-सेना में विजय की उमँग छा गयी। दशकण्ठ और उसके मित्र इन्द्रजित् की मृत्यु से दशकण्ठ बहुत दुःखी हुआ और सीता को मार डालने की बात सोचने लगा, पर उसे पौवनासुर ने यह कहकर रोका कि ऐसा करना तो नामर्दी है, बदला लेना है तो राम से लड़ो। दशकण्ठ मैदान में उतरा। सेनाध्यक्ष ओर दस पुत्र उसके साथ थे, जिन्होंने वायु, अग्नि, सूर्य तथा इन्द्र को परास्त किया था। इधर भी वायुपुत्र हनुमान्, अग्निपुत्र नील नल, सूर्यपुत्र सुग्रीव तथा इन्द्रपौत्र अङ्गद विद्यमान थे। यह विचित्र बात हुई कि उनकी मृत्यु उन्हीं देवों की सन्तानों से हुई। दशकण्ठ दस भुजाओं से आक्रमण करता था, दस से दूसरों का आक्रमण रोकता था, फिर भी विजय न हुई। वह लौट गया। उसने अपने मित्र पंगताल के राजा मूलवलम को बुलाया। वह अपने भाई सहस्त्रेज के साथ आया। ईश्वर के वरदान से वह सहस्र सिर तथा द्विसहस्र भुजाओंवाला था। वह अजेय था। उसके पास एक गदा थी, जिसके नुकीले सिर से शत्रु की मृत्यु अवश्यंभावी थी। दोनों भाई बड़े उत्साह से रणक्षेत्र में आये। बन्दर उनके तेज से भाग खड़े हुए। लक्ष्मण के तीर ने मूलवलम को ढेर कर दिया, हनुमान् की बुद्धिमत्ता से सहस्त्रेज की प्रगति रुक गयी। हनुमान् एक छोटा वन्दर बनकर उसके रथपर चढ़ गये। क्रोध के जोश में उसने बन्दर को उठा लिया। बन्दर ने कहा मैं वाली का सेवक हूँ। मालिक का बदला लेने आया हूँ। राक्षस ने विश्वास करके उसे अपना मित्र बना लिया। उसने उसकी मीठी बातों में आकर गदा दे दी। गदा पाते हनुमान् ने विकराल रूप धारण कर लिया। अपनी पूँछ से लपेटकर उसके सिर काटकर राम के सामने रख दिये। सेंगआदित्य मकरकण्ठ का भाई था। उसके पास एक माया का सीसा था। उसमें जिसकी छाया पड़ती वह भस्म