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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

कि सीता के लिए ही यह सब उपद्रव हो रहा है; सीता का ही अन्त कर दिया जाय तो युद्ध का भी अन्त हो जायगा। परन्तु दशकण्ठ ऐसा नहीं चाहता था, इसलिए नकली सीता बनायी गयी। शुक्रसर ने अपना कर्तव्य पालन नहीं किया था, अतः उसे प्राणदण्ड का हुक्म हो चुका था। इन्द्रजित् के सुझाव पर दशकण्ठ ने शुक्रसर को आदेश दिया कि वह सीता का रूप धारण कर इन्द्रजित् के साथ रथ पर बैठ जाय। इस प्रकार नकली सीता को लेकर इन्द्रजित् रणक्षेत्र में पहुँचा। लक्ष्मण का सामना हुआ, परन्तु लक्ष्मण का तीर उनके धनुष में ही लटका रह गया। दुःखित सीता के ऊपर लक्ष्मण की दृष्टि पड़ी तो उनके होश उड़ गये। इन्द्रजित् ने ललकारा तो उन्हें होश आया। इन्द्रजित् ने कहा आगे आकर सीता को लो और लङ्का का पिण्ड छोड़ो। लक्ष्मण सहर्ष आगे बढ़े, पर वह सीता को शत्रु के हवाले कर अपने यश में बट्टा नहीं लगाना चाहता था। उसने तलवार से सिर काट कर लक्ष्मण की गोद में फेंक दिया। लक्ष्मण सन्न रह गये। इन्द्रजित् ने दहाड़ कर कहा अभी क्या अभी तो तुम्हारी राजधानी अयोध्या पर भी चढ़ाई करूँगा। इस तरह विजय-पताका फहरा कर अपने स्थान को लौट गया। विभेक जान गया कि यह तो शुक्रसर का सिर है। असली सीता तो अभी जीवित है, क्योंकि इन्द्रजित् कुम्भनीय यज्ञ करना चाहता है, जिससे वह अजेय हो जायेगा। विभेक लक्ष्मण को उसी स्थान पर ले गये जहाँ वह अपने को सुरक्षित समझकर यज्ञ कर रहा था। विघ्न देखकर वह उठ खड़ा हुआ। विघ्नकारियों को ढूँढने लगा वह अन्धकार उत्पन्न कर माता-पिता के दर्शनार्थ गया। आज लक्ष्मण इन्द्रजित् का सिर काटने का निश्चय कर चुके थे, परन्तु ब्रह्मा का उसे ऐसा वरदान था कि इन्द्रजित् का सिर कटकर जिस दिन भूमि में पड़ेगा उसी दिन प्रलय हो जायेगा। प्रलय की अग्नि प्रज्वलित होगी और समस्त संसार उसमें जल जायगा, इसलिए अङ्गद आकाश में उड़ गये। स्वर्गलोक में जाकर वहाँ से ब्रह्मा का एक पात्र उठा लाये, जिससे भूमि पर इन्द्रजित् का सिर गिरने न पाये। ज्यों ही वे लौटे लक्ष्मण ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उसका सिर कट कर ब्रह्मा के पात्र में गिर पड़ा। अब राम ने एक ऐसा बाण छोड़ा जिसने अग्नि उत्पन्न कर इन्द्रजित् का सिर जला कर राख कर दिया। जगत् भस्म होने से बच गया। उसका धड़ रणक्षेत्र में गिर पड़ा। वानर-सेना में विजय की उमँग छा गयी। दशकण्ठ और उसके मित्र इन्द्रजित् की मृत्यु से दशकण्ठ बहुत दुःखी हुआ और सीता को मार डालने की बात सोचने लगा, पर उसे पौवनासुर ने यह कहकर रोका कि ऐसा करना तो नामर्दी है, बदला लेना है तो राम से लड़ो। दशकण्ठ मैदान में उतरा। सेनाध्यक्ष ओर दस पुत्र उसके साथ थे, जिन्होंने वायु, अग्नि, सूर्य तथा इन्द्र को परास्त किया था। इधर भी वायुपुत्र हनुमान्, अग्निपुत्र नील नल, सूर्यपुत्र सुग्रीव तथा इन्द्रपौत्र अङ्गद विद्यमान थे। यह विचित्र बात हुई कि उनकी मृत्यु उन्हीं देवों की सन्तानों से हुई। दशकण्ठ दस भुजाओं से आक्रमण करता था, दस से दूसरों का आक्रमण रोकता था, फिर भी विजय न हुई। वह लौट गया। उसने अपने मित्र पंगताल के राजा मूलवलम को बुलाया। वह अपने भाई सहस्त्रेज के साथ आया। ईश्वर के वरदान से वह सहस्र सिर तथा द्विसहस्र भुजाओंवाला था। वह अजेय था। उसके पास एक गदा थी, जिसके नुकीले सिर से शत्रु की मृत्यु अवश्यंभावी थी। दोनों भाई बड़े उत्साह से रणक्षेत्र में आये। बन्दर उनके तेज से भाग खड़े हुए। लक्ष्मण के तीर ने मूलवलम को ढेर कर दिया, हनुमान् की बुद्धिमत्ता से सहस्त्रेज की प्रगति रुक गयी। हनुमान् एक छोटा वन्दर बनकर उसके रथपर चढ़ गये। क्रोध के जोश में उसने बन्दर को उठा लिया। बन्दर ने कहा मैं वाली का सेवक हूँ। मालिक का बदला लेने आया हूँ। राक्षस ने विश्वास करके उसे अपना मित्र बना लिया। उसने उसकी मीठी बातों में आकर गदा दे दी। गदा पाते हनुमान् ने विकराल रूप धारण कर लिया। अपनी पूँछ से लपेटकर उसके सिर काटकर राम के सामने रख दिये। सेंगआदित्य मकरकण्ठ का भाई था। उसके पास एक माया का सीसा था। उसमें जिसकी छाया पड़ती वह भस्म

३६० रामायणमीमांसा द्वादश हो जाता था, पर वह सीसा ब्रह्मा के पास रहता था। अङ्गद सेंगआदित्य के सेनाध्यक्ष का रूप धारण कर ब्रह्मा के पास गये और उस सीसे को ले आये। उस विषैले अस्त्र से वञ्चित होने के कारण वह राक्षस भी राम के हाथ मारा गया। अचानक उसे स्मरण हुआ कि चक्रवाल का राजा सतलुंग और त्रिशिरा का बेटा त्रिमेध जीवित हैं। उनका उसने आह्वान किया। वे बड़ी सेना लेकर आये। राम के तीर से सतलुंग मारा गया। त्रिमेध मारे भय के प्राण लेकर भागा। हनुमान् ने उसका पीछा किया। वह भी मारा गया। अब दशकण्ठ ने अपनी शक्ति से लड़ने का निश्चय किया। वह अपने मांस को हीरा बना सकता था। अङ्गुलियों में मृत्युदेव की शक्ति भर सकता था। नन्दक के रूप में ईश्वर की सेवा करके वह शक्तिसम्पन्न हुआ था, पर इसमें शर्त यह थी कि वह सात दिन तक प्रसुप्त सागर के समान शान्त रहे। क्षणिक क्रोध या अशान्ति से वरदान निष्फल हो जाता था। वह नीलकाय पर्वत की खोह में तप और यज्ञ करने लगा। परन्तु हनुमान् की शक्ति का अनुमान नहीं था। बिभेक के इशारे पर हनुमान्, नील, नल और अङ्गद वहाँ पहुँच गये, पर माया से खोह का द्वार बन्द था। किसी स्त्री के अशुद्ध पैर के धोवन जल के छिड़के जाने पर वह खुल सकता था। हनुमान् अपनी राक्षसी बैंञ्जकाया पत्नी से वैसा पानी लाये। उसके छिड़कते ही खोह का द्वार खुल गया। तीनों भीतर जाकर उसको काट कर नोच कर क्रोध भड़काने लगे, पर वह विचलित नहीं हुआ। हनुमान् रानी मण्डों को उठा लाया; लङ्का की रानी को बानर के हाथ में देखकर रावण हनुमान् से युद्ध करने बढ़ा। मन के क्षुब्ध होने से वर का प्रभाव समाप्त हो गया। अब अष्टाङ्ग राजा सद्धासुर और दूषणपुत्र विरूणचम्बक युद्ध के लिए आये। सद्धासुर को वरदान था कि वह समस्त देवलोक के शस्त्रों को प्राप्त कर सकता था और अपने घोड़े के साथ अदृश्य हो सकता था। हनुमान् ने बन्दरों से कहा तुम बादलों में छिप जाना, सद्धासुर की प्रार्थना पर देवलोक से देव आयुध डालें तो बीच में ही लपक कर ले लेना। इसके बाद हनुमान् ने उसको ललकारा, उसने देवताओं से अस्त्रों की माँग की, पर वे बीच में ही बन्दरों द्वारा लपक कर ले लिये गये। वह अपनी ही शक्ति पर लड़ने आया। हनुमान् के द्वारा मारा गया। विरूण- चम्बक अदृश्य होकर सेना का संहार करने लगा। राम ने एक मौत का बुझा बाण छोड़ा जिससे उसके साथी और अदृश्य घोड़ा मर गया। उसने एक रूमाल निकाला, माया के बल से नकली रूप बना कर लड़ता रहा और स्वयं आकाश पर्वत में चला गया। एक वानरिन अप्सरा ने उसे समुद्रफेन में छिपने का परामर्श दिया, पर वह हनुमान् के चंगुल में आ ही गया। हनुमान् उस पर्वत पर पहुँच कर वानरिन से मिले। वह युगों से उनकी प्रतीक्षा में थी। वह कभी ईश्वर की आज्ञा का पालन करना किसी मित्र से बातचीत के प्रसंग में भूल गयी थी, अतः ईश्वरकोप से वह पतित हो गयी थी। ईश्वर ने कहा था विरूणचम्बक की खोज में जब हनुमान् की सहायता करेगी तब शापमुक्त होगी। हनुमान् ने बड़ा सुन्दर रूप बना कर उसके पास जाकर अपना मुँह खोलकर उसमें चाँद और सूर्य दिखाये। उसे विश्वास हो गया कि यह हनुमान् है। वह हनुमान् की हो गयी। उसका शाप छूट गया। इस अप्सरा के बताये मार्ग पर चलकर हनुमान् वहाँ पहुँच गये, जहाँ फेन में वह राक्षस पड़ा था। हनुमान् के वहाँ पहुँचते ही वह माया से समुद्र में छेद कर समुद्र की तलहटी में छिप गया। हनुमान् की लम्बी पूंछ ने उसे वहाँ से भी घसीट लिया और मार दिया। अब दशकण्ठ को अपने पितामह ब्रह्मा मालीय की याद आयी जो समस्त देवों, गन्धर्वों तथा दिव्य योनियों के अध्यक्ष थे। उनके शाप से राम की मृत्यु हो सकती थी। दशकण्ठ ने इन्हें न्याय के लिए बुलाया। परन्तु वह मालीयराज राम के पितामह महाराज अजपाल का मित्र था। उसने न्यायाधीश बनने की स्वीकृति दे दी। वह स्वर्ग से लङ्का गया परन्तु वह निष्पक्षता की दृष्टि से दशकण्ठ और राम दोनों के यहाँ न जाकर रणक्षेत्र में उतरा, क्योंकि वह रणक्षेत्र तो दोनों का ही था। दशकण्ठ ने आकर शिकायत की राम ने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है। परन्तु

मालीवराज बड़े न्यायकारी थे। उन्होंने सब देवी देवताओं को इकट्ठा करके राम को बुलाया। तुरन्त ही रणक्षेत्र एक न्यायालय बन गया। वहाँ मारकाट के बदले हर्षपूर्वक वार्तालाप होने लगा। राम अपने साथियों के साथ वहाँ आये। मालीवराज ने जानना चाहा कि लड़ाई का सूत्रपात कैसे हुआ? दशकण्ठ ने कहा महाराज ! सुनिये, राम ने व्यर्थ ही एक औरत के पीछे यहाँ टण्टा बढ़ा रखा है। यह इतनी बड़ी सेना लेकर मेरी राजधानी घेरे पड़ा है। बात बहुत छोटी है। मैंने एक स्त्री को जङ्गल में अकेली देखा। उस बेचारी के साथ कोई न था। मुझे उसपर दया आयी। उसे अपने नगर में ले आया। बात केवल इतनी ही है। परन्तु राम ने सब ठीक बातें बतायीं कि दशकण्ठ मेरी पत्नी सीता को चुरा कर लाया है। सीता बुलायी गयी। उसके साथ बन्दर भी थे और राक्षस भी थे जिससे सीता को सिखाने के लिए किसी को अवसर न मिले। सीता की गवाही और देवों की साक्षिता से सिद्ध हो गया कि राम का पक्ष सत्य है। दशकण्ठ का मुंह बन्द हो गया। फिर उसने यह बहाना लिया कि उसने कई बार देवताओं को पराजित किया था, अतः वे ईर्ष्या रखते हैं। उसको सताने की तरकीबें सोचते रहते हैं। परन्तु अब मालीवराज का विश्वास दशकण्ठ से उठ गया। अन्तिम बात ने तो उसको स्पष्ट ही दशकण्ठ के विरुद्ध कर दिया। उन्होंने आज्ञा दी कि दशकण्ठ सीता को वापस कर दे, युद्ध समाप्त किया जाय। पर दशकण्ठ अड़ गया। अपनी इच्छा के सामने उसने सत्य और न्याय को त्याग दिया। न्यायाधीश की बात को मानने से इनकार कर दिया। अन्त में वे यह निर्णय करके चले गये कि दशकण्ठ राम के हाथ से मारा जाय। मालीवराज के साथी देवता भी स्वर्ग चले गये।

महास्त्र कपिलवद् दशकण्ठ ने महास्त्र कपिलवद् को जाग्रत् करना चाहा। उसे ईश्वर की ओर से वरदान मिला था। इसके जाग्रत् होने पर वह देवों सहित मालीवराज को भस्मीभूत कर सकेगा। दशकण्ठ ने साधुवेश में मेरुपर्वत की तलहटी में यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित कर मिट्टी की देवमूर्तियाँ बनायी। वह वेद-मन्त्रों के पाठ से प्रज्वलित हुई अग्नि में देव- मूर्तियों को डालने लगा। देवों में खलबली मच गयी। देवों के राजा ने देखा कि वह उन सबको भस्म करना चाहता है। वे ईश्वर के पास दौड़े। सहायता माँगी। दयालु ईश्वर ने “वाली, जो दूसरा जन्म लेकर देव बन गया था, से कहा जाओ, मेरुपर्वत को आग में झोंक दो।” शान्तिपूर्वक यज्ञ करते हुए दशकण्ठ ने वाली को देखा, परन्तु वाली देव था। दशकण्ठ की उसके सामने कुछ न चली। वह निराश होकर भाग निकला। दशकण्ठ ने देखा ईश्वर ने वाली को देव बना दिया। वह राम का पक्ष लेते हैं तो उसे बहुत बुरा लगा। परन्तु मण्डो ने बहुत समझाया और कहा शायद विभंक के समझाने पर हनुमान् आया होगा। उसी ने वाली का रूप धारण कर लिया होगा। विभेक ही सब बलाओं की जड़ है। पहले उसी को मारना चाहिये। दशकण्ठ को इसपर विश्वास हो गया। दूसरे दिन महास्त्र कपिलवद् को लेकर वह विभेक को मारने चला। उसे राम, लक्ष्मण और विभेक का मुकाबला करना पड़ा। कपिलवद् विभेक का रुधिर पीने लपका। विभेक ने वेग से अपने को बचा लिया। लक्ष्मण ने महास्त्र को वापस भेजा; लक्ष्मण के तीर से महास्त्र र्का मार्ग. तिरछा हो गया, पर दशकण्ठ का तीर लक्ष्मण को लगा। वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े। यह देखकर राम ने भयङ्कर बाण-वर्षा की। दशकण्ठ को छोड़कर कोई राक्षस जीवित न रहा। दशकण्ठ भागकर महलों में जा छिपा। अब लक्ष्मण के घाव को ठीक करने के लिए विभेक ने उपाय किया। इसकी तीन बूटियाँ थीं। तुलुवा, संकरणी एवं त्रिजवा। परन्तु ये बूटियाँ उत्तरकुरु प्रदेश के सञ्जोवसञ्जी पर्वत पर ही मिल सकती थीं। इन बूटियों को इन्द्रकाल पर्वत की गुफा स्थित ईश्वर की गाय के गोबर में मिलाना पड़ता था। वहाँ जाने की गति उसी में थी जिसके मुंह में चाँद और नक्षत्र दीखते हों। हनुमान् ही इसके योग्य थे। वे तुरन्त गये। क्षण भर में बूटियाँ ले आये, पीसने की सिल भी पाताल के राजा कालानाग के पास थी और बट्टा दशकण्ठ के पास था। हनुमान् दौड़कर पाताल से सिल लाये, बट्टा लेने दशानन के घर में घुस गये। वह उसे तकिया बनाकर सो रहा था। हनुमान् ने ४६

सिरहाने से बट्टा खींच लिया। चलते समय हनुमान् ने दशकण्ठ की लट रानी की लट से बाँध दी और शाप दिया कि जब तक रानी राजा को तीन थप्पड़ न मारे तब तक लट न खुले। यह शाप रावण के माथे पर लिख दिया। बूटियों के प्रयोग से लक्ष्मण उठ गये। सबको बड़ा हर्ष हुआ। सब उपायों से थककर रावण को लाचारी से पत्नी के तीन थप्पड़ खाकर बन्धन से छुटकारा मिला। संजीवयज्ञ महारानी मण्डो पतिव्रता थी। वह मृत्यु को वश में करना जानती थी। उसने उमा की सेवा में रहकर अमृत बनाना सीखा था। अमृत बन जाने पर वह सब पुत्रों तथा सेनाओं सहित रावण को जीवित कर सकती थी और फिर राम के बाणों के लिए भी कठिनाई उत्पन्न हो सकती थी। उसने संजीवयज्ञ आरम्भ कर दिया। इससे दशकण्ठ आशावान् होकर अपने दशगिरिवन और दशगिरिधर दो पुत्रों के साथ रणक्षेत्र में आया। लक्ष्मण ने दोनों को मार भगाया। राम ने दशकण्ठ का रास्ता रोका इसी समय मण्डो का अमृत बनकर तैयार हो गया। अमृत छिड़कते ही सारी सेना जी उठी। कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, सहस्तेज आदि सब जाग उठे। फिर जोरों से युद्ध छिड़ गया। अब युद्ध का अन्त होना बहुत कठिन हो गया। अब इसका यही उपाय था कि मण्डो का यज्ञ रोका जाय। यदि मण्डो में विषयवासना जाग्रत् हो जाय तो यह यज्ञ असफल हो सकता था, क्योंकि यज्ञ के लिए आत्मसंयम अपेक्षित था। हनुमान् ने दशकण्ठ का वेष बनाया। नीलवद् उसका हाथी बन गया, कोई महावत बन गया। वह बनावटी दशकण्ठ विजय की खुशी मनाते हुए लङ्का में जुलूस के साथ आया और वहाँ पहुँचा जहाँ तपस्विनी बनकर मण्डो अमृत बनाने में संलग्न थी। दशकण्ठ ने कहा अब अमृत की आवश्यकता नहीं है। राम और उनकी सेना के सैनिक सब मरे पड़े हैं। मण्डो हर्ष से उछल पड़ी और नकली दशकण्ठ के गले लिपट गयी। विषयवासनापूर्ण चुम्बन उसके ओठ पर दिया गया और विषयवासनापूर्ण आलिङ्गन से मण्डो की मनोवृत्ति बदल गयी। इस प्रकार हनुमान्‌जी की बुद्धिमानी से मण्डो का काम बिगड़ गया। दशकण्ठरूपी हनुमान् यह बहाना करके वहाँ से निकल गये कि अभी विभेक जीता है उसे मारकर मैं अभी आता हूँ। उधर दशकण्ठ अमृत की राह देख रहा था। पहले जिलाये हुए राक्षस मर चुके थे। उनको फिर से जिलाना था। घण्टों प्रतीक्षा के बाद भी अमृत न आया। वह मण्डो की यज्ञशाला की ओर लपका। उसको हनुमान् के छल का पता लग गया। मण्डो को ज्ञात हुआ कि उसका सतीत्व नष्ट हो गया। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फिर भी मण्डो एवं दशकण्ठ का प्रेम ज्यों का त्यों बना रहा। आत्मा का पिंजरा हनुमान् की करनी पर क्रुद्ध होकर दशकण्ठ युद्ध के लिए चल पड़ा। राम ने बेशुमार तीरों की वर्षा से सामना किया। दोनों ओर से तीर छूट रहे थे। आकाश में अँधेरा छा गया था। राम अद्वितीय वीरता से लड़े पर रावण पर विशेष असर नहीं हुआ। उसके सिर और भुजाएँ कटकर गिर जाती परन्तु फिर नये सिर और नयी भुजाएँ बन जाती थीं। तीव्र से तीव्र बाण उसका कुछ बिगाड़ न सके। विभेक ने बताया कि दशकण्ठ की आत्मा तो उसके गुरु गोपुत्र के पास एक पिंजड़े में सुरक्षित है। दशकण्ठ तो तभी मरेगा जब उसकी आत्मा को मार डाला जाय। हनुमान् इस काम के लिए चल पड़े, पर उन्होंने राम से कहा महाराज, इस काम को सिद्ध करने में कई चालें चलनी पड़ेंगी। मुझे शत्रुदल में शामिल देखकर मेरी भक्ति में सन्देह न कीजियेगा। इस तरह राम को सचेत कर हनुमान् गोपुत्र की कुटिया पर चले गये। गोपुत्र मूर्ख था। हनुमान् के साथ इन्द्र का पौत्र अङ्गद भी था। हनुमान् गुरु की कुटिया में पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर हनुमान् झूठमूठ का रोना रोने लगे और बोले राम ने हमारे साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। हमने सदा उनकी सेवा की, पर वे बड़े कृतघ्न निकले। हम दशकण्ठ की सेना में आना

चाहते हैं। पर शायद दशकण्ठ हमको स्वीकार न करें, क्योंकि हमने उनके भाइयों और पुत्रों का वध किया है। गुरुजी ! आप कृपा कर हमें साथ ले चलें। हमको उनसे मिला दें। यह कहकर हनुमान् फिर रोने लगे। आँसुओं की धारा उनके मुख पर बह चली। यह देख गोपुत्र राजी हो गया और वे सब दशकण्ठ के महल की ओर चल पड़े। हनुमान् ने कहा गुरुजी आत्मा के पिंजड़े को घर पर न छोड़िये। राम उसकी ताक में हैं। अवसर मिलते ही उड़ा ले जायगा, अतः इसको साथ ही रखना चाहिये। वह हनुमान् की बातों में आ गया और पिंजड़ा ले लिया। लङ्का के राक्षस हनुमान् को देखकर डर गये। हनुमान् की उपस्थिति से लङ्का में तूफान आ गया। पर आगे चलने पर विचार हुआ कि दशकण्ठ के पास पिंजड़ा कैसे ले जाया जाय। जैसे पक्षी अपने घोंसले को देखकर उसमें भाग जाता है इसी प्रकार दशकण्ठ की आत्मा उसकी देह में घुस जायगी। हनुमान् ने सुझाया कि आत्मा का पिंजड़ा अङ्गद के हाथ में छोड़ दिया जाय। आप और हम नगर के अन्दर चलें। लौट कर फिर इसे ले लेंगे। इस तरह पिंजड़ा अङ्गद के हाथ में देकर दोनों चल पड़े। चलते-चलते अचानक हनुमान् बोले गुरुजी आप चलिये, मैं अङ्गद को एक बात बता आऊँ कि उसे सावधान रहना चाहिये। कहीं अकेला पाकर शत्रु समझ कर राक्षस उसे मार न डालें। इस बहाने से अङ्गद के पास जाकर नकली पिंजड़ा बनाकर अङ्गद को दिया और बोले असली पिंजड़े को ले जाकर समुद्र के तट पर गाड़ दो। यहाँ आकर नकली पिंजड़ा गुरुजी को दे देना। यह कहकर गुरुजी के साथ दशकण्ठ के पास पहुँच गये। उसके सामने भी राम के दुर्व्यवहार की कहानी सुनायी। वह बोला, क्या लङ्का जलाने का यही पुरस्कार है ? स्नान करने का अंगोछा पकड़ा दिया। दशकण्ठ उछल पड़ा तालियाँ बजाता हुआ खुश होकर बोला आज से तू मेरा धर्मपुत्र हुआ। वह भी हनुमान् का छद्म नहीं जान सका। हनुमान् खुश थे। दूसरे दिन हनुमान् ने कहा आज मैं अकेला ही राम और उनकी सेना से लड़ूँगा। दोनों को पकड़ लेना कोई कठिन काम नहीं है। हनुमान् को रावण की ओर से लड़ता देखकर बन्दर डरकर भागने लगे। लक्ष्मण अकेले रह गये उनको भी इस षड्यन्त्र का पता नहीं था। लक्ष्मण साश्चर्य हनुमान् से लड़ने लगे। हनुमान् झूठमूठ का युद्ध करते रहे। संध्या को युद्ध रुक गया। हनुमान् लङ्कापति के पास पहुँचे और अपनी बड़ाई की डींग मारने लगे। महाराज, सब बन्दर भाग गये। संध्या न होती तो आज ही राम और लक्ष्मण को पकड़ लाता। आप के चरणों में उपस्थित कर देता। दश- कण्ठ हर्ष से फूल गया। पुरस्कार के रूप में इन्द्रजित् की सब सम्पत्ति दे दी। उसकी असली स्त्री को भी हनुमान् के हवाले कर दिया। प्रातः पुनः रणभेरी बजी। इस बार दशकण्ठ भी हनुमान् के साथ हो लिये। निश्चित हुआ कि हनुमान् आकाश में अँधेरा उत्पन्न कर राम और लक्ष्मण को ले जाय। दशकण्ठ पीछे से समस्त दल को नष्ट कर दे। पर जैसे ही हनुमान् आकाश में पहुँचे एक जँभाई ली, उनके मुख में चाँद और सूर्य चमकने लगे। अङ्गद खड़ा समुद्र तट पर देख रहा था। वह कूदा और आत्मा का पिंजरा हनुमान् के हाथ में दिया। हनुमान् ने पिंजरा लाकर राम के हवाले कर दिया। राम हर्ष और कृतज्ञता से फूले न समाये। लक्ष्मण बोल उठे आकाश के तारे गिने जा सकते हैं, समुद्र की थाह लेना भी आसान है, पर हनुमान् की बुद्धि की प्रशंसा करना कठिन है। राम ने कहा हनुमान् रत्नों का रत्न है। तीनों लोकों में हनुमान् जैसा कोई नहीं मिल सकता। यह तय हुआ कि राम ब्रह्मास्त्र छोड़ें और हनुमान् आत्मा पिजड़े को तोड़ दें। दशकण्ठ हनुमान् की गतिविधि देखकर दंग रह गया और कृतघ्न तथा विश्वासघाती कह कर हनुमान् को धिक्कारने लगा। हनुमान् ने कहा पिंजरा तब दूँगा जब तुम सीता को लौटा दोगे। दशकण्ठ ने यह स्वीकार नहीं किया और मण्डो से मिलने के लिए लौट पड़ा। महलों में जाकर मण्डो से मिला और प्रातः उससे विदा लेना चाहा। मण्डो ने सीता को लौटा देने की सलाह दी, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। वह युद्ध के लिए चल पड़ा। राम से मुठभेड़ हुई। उसने एक अस्त्र छोड़ा उसमें से फूल निकल कर राम के चारों तरफ गिरने लगे। राम ने चकित होकर देखा सामने इन्द्र हैं। रावण इन्द्र के समान सुन्दर रूप धारण

३६४ रामायणमीमांसा द्वादश कर सामने स्थित है। राम को उसको मारना अच्छा न लगा। हनुमान् ने कहा आप इसके सौन्दर्य पर क्यों मोहित होते हैं। राम सचेत हुए और उसपर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। वह उसके हृदय में लगा। उसका असली कुरूप शरीर सामने गिर पड़ा। जिसने संसार भर में मौतें ही मौतें ढायी थीं। वह आज स्वयं मौत का शिकार हो गया। उसने धीरे से आँख खोली सामने विभेक को देखा। उसके मुंह से खेद, क्रोध, पश्चात्ताप और पीड़ा के शब्द निकले। उसने प्राण त्यागते त्यागते विभेक से क्षमा माँगी और उससे राज को सँभालने तथा सुरक्षित रखने को कहा। उसी समय हनुमान् ने आत्मा का पिंजड़ा तोड़ दिया दशकण्ठ का जीवन समाप्त हो गया। आकाश से फूलों का वर्षा हुई एवं दुन्दुभियाँ बजने लगीं। शान्ति का पवन बहने लगा। तूफान की अंधेरी रात का अन्त हुआ। अग्नि-परीक्षा लङ्का में शोक छा गया। विभेक ने उसकी अन्त्येष्टि की। विभेक का अभिषेक हुआ। विभेक सीता को राम के पास ले गये। राम यद्यपि सीता से मिलने के लिए प्रेम-विह्वल थे, यद्यपि वे जानते थे कि सीता पवित्र है फिर भी समाज को ऐसा विश्वास कैसे दें यह चिन्तनीय विषय था। सीता की परीक्षा के लिए राम ने कुछ ऐसे शब्द कहे जो सीता को वज्र से भी भीषण प्रतीत हुए। सीता ने अपने सतीत्व की अग्निपरीक्षा देकर देवताओं को चकित कर दिया। सुग्रीव ने चिता बनाई। राम के बाण ने आग लगा दी। सीता सतीत्व के बल से अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। एक महान् चमत्कार हुआ। सीता के समक्ष प्रकृति ने अपना नैसर्गिक नियम त्याग दिया। हिरण्य- मयी ज्वालाओं से नारायण की दुखिया पत्नी का आविर्भाव हुआ और अग्नि ठण्डी हो गयी। अग्नि की कठोर ज्वालाएँ शीतल कमल पुष्पों में परिणत हो गयीं। उनकी सुगन्ध से संसार महँक उठा। सीता की सुनहरी जीती- जागती मूर्ति ज्वालाओं से निकल कर सामने खड़ी थी और सन्देह करनेवालों को बता रही थी कि स्त्री के सतीत्व में जलती अग्नि शीतल हो जाती है और अंगारे फूल बन जाते हैं। राम का अयोध्या प्रत्यागमन राम का समय बीत रहा था। राम को भय था कि समय पर न पहुँचने पर भरत और शत्रुघ्न प्राण त्याग देंगे। विभेक ने राम से लङ्का का राज्य करने का आग्रह किया। राम ने स्वीकार नहीं किया। इस बीच में दशगिरिवन और दशगिरिधर के धर्मपिता अशकरण ने सुना कि मेरे धर्मपुत्रों सहित दशकण्ठ मारा गया है। उसका बदला लेने के लिए वह दौड़ पड़ा। वह भी युद्ध में राम के हाथ मारा गया। उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये, पर वे टुकड़े भी युद्ध करने लगे। उसे ईश्वर का वरदान था कि उसके चाहे कितने ही टुकड़े क्यों न हो जायं वे सब राक्षस बनकर युद्ध करेंगे। विभेक ने उपाय बताया। राम ने बाण छोड़ा उसके टुकड़े टुकड़े हो गये। फिर उन्होंने दूसरा बाण छोड़ा उससे वे टुकड़े नदी में बहा दिये गये। उन मृत टुकड़ों का जीवित होना असंभव हो गया और वह मर गया। राम इस विचित्र शत्रु को मार कर भाई, भार्या तथा साथियों के साथ अयोध्या को चल पड़े। समुद्र पार होते ही विभेक ने प्रार्थना की कि समुद्र का पुल तोड़ दिया जाय जिससे अनन्त सागर तरंगबाधा-रहित हो जाय। इतने में दशकण्ठ का पुत्र प्रलयकल्प जो कालअग्नी के पेट से उत्पन्न था वज्रकल्प शब्दों से गरज कर बाप का बदला लेने के लिए आगे आ गया। हनुमान् की बुद्धि से वह भी मारा गया। हनुमान् पहले तो भैंसा बनकर कीचड़ में लोट गये। भैंसे से उसने पूछा राम और लक्ष्मण कहाँ हैं। भैंसे ने कहा पहले मुझे कीचड़ से निकालो तब बताऊँगा। उसने बड़ी मुश्किल से निकाला वह थक कर चूर-चूर हो गया और फिर राम को पूछा। हनुमान् ने कहा राम और लक्ष्मण के पीछे क्यों पड़ते हो? पर वह लड़ने के लिए एकदम सन्नद्ध था। हनुमान् ने बन्दर का रूप धारण किया, युद्ध शुरू हो गया। वह थका तो था, परन्तु हारा नहीं; क्योंकि उसका शरीर वरदान के बल से इतना चिकना था कि पकड़ में नहीं आता था। हनुमान् अपनी एक मायावी मूर्ति से लड़ते रहे और स्वयं एक ऋषि के पास परामर्श लेने गये। ऋषि ने भूमि पर रेत फेंक दी।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३९५ हनुमान् समझ गये चिकनाहट कम करने के लिए उस पर रेत फेंक दी । चिकनाहट कम हो गयी । उसको जकड़ कर मार दिया । राम अयोध्या पहुँच गये । राक्षसों के षड्यन्त्रों से भरत और शत्रुघ्न निराश होकर प्राण त्यागने के लिए तैयार थे । ठीक समय पर राम आ गये । राम का विधिवत् अभिषेक हुआ । लक्ष्मण को रोमगल प्रदेश का राजा और भरत तथा शत्रुघ्न को युवराज बनाया । सुग्रीव को खिदखिन का तथा विभेक को लङ्का का राजा बनाया गया । अङ्गद को फ्रया इन्द्रानुभाव के नाम से खिदखिन का युवराज बनाया गया । जम्बूवान को पंगताल का राज मिला । हनुमान् को अयोध्या का शासक बनाया गया । उसकी पदवी फ्रया अनुजित चक्र कृष्ण विषदन वोङ्गस हुई, परन्तु वह तो नारायण के वंशजों का राज था । ज्यों ही वह गद्दी पर बैठा उसके शरीर में आग सी लगने लगी । वह झट गद्दी पर से उतर पड़ा और अयोध्या की गद्दी गद्दी के अधिकारी को दे दी । कृतज्ञ राम ने एक तीर मारा और अनुजित को आज्ञा दी कि इसके मार्ग का पीछा करो जहाँ तीर गिरे वहीं तुम अपनी राजधानी बनाओ । तीर नौ चोटियोंवाले पहाड़ पर गिरा वह चूर चूर हो गया । राम ने विश्वकर्मा को आज्ञा दी "वहाँ अनुजित के लिए नगर बसाओ।" उसका नाम नवपुरी हुआ । फ्रया अनुजित वहाँ के राजा बने । राम सबके महाराज बने । लङ्का में विद्रोह चक्रवाल के राजा महापाल ने विभेक पर, जो कि दशगिरिवंश के नाम से वहाँ का राज करता था, आक्रमण कर दिया । राम ने अनुजित (हनुमान्) को सहायतार्थ भेजा । हनुमान् ने उसकी टाँग पकड़कर उसे चीर डाला, पर वह फिर से जुड़कर जी गया । विभेक के बताने पर हनुमान् ने उसका हृदय निकाल लिया, तब वह मर गया । कुछ दिन बाद लङ्का में फिर विद्रोह हो गया । मण्डो जब विभेक की रानी हुई तब वह गर्भवती थी । उसके पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम वैणासुरिवंश था । बड़ा होने पर गुरु ने उसके पिता का इतिहास बताया । वह विभेक से बदला लेने को तैयार हुआ । मण्डो ने समझाया पर वह नहीं माना । गुरुवरणीसुर और वैणासुरिवंश चक्रवर्ती मलिवन के पास पहुँचे । उसके पास अग्निमृत्यु और जलमृत्यु की खाइयाँ थीं । दोनों ने एक विधि से कुछ वैदिक मन्त्र पढ़े । उससे अग्नि बुझ गयी, जल पर रेत डालकर वे घुस गये । मलिवन ने उसकी सहायता के लिए लंका पर चढ़ाई कर दी और विभेक को कैद कर वैणासुरीवंश को लंका का राजा बना दिया । हनुमान् का लड़का, जो बैङ्गकाया से पैदा था, निकल भागा और पिता को सूचना दी । हनुमान् ने अयोध्या और खिदखिन की सेना लेकर लंका पर चढ़ायी की । नीलवद् ने अपना शरीर बढ़ा लिया, सागर पट गया उसी से सेना उतर गयी । भयंकर युद्ध हुआ । वैणासुरिवंश मारा गया । विभेक मुक्त हुए । मलिवन पर भी आक्रमण किया गया, वह भी मारा गया । उसकी गद्दी पर मच्छानु को बैठाया गया । सीता-वनवास विपत्ति के दिन बीत गये, आनन्द का समय आया । परन्तु भाग्य तो क्षण-क्षण में बदलता है । सीता गर्भवती थीं । सम्मनर्खा की बेटी अतुल ने संबन्धियों का बदला लेने की दृष्टि से महल की दासियों का रूप लेकर सीता से पूछा दशकण्ठ कैसा लगता था । उसको इस छल का भेद मालूम न था । उसने स्लेट पर उसका चित्र खींच दिया । वह राक्षसी उसी में समा गयी । राम अचानक आ गये । सीता ने चित्र मिटाना चाहा पर वह और अधिक चमक उठा । सीता ने उसको तकिया के नीचे छिपा दिया । राम पलंग पर लेटे तो गर्मी मालूम होने लगी, क्योंकि अतुल स्लेट के द्वारा आग जला रही थी । राम को नींद न आयी । राम ने लक्ष्मण को बुलाया । कमरे भर में गर्मी के कारण की तलाश हुई तो इस स्लेट का पता लगा । राम को आश्चर्य हुआ कि इस हत्यारे का चित्र किसने बनाया । सीता से पूछा तो उन्होंने सच-सच कह दिया । राम को इससे बड़ा आघात लगा । राम ने लक्ष्मण को

आदेश दिया सीता को ले जाओ इसे मारकर इसका कलेजा मेरे सामने लाओ । अयोध्या के भावी राजा की माता ने राम को समझाने का प्रयत्न किया, परन्तु राम ने कुछ नहीं सुना । लक्ष्मण को सन्देह नहीं था । परन्तु राजाज्ञा के सामने वह लाचार थे । दुःखी सीता रोती हुई लक्ष्मण के साथ बन की ओर चल पड़ी । किसी वृक्ष की छाया में सीता बैठ गयी और लक्ष्मण से आज्ञा पूर्ण करने की अनुरोध किया । पर लक्ष्मण निर्दोष सीता को मारने को तैयार नहीं हो सके । सीता ने मर्मभेदी वचन कहकर उन्हें उत्तेजित किया । लक्ष्मण ने लाचारी से तलवार चलायी, किन्तु स्वयं ही बेहोश होकर गिर पड़े । तलवार फूलों की माला के रूप में परिणत हो गयी । यह सीता के सतीत्व का चमत्कार था । होश आने पर लक्ष्मण सीता को जीवित देखकर प्रसन्न हुए । सच ने झूठ का मुँह काला कर दिया । लक्ष्मण देवताओं से सीता की रक्षा की प्रार्थना करके अयोध्या की ओर चल पड़े । सीता की चिन्ता में लक्ष्मण व्याकुल थे । साथ ही सीता का कलेजा भी राम के सामने हाजिर करना था । इन्द्र को दया आयी उसने माया से रेत के मैदान में एक मृत हरिण डाल दिया । लक्ष्मण ने उसका कलेजा निकाल कर राम को उसकी सूचना दे दी । राम ने उसे देखा । सीता की अवस्था पर इन्द्र को दया आयी । वह भैंसे का रूप धारण कर सीता के निकट आया । आँखों से मूक इशारा किया कि उसके साथ आओ । सीता उसके पीछे चल पड़ी । वह ऋषि की कुटिया में पहुँच गयी । दयाल ऋषि ने पितृवत् स्नेह दिया । वहीं भावी अयोध्या के राजा का जन्म हुआ । इन्द्र की पत्नियाँ धाय का काम करने लगीं । ऋषि ने बालक का नाम मङ्कुट रखा । पुत्र के मुख पर सीता के पति के सभी चिह्न थे, जिनको देखकर कलेजा दो टूक हुआ जाता था । एक दिन बालक को ऋषि के संरक्षण में छोड़कर सीता नदी में स्नान करने के लिए गयी । उसने देखा बन्दरियाँ अपने बच्चे को गले से चिपकाये हैं । बन्दरियों को कूदते देख सीता ने उनसे कहा तुम ऐसे क्यों कूदती हो, बच्चे का ध्यान नहीं ? बन्दिरियों ने कहा तुम तो हमसे भी असावधान हो । ऋषि जो कि समाधि में बैठा है, जिसे संसार की खबर ही नहीं है, उसके संरक्षण में बच्चे को छोड़कर आयी हो । सीता पर उसका असर पड़ा । वह लौट कर बच्चे को उठा लायी । इसी बीच ऋषि की समाधि खुली । बच्चा न देखकर उन्होंने दुर्घटना की सम्भावना कर सीता को दुःख से बचाने के लिए पहले बच्चे की आकृति का ही दूसरा बच्चा बना दिया । सीता ने दोनों का पालन किया । दूसरे का नाम लव हुआ । इस तरह सीता दो पुत्रों की माँ बन गयीं । लड़के दस ही वर्ष की आयु में तेजस्विता और वीरता में बड़े-बड़े सूरमाओं से भी बढ़ गये । मङ्कुट ने अपना धनुष लिया निशाना अजमाने के लिए एक वृक्ष की चोटी पर तीर छोड़ा । बाण ने विद्युत्-वेग से वृक्ष के दो टुकड़े कर दिये । उसका धमाका भूकम्प जैसा हुआ । धमाके की आवाज अयोध्या तक पहुँची । अभी तो नारायण नर-लीला कर ही रहे हैं यह कौन नया तेजस्वी पैदा हुआ । राम ने अश्वमेध रचाया । हनुमान्, भरत और शत्रुघ्न घोड़े के रक्षक नियुक्त हुए । घोड़ा घूमते हुए वहीं पहुँच गया जहाँ से वह धमाका हुआ था । घोड़े के गले में एक तख्ती बँधी थी उसमें लिखा था जो घोड़े पर चढ़ेगा विद्रोही समझा जायगा । दोनों भाइयों ने घोड़ा पकड़ लिया । युद्ध हुआ, हनुमान् मूर्च्छित हुए । परन्तु मूर्च्छा खुल गयी । मङ्कुट ने उसे ऐसा बाँध दिया कि जब तक मालिक न आयेगा बँधा ही रहेगा । भरत आदि ने बहुत यत्न किया पर बन्धन न खुला । हनुमान् लज्जित होकर राम के पास आये तो बन्धन टूटा । राम ने भरत आदि को आज्ञा दी कि लड़कों को पकड़ कर लाओ । घोर युद्ध हुआ । भरत के तीर से मङ्कुट आहत हुआ । लव माता की कुटिया में चला गया । मङ्कुट को भरत कैद कर अयोध्या ले गये । लव ने माँ से सब हाल कहा । सीता के पास एक माया की अंगूठी थी जिससे बड़े से बड़े बन्धन टूट जाते थे । लव उसे लेकर अयोध्या आया । अंगूठी के प्रभाव से मङ्कुट बन्धनमुक्त हो गया । दोनों वन वापस आये । राम ने बड़ी सेना लेकर मङ्कुट का पीछा किया । बाप-बेटों में घोर युद्ध हुआ । पुत्रों के तीर फूल बनकर पिता के चरणों पर गिरते थे पिता के तीर ऊपर ही ऊपर चले जाते थे । राम ने जानना चाहा ये किसके पुत्र हैं । जब उन्होंने सीता के पुत्र हैं, यह कहा तो उनको बड़ा कौतुक हुआ । लक्ष्मण ने राम को सीता की पूरी कहानी सुनायी, राम को बड़ा हर्ष हुआ कि महारानी

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६७ सीता का हृदय इतना पवित्र था। दोनों पुत्रों को लेकर कुटिया पर आये जहाँ सीता पुत्रों की प्रतीक्षा कर रही थी। राम को आता जान कर सीता को बड़ा क्रोध आया। राम ने क्षमा माँगी, महलों में लौटने को कहा। सीता ने अस्वीकार कर दिया। कहा लङ्का में तो पहरे में थी, परन्तु जंगल में मैं दस वर्षों से अकेली हूँ। मेरे प्रति सन्देह के लिए अब तो पहले से भी प्रबल कारण हैं। अब मुझको पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं। राम निरुत्तर थे। पर सीता ने पुत्रों को जाने की अनुमति दे दी। अयोध्या पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। दादियों ने बड़ा ही प्रेम किया। सीता को बुलाने के लिए यह मिथ्या कहलाया गया कि राम का देहान्त हो गया है। समाचार सुनकर सीता बहुत दुःखी हुई और वह राम के शरीर का अन्तिम दर्शन करने को आयी। जहाँ राम की कल्पित अर्थी रखी हुई थी, सीता विलाप करने लगी। राम परदे के पीछे खड़े थे, निकल आये और सीता को अपने संतप्त हृदय से लगाना चाहा। पर यह देखकर तो सीता एकदम क्रुद्ध हो गयी। राम ने सीता को बलात् रोकना चाहा, पर उसने अपने मार्ग को अवरुद्ध देखकर पृथ्वी से प्रार्थना की वह उसे स्थान दे — पृथ्वी फट गयी। वह उसमें होकर पाताल चली गयी, भूमि-विवर बन्द हो गया। श्रीराम विभेक की राय से वन में जाकर तप करने लगे और राक्षसों का सफाया भी। यहाँ राम ने कुम्भाण्ड नामक देव का, जो राक्षसयोनि में था, उद्धार किया। इन्द्र ने ईश्वर से प्रार्थना की कि राम के प्रताप से राक्षसों का अन्त हो गया है। उन्होंने सम्पूर्ण जगत् को पीड़ामुक्त कर दिया है, परन्तु वे स्वयं अत्यन्त सन्तप्त हैं। उनकी प्रिय पत्नी सीता उनको त्याग कर चली गयी है। दयालु ईश्वर ने राम और सीता को बुलाया। दोनों कैलास पर्वत पर उपस्थित हुए। राम ने अनुताप से अपना दोष स्वीकार कर लिया। सीता से क्षमा-याचना की। परन्तु सीता अपने अपमान को न भूल सकती थीं और न क्षमा कर सकती थीं। फिर भी ईश्वर की निरन्तर प्रेरणा से सीता का हृदय पिघला। वह फिर राम पर स्नेह करने के लिए राजी हो गयीं। राम हर्ष से गद्गद हो गये। उनका मन आनन्द सागर में किलोलें करने लगा। प्रेम की ज्योति जाग्रत् हुई। राम आनन्द सागर में क्रीड़ा करने लगे। उनके यशपूर्ण पराक्रम से सारा जगत् जगमगा उठा। उनकी ख्याति की सुरभि से युग-युगान्तर और देश-देशान्तर सुरभित हो गये। इसी तरह अनेक देशों के अनेक विद्वानों, कवियों तथा महापुरुषों ने राम का गुणगान किया है। भले ही, महर्षि वाल्मीकि और व्यास जैसा आर्ष ज्ञान न होने से उनके वर्णनों में कहीं-कहीं रामायण के आदर्श से विभिन्नता आ गयी है। बहुत सी विचित्र एवं नयी बातें भी जुड़ गयी हैं। फिर भी उनकी भावनाएँ शुद्ध हैं। अतः वह सब भी भाव-वश्य भगवान् की आराधना ही है। परन्तु कुछ अनीश्वरवादी जैनों, बौद्धों तथा ईश्वरवादी कुछ ईसाइयों और मुस्लिमों—वेदादि शास्त्र विरोधी तत्त्वों—ने तो दुष्ट भावना से रामचरित्र को विकृत करने की भी चेष्टाएँ की हैं। उनके लिए भी यह कहा जा सकता है कि भाव-कुभाव, जैसे-तैसे, उन लोगों ने भी भगवान् राम का नाम, गुण, प्रभाव आदि का चिन्तन किया है। जैसे अनिच्छा से भी अग्निदेव का स्पर्श हो जाने पर वह दहन करता ही है। अतः उनका भी कल्याण होना उचित है। वैसे ही जाने अनजाने लिया गया भगवन्नाम भी पापों को नष्ट कर देता है— “हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तेरपि स्मृतः। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥” उदयनाचार्य नास्तिकों की सिफारिश करते हुए भगवान् से कहते हैं कि मैंने यद्यपि श्रुति-युक्ति रूप निर्मल जल से नास्तिकों के दुस्तर्क कलङ्क पङ्क से मसृणित मानस का प्रक्षालन किया तब भी यदि उनके मन में आप (परमेश्वर) पर आस्था नहीं होती तो उनके मन या अन्तःकरण को वज्र ही समझना चाहिये। किन्तु हे अकारण- करुणावरुणालय प्रभो ! प्रस्तुत ईश्वरसिद्धिविरोध के प्रसङ्ग से नास्तिक भी बड़े अभिनिवेश से आप का चिन्तन करते

हैं। यह अन्य बात है कि आस्तिक मण्डनीय विधया आप का चिन्तन करते हैं पर नास्तिक खण्डनीय विधया आपका चिन्तन करते हैं । परन्तु चिन्तन वह भी आपका अवश्य करते हैं । अतः जैसे आपने अपने विरोधी रावण आदि का कल्याण किया था वैसे ही आप उन नास्तिकों का भी यथासमय कल्याण अवश्य करें— “इत्येवं श्रुतिनीतिसंप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदाधासि हृदये ते शैलसाराशयाः । किन्तु प्रस्तुतविप्रतीपविधयाऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया नराः ॥” ३२७ वाँ अनु० : श्याम के उत्तर-पूर्वीय प्रान्तों में लावो भाषा बोली जाती है । लावोसाहित्य के पञ्चतन्त्र में दशरथ द्वारा अन्धमुनिपुत्र-वध तथा राम के विभीषण को शरण देने का उल्लेख मिलता है । इसके अतिरिक्त १६वी शती में रामजातक की लावो भाषा में रचना की गयी है । रामकियेन की भांति इस जातक में समस्त रामकथा का घटनास्थल श्यामदेश में ही माना गया है । पूर्वार्ध में रामजन्म की कथा दी गयी है जिसके अनुसार राम रावण के चचेरे भाई हैं । राम के केवल एक ही भाई लक्ष्मण तथा शान्ता बहन का उल्लेख है । रावण शान्ता का अपहरण करता है तथा राम और लक्ष्मण द्वारा पराजित होता है । उत्तरार्द्ध में वाल्मीकिरामायण के समस्त कथानक रामकियेन से मिलते-जुलते हैं । सीता को इन्द्राणी का अवतार माना गया है, किन्तु इनकी शेष जन्म-कथा रामकियेन के सदृश ही है । सीता-स्वयंवर में रावण उपस्थित था । सीता-खोज के समय दो वृत्तान्त अपेक्षाकृत विस्तृत हैं । (१) राम का वानर रूप धारण कर अञ्जना से हनुमान् को उत्पन्न करना । यह कथा सेरीराम के वृत्तान्त पर आधारित है । (२) राम का वाली की विधवा से विवाह करना तथा अङ्गद का पिता बनना । यह कथा अन्यत्र नहीं मिलती । इसके अनुसार हनुमान् और अङ्गद दोनों मिलकर सीता की खोज में लङ्का जाते हैं और वहाँ उत्पात भी मचाते हैं । विभीषण रावण की विधवा (शान्ता) से विवाह करते हैं । बेंजकाया के स्थान पर केले का एक वृक्ष संवार कर और उसे सीता का रूप देकर राम के शिविर के पास की नदी में बहाया जाता है । अन्य विशेषताएँ रामकियेन से अभिन्न हैं । नाग-कन्याओं का सेतु नष्ट करने का प्रयास, महिरावण की कथा, रावण के चित्र के कारण सीता का त्याग, वाल्मीकि द्वारा सीता के एक शिशु की सृष्टि, जिसका सीता पुत्रवत् पालन करती है, लव-कुश-युद्ध तथा सुखान्त निर्वहण । अन्त में जातकशैली के अनुसार राम बुद्ध, रावण देवदत्त, दशरथ शुद्धोदन, लक्ष्मण आनन्द, सीता उप्पलवण्णा आदि राम-कथा और बौद्ध इतिहास के पात्रों की अभिन्नता का उल्लेख किया गया है । रामजातक का एक अन्य रूप पालक-पालाम के नाम से विख्यात है । रामजातक से इसमें यह अन्तर है कि इसमें ब्रह्मा को रावण रूप में तथा बोधिसत्त्व को राम और लक्ष्मण के रूप में अवतरित माना गया है । अनु० ३२८ : एक विद्वान् ने ब्रह्मचक्र की एक हस्तलिपि प्राप्त की है । इसके कथानक का सार १९५७ ई० में प्रकाशित किया है । इसमें रावण, राम तथा सीता की जन्म-कथाओं का वर्णन है । इसमें सीता-स्वयंवर का वृत्तान्त दिया गया है, जिसमें अन्य राजाओं की उपस्थिति में राम धनुष चढ़ाते हैं । हनुमान् की जन्म-कथा तथा सीता-हरण का वृत्तान्त दोनों मौलिक हैं । राम का वनवास, वालि-वध, हनुमान् की लङ्का-यात्रा, लङ्का-दहन, सेतु- बन्धन, विभीषण की शरणागति, अङ्गद का दूतकार्य, महिरावण-कथा आदि सब कथाएँ अन्य रामकथाओं के समान ही हैं । सीता की अग्निपरीक्षा तथा सीता-त्याग में कुछ नये अंश हैं । लव-जन्म के बाद वाल्मीकि दूसरे शिशु कुश की सृष्टि करते हैं । लव-कुश बाद में राम से युद्ध करते हैं । इसमें भी सुखान्त राम-कथा का निर्वहण है ।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६९ ब्रह्मदेश ३२९ अनु०। ब्रह्मदेश का रामकथा-साहित्य अर्वाचीन है। यहाँ के एक राजा ने १७६७ ई० में श्याम की राजधानी अयुतिया को नष्ट कर दिया था। इस विजय के बाद राजा ने श्याम के बहुत कैदियों को अपने साथ ले लिया था, जो ब्रह्मदेश में श्याम के राम-नाटक का अभिनय करने लगे। श्याम की रामकथा के आधार पर यू तो ने १८०० ई० के लगभग राम यागन की रचना की थी। यह ब्रह्मदेश का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण काव्य माना जाता है। आजकल रामनाटक, जिसे वहाँ की भाषा में याम प्वे कहते हैं, बहुत लोकप्रिय है। इसके अभिनेता बहुमूल्य चेहरे पहनते हैं और अभिनय के दिन इन चेहरों की पूजा भी करते हैं। श्याम केरामकियेन पर निर्भर होने पर भी कथानक में कहीं-कहीं मौलिकता है। सीता-हरण वहाँ के अभिनय का लोकप्रिय विषय है। इसमें शूर्पणखा, जिसका नाम गाम्बी रखा गया है, मृग का रूप धारण कर राम को दूर ले जाती है और राम से आहत किये जाने पर राक्षसीरूप से प्रकट होती है। राम की सहायता के लिए जाते हुए लक्ष्मण का कुटी के चारों ओर तीन रेखाएँ खींचने का भी इसमें उल्लेख है जो कि भारत तथा हिन्देशिया की कथाओं में मिलता है। इससे इतना तो स्पष्ट ही है कि राम-कथा, भारत में ही नहीं, किन्तु दूर-दूर पहुँची और अत्यन्त लोकप्रिय हुई। परन्तु उसी वाल्मीकिरामायण के ऐतिवृत्तिक तथ्य को विभिन्न देशों ने तथा विभिन्न धर्मानुयायियों ने अपने-अपने रूप में ढालने का प्रयत्न किया। फलतः उनकी भावनाओं के मिलजुल जाने से वेदों, उपनिषदों, वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायणों, आर्ष पुराणों, इतिहासों तथा संहिताओं के आदर्शों के विपरीत भी बहुत सी बातें जुड़ गयी हैं। त्रैलोक्यसुन्दरी सुलोचना राम के दरबार में आती है। राम के दरबार में वानरों की दृष्टि तक तो इधर-उधर नहीं हिलती है। हनुमान् तो भारतीय रामकथाओं के अनुसार अखण्ड ब्रह्मचारी, ज्ञानियों, भक्तों तथा सन्तों में अग्रगण्य हैं, परन्तु बाहरी राम-कथाओं में हनुमान्, राम और लक्ष्मण को भी अपने ही साँचे में ढालने का प्रयास किया गया है। पाश्चात्य वृत्तान्त ३३० अनु० में बुल्के कहते हैं, १५वीं० शती ई० से लेकर पाश्चात्य यात्रियों तथा मिशनरियों की भारतसम्बन्धी रचनाओं में रामकथा के विषय में बहुत सामग्री मिलती है। अर्वाचीनता तथा लेखकों की भी अपेक्षा- कृत कम जानकारी के कारण यह साहित्य महत्त्वपूर्ण नहीं है। फिर भी उपेक्षणीय नहीं है। (१) जे० फेनचियो (१६०९ ई०) एक जेसुइट मिशनरी जे० फेनचियो ने १६०९ ई० में लिव्रो डा० सेंटा की रचना की है, जिसमें दशा- वतार-निरूपण के अन्तर्गत दक्षिण की उस समय की एक रामकथा का वर्णन किया है। दशरथ के यज्ञ से लेकर सीता की अग्निपरीक्षा के प्रारम्भ तक का वृत्तान्त इसमें मिलता है। इसके बाद की हस्तलिपि के कई पन्ने खो जाने के कारण राम-कथा का पूरा वर्णन नहीं हो पाया। इसमें अधिकांश कथाएँ वाल्मीकिरामायण के अनुसार हैं। इसमें रावण-कथा का उल्लेख अरण्यकाण्ड की कथा के अन्तर्गत किया गया है। अग्निजा सीता तथा राम का स्वेच्छा से वन के लिए प्रस्थान करने का वृत्तान्त वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न है। (२) ए० रोजेरियुस (१७ वीं शती ई०) ए० रोजेरियुस डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पादरी की हैसियत से पुलिकत में ११ वर्ष तक रहे। उनकी रचना दि ओपन दोरे का प्रकाशन १६५१ में हुआ। इसमें दशावतारवर्णन के अन्तर्गत रावण-चरित से लेकर अयोध्या-प्रत्यागमन तक की रामकथा का वर्णन वाल्मीकिरामायण के अनुसार हुआ है। ४७

३७० रामायणमीमांसा द्वादश ( ३ ) पी० वलडेयुस ( १७ वीं शती ई० ) वलडेयुस १६५८ ई० से लेकर ६ वर्ष तक सिंहलद्वीप तथा दक्षिण भारत में रहे । उनकी डच भाषा की रचना आफ गोडेरंय डर ओस्ट इंडिशे हाइडेनन जो अधिकांश उपर्युक्त वृत्तान्त नं० ( १ ) पर निर्भर है । १६७२ में प्रकाशित हुई थी । इसमें रावण-चरित से लेकर राम के स्वर्गारोहण तक की कथा है । अग्निपरीक्षा के अतिरिक्त सीता की और अनेक परीक्षाओं का उल्लेख इस रचना की एक विशेषता है । ( ४ ) ओ० डैप्पर ( १७ वीं शती ई० ) ओ० डैप्पर की असिया नामक रचना वृत्तान्त नं० ( २ ) और ( ३ ) पर निर्भर है । इसका प्रकाशन हालैण्ड में १७वीं शती में हुआ । ( ५ ) डे फरिया ( १७ वीं शती ई० ) इनकी स्पेनिश रचना असिया पोर्तुगेसा का प्रकाशन १६७४ ई० में हुआ । इसकी कथावस्तु वृत्तान्त नं० ( १ ) पर निर्भर है । ( ६ ) रलासियों डेस एरयर ( १६४४ ई० ) फ्रेञ्च भाषा की यह रचना सम्भवतः डे नोबिलि के नोट्स के आधार पर लिखी गयी हो । इसकी राम-कथा ( पृष्ठ १२-७ ) बहुत संक्षिप्त है । इसमें धोबी के वृत्तान्त के कारण सीता-त्याग का उल्लेख है । ( ७ ) ला जानटिलिटे डु बंगाल ( १६६८ ई० ) फ्रेञ्च भाषा की इस रचना की रामकथा एक पुर्तगाली वृत्तान्त से बहुत भिन्न नहीं है । इसका रचयिता अज्ञात है । ( ८ ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( क ) ( १६७० ई० ) डा० कालेंड ने तीन पुर्तगाली रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ इनका डच अनुवाद भी किया है । उक्त डाक्टर के अनुसार ( क ) वृत्तान्त १६७० ई० का है । इसमें उत्तरकाण्ड की सामग्री का भी वर्णन किया गया है । ( ६ ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( ख ) ( १७७४ ई० ) इस रचना में सीता अग्नि से उत्पन्न होती हैं । ( १० ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( ग ) ( १७२३ के पूर्व ) यह फ्रेञ्च वृत्तान्त न० ६ पर निर्भर है । ( ११ ) जे० बी० टावर्निये ( १७ वीं शती ई० ) इन्होंने अपनी भारत-यात्रा के वर्णन में, जो फ्रेञ्च भाषा में है, संक्षिप्त रामकथा का वर्णन किया है । ( १२ ) एम्० सोनेरा ( १८ वीं शती ई० ) एम्० सोनेरा ने अपनी रचना वोयाज़ ओस इंड ओरियंटाल १७८२ में पेरिस में प्रकाशित की थी । इसमें एक संक्षिप्त रामकथा मिलती है ( पृ० १६३ ) । इसमें राम १५ वर्ष की अवस्था में अयोध्या छोड़कर सीता तथा लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में तपस्या करते हैं ।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३७१ ( १३ ) डे पोलिये ( १८ वीं शती ई० ) इनकी रचना मिथोलोजो डेस इण्डू १८०९ ई० में पेरिस में प्रकाशित हुई। इसमें विस्तृत रामचरित ( भाग १ पृ० २९०-३९४ में ) मिलता है, जिसे डे पोलिये ने लखनऊ में १८ वीं शती के उत्तरार्द्ध में विलियम जोन्स के भूतपूर्व पण्डित से सुना था। इस रामकथा में बहुत सी कथाएँ पायी जाती हैं, जो वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न हैं लेकिन जो प्रायः अर्वाचीन वृत्तान्तों में भी मिलती हैं, जैसे रक्तजा सीता की जन्म-कथा, महिरावण के राम और लक्ष्मण को पाताल ले जाने की कथा आदि । ( १४ ) जे० ए० डुब्बा ( १६ वीं श० ई० ) इनकी प्रसिद्ध रचना 'हिन्दू मैनर्स, कस्टम्स एण्ड सेरेमोनिस' में एक संक्षिप्त रामकथा ( पृष्ठ ६१९-२४, तीसरा संस्करण ) जो वाल्मीकिरामायण से कई स्थलों में भिन्न है। जैसे, कैकेयी राम से अनुरोध करती है कि अपना राज्याधिकार भरत को दान करें। हनुमान् समुद्र की धारा पर चलकर लङ्का पहुँचते

३७२ रामायणमीमांसा द्वादश राम हनुमान् के कानों में कुण्डल देखते हैं, जिससे हनुमान् राम की सेवा स्वीकार करतें हैं, क्योंकि उनकी माता ने उनसे कहा था जब तुम अपना स्वामी देखोगे तभी तुम्हारे कान में कुण्डल दिखाई देंगे । हनुमान् के कुण्डलों का प्रसंग पाश्चात्य वृत्तान्त न० १, सेरीराम, रामकेर्ति तथा रामकियेन में भी मिलता है । अभी-अभी गत दिनों रूस में भारत तथा रामायण का रसियन भाषा में प्रकाशन वारेन्निकोव ने २००० वि० में ही तुलसीदास के रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया है । रामचरितमानस का अनुवाद मराठी, गुजराती आदि के अतिरिक्त अन्य विदेशी भाषाओं में भी प्रकाशित हुआ है । पाश्चात्य विद्वानों ने सुनी सुनायी वार्ता के अनुसार अधिकांश वृत लिखे हैं । भारत में ईसाई-धर्म-प्रचार के लिए मैक्समूलर ने वेदों का प्रकाशन अत्यावश्यक समझा था, क्योंकि उनकी दृष्टि से इससे हिन्दूधर्म की बहुत सी कमजोरियाँ विदित हो जायेंगी । इसी तरह ईसाई प्रचारकों को रामायण का विशेषतः विकृत रामकथा का प्रसार ईसाइयत के प्रचार में उपयुक्त प्रतीत हुआ होगा । ✱

त्रयोदश अध्याय बालकाण्ड रामकथा के १४ वें अध्याय ३३१ वें अनुच्छेद में श्रीबुल्के ने रामकथा के विकास का वर्णन किया है। उसमें उन्होंने बालकाण्ड के अधिकांश भाग को पीछे का विकास अर्थात् प्रक्षेप माना है। विशेषतः देवताओं द्वारा विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना तथा पायस प्राप्त कर दशरथ का उसे अपनी पत्नियों में बाँटना (सर्ग १५ और १६), देवताओं द्वारा अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों की उत्पत्ति का वर्णन (सर्ग १७), सिद्धाश्रम वामन की कथा (सर्ग २९), सगरपुत्रों का पाताल में भस्म होना (सर्ग ४०), समुद्रमन्थन (सर्ग ४५), विश्वामित्र के वंश की कथा (सर्ग ३२-३४) जनक द्वारा धनुष तथा सीता के अलौकिक जन्म की कथा तथा उनकी सीता-विवाह- विषयक प्रतिज्ञा (सर्ग ६६, ६७), उनकी दृष्टि में ये सब विकास ही हैं। परशुरामकथा (सर्ग ५१-६५), उनकी दृष्टि में प्रक्षेप ही है। दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय तीनों पाठों की विभिन्नता के आधार पर वे बहुत सी कथाओं को प्रक्षेप कहते हैं। परन्तु स्वयं भी वे निर्णय नहीं कर पाते हैं कि वस्तुतः कौन पाठ ठीक ओर सही है। अतएव वे इस पाठभेद का दुरुपयोग करते हुए बहुत से अंशों को प्रक्षेप सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं। इतना ही नहीं जो राम के परब्रह्म तथा विष्णु के अवतार होने की बात तीनों ही पाठों में मिलती है उसे भी प्रक्षेप कहने में उन्हें हिचक नहीं होती है। यह पीछे कहा जा चुका है कि जैसे वेदों में विभिन्न शाखाओं में पुरुषसूक्त भिन्न-भिन्न हैं। उनमें पर्याप्त पाठभेद है, परन्तु वे सभी प्रामाणिक हैं। जिस प्रकार उनको प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता उसी प्रकार प्रकृत में दाक्षिणात्य पाठ, गौडीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ तीनों ही पाठ ठीक हैं। शतकोटि-प्रविस्तर रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपने विभिन्न शिष्यों में कुछ विभिन्न पाठभेदों और कथाभेदों का उपदेश किया हो तो असम्भव नहीं है। आधुनिक विद्वान् भी अपनी विभिन्न रचनाओं में कुछ परिवर्तन, संशोधन और परिष्कार करते ही हैं। इसी तरह दुर्गासप्तशती में जिसके कोटि-कोटि पाठ होते रहते हैं, दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा मैथिली पाठों में भेद हैं और वे सभी प्रामाणिक माने जाते हैं। जब तीनों पाठों में प्राप्त होनेवाली अवतार-सामग्री को श्रीबुल्के प्रक्षेप मानते हैं तो पाठभेद का नाम लेकर उसी अंश को प्रक्षेप कहने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। ३३३ वें अनुच्छेद में उन्होंने सम्पूर्ण बालकाण्ड को प्रक्षेप बना दिया है। उक्त प्रसङ्ग में दिये गये उनके कारणों का पूर्व में पूर्णरूप से निराकरण कर दिया गया है। महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पुरुषों के चरित्र का वर्णन करते समय उनके जन्म, बाल्यकाल, विवाह आदि का वर्णन किया ही जाता है। फलतः वाल्मीकि द्वारा भी बालकाण्ड में उनके जन्मादि का वर्णन किया जाना उचित ही था। इस सम्बन्ध में वे अनुमान करते हैं कि वाल्मीकिकृत रचना में अयोध्या, दशरथ और उनके पुत्रों के परिचय के बाद अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का वर्णन प्रारम्भ हुआ होगा। इस अनुमान में वे महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश तथा विष्णुपुराण का सहारा लेते हैं। जिनमें वनवास से लेकर रावणवध तक की ही घटनाएँ वर्णित हैं। परन्तु वे उन ग्रन्थों को भी सर्वांश में प्रमाण मानने को प्रस्तुत नहीं होते, अन्यथा उन्हीं ग्रन्थों में श्रीराम को स्पष्टरूप से विष्णु का अवतार कहा गया है, पर उसे वे नहीं मानते हैं। वस्तुतः महाभारत और विष्णुपुराण आदि की रामकथा का मुख्य स्रोत वाल्मीकिरामायण को ही मानते हैं, अतः उसी का संक्षिप्त वर्णन करते हैं। संक्षिप्त करने में कुछ अंशों का छूट जाना स्वाभाविक ही है। परन्तु यदि राम के सम्पूर्ण वृत्तान्त के मूल ग्रन्थ में भी सम्पूर्ण वृत्तान्तों

३७४ रामायणमीमांसा त्रयोदश का वर्णन न किया जाय तो ऐसी स्थिति में उनकी जानकारी का कोई साधन ही नहीं रहेगा । उनके अन्य सभी तर्कों का खण्डन पीछे किया जा चुका है । दशरथवंशावली दशरथ की वंशावली के सम्बन्ध में ३३६ वें अनुच्छेद में श्रीबुल्के कहते हैं कि पौराणिक साहित्य और वाल्मीकिरामायण में प्रधान अन्तर यह है कि पौराणिक साहित्य में इक्ष्वाकु से राम तक ६३ राजाओं के नाम दिये गये हैं, किन्तु रामायण में उनकी संख्या केवल ३६ है । रामायण के ३६ नामों में केवल १८ ही नाम दोनों वंशावलियों में विद्यमान हैं । सम्भव है कि रामायण में केवल उन राजाओं के नामों का उल्लेख हो जिनका राज्याभिषेक हुआ हो । रामसाहित्य की दो अत्यन्त महत्वपूर्ण रचनाओं में वंशावली के विषय में एकरूपता नहीं है । वाल्मीकिरामायण की सूची के अनुसार २३ वाँ नाम दिलीप का है, ३६ वाँ रघु का, ३८ वाँ अज का तथा ३९ वाँ दशरथ का है (दे० बालकाण्ड सर्ग ७०) । कालिदास के रघुवंश तथा हरिवंशपुराण (१।१५।२५-२६) के अनुसार दिलीप, रघु, अज और दशरथ में क्रमशः पिता और पुत्र का सम्बन्ध है । धीरायकृष्णदास के अनुसार इसका समन्वय यह है कि इस वंश में दिलीप तथा रघु नाम के दो-दो राजा हुए हैं। द्वितीय दिलीप का नाम खट्वाङ्ग तथा द्वितीय रघु का नाम दीर्घबाहु था । परन्तु वस्तुस्थिति इससे भी पृथक् ही है, क्योंकि युगों की कल्पव्यवस्था के अनुसार पुराणों तथा रामायण की कोई भी सूची सम्पूर्ण राजाओं की सूची नहीं मानी जा सकती है । भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार ब्रह्मसंवत् सबसे प्राचीन काल-गणना है जो ब्रह्मा की उत्पत्ति से आरम्भ होकर ब्रह्मा की समाप्ति पर समाप्त होती है । २४००००० मानव वर्ष ब्रह्मा का एक पल होता है । इसी तरह घटी, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा वर्ष के अनुसार ब्रह्मा की द्विपरार्ध आयु होती है । एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, महापद्म, शङ्कु, समुद्र, अल्पपरार्ध, द्विपरार्ध सङ्ख्या होती हैं । ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं । ब्रह्मा का एक दिन चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्षों का होता है । उसमें सन्धि सहित १४ मन्वन्तर होते हैं । उनमें से ६ मन्वन्तर बीत चुके हैं । एक मन्वन्तर में ७१ महायुग (चतुर्युग) होते हैं । उनमें से २७ महायुग बीत चुके हैं । २८ वें महायुग के सत्य, त्रेता और द्वापर बीत कर २८ वां कलियुग बीत रहा है । युधिष्ठिर संवत्सर ३०४४, विक्रमी २०२७-२८ या ईसवीय १९७१-७२ में ५०७२ वर्ष कलि के बीत गये; ४२६९२६ वर्ष अवशिष्ट हैं । युगों का—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि का—दिव्य मान क्रम से ४०००, ३०००, २००० और १००० वर्ष का है । परन्तु मानव वर्ष के अनुसार कृतयुग का मान १७२८०००, त्रेता का १२९६०००, द्वापर का ८६४००० और कलि का ४३२००० वर्ष है । ऐसी स्थिति में यदि पौराणिक सूर्यवंशी ६३ राजाओं का सौ सौ वर्ष का भी राज्य-काल माना जाय तो भी दशरथ तक ६३ सौ ही वर्ष व्यतीत होते हैं । अतः यह मानना होगा कि सूर्यवंश के प्रधान प्रधान राजाओं के नामों की ही रामायण और पुराणों में सूचियाँ हैं । साथ ही उनकी आयु भी सामान्य मनुष्यों की आयु से विशिष्ट मानना उचित है, जैसे श्रीराम ने ११ हजार वर्ष तक राज्य किया था, उनके पूर्वजों ने उनसे भी अधिक काल तक राज्य किया है । नारायण, ब्रह्मा, मरीचि, कश्यप, सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि क्रम से दशरथ ६३वें ठहरते हैं । राम ६४वें ठहरते हैं । रामायण में और भी प्रधान प्रधानों का ही सङ्कलन कर संख्या घटायी गयी है । प्रतिमानाटक, अग्नि- पुराण, लिङ्गपुराण, ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, भविष्यपुराण आदि की संख्याओं का समन्वय इसी आधार पर किया जा सकता है ।

पउमचरियं के पर्व २१-२२ में दशरथसम्बन्धी विस्तृत वंशावली और उनके नाम कल्पनाप्रधान हैं । वे नाम जैनों द्वारा परिकल्पित किसी जैन राम के लिए ही सङ्गत हो सकते हैं। वैदिक रामायण के राम के लिए नहीं । इसी तरह खोतानीरामायण के अनुसार सहस्रबाहु दशरथ के पुत्र तथा राम और लक्ष्मण सहस्रबाहु के पुत्र हैं, यह कल्पना भी कल्पना ही है। सेरीराम की नामावली के अनुसार नबी आदम, दशरथ रामन, दशरथ चक्रवर्ती तथा दशरथ नामावली भी कल्पनाप्रधान ही है। इसी तरह श्याम के जातक के अनुसार दशरथ को रावण का चाचा माना जाता है। ब्रह्मा के पुत्र तप्परमेस के दशरथ और विरूह्लोक (विश्ववा) दो पुत्र थे। तप्परमेस दशरथ को अच्छा योद्धा न समझकर अपने कनिष्ठ पुत्र विरूह्लोक को राज्याधिकारी बनाता है। दशरथ राज्य छोड़कर अपनी नयी राजधानी बनाते हैं। दशरथ का भतीजा रावण भी एक नयी राजधानी लङ्का बनाता है तथा दशरथ की पुत्री शान्ता को हर लेता है। दशरथ के दो पुत्र राम और लक्ष्मण अपनी बहन शान्ता के हरण का प्रतीकार करने के लिए रावण को पराजित करते हैं। रावण की राजधानी की यात्रा में तथा यात्रा की वापसी में राम और लक्ष्मण दोनों ही अनेक विवाह करते हैं। उन विवाहों से जो पुत्र उत्पन्न होते हैं वे दूसरे राम-रावण युद्ध में राम की सहायता करते हैं। बाद में रावण के साथ सन्धि की जाती है तथा रावण और शान्ता का विवाह सम्पन्न हो जाता है। इस भूमिका के पश्चात् ही रामायण की कथा प्रारम्भ होती है, जिसमें रावण द्वारा सीता-हरण के कारण राम और रावण का नया युद्ध छिड़ जाता है। किसी भी घटना के सम्बन्ध में जब अनेक प्रकार के परस्पर विरुद्ध वर्णन विभिन्न ग्रन्थों में मिलते हैं तो सुतरां कहना पड़ता है कि उनमें से एक वर्णन ही ऐतिहासिक तथ्य है अन्य सब अप्रामाणिक एवं कल्पनाप्रधान काव्य, नाटकादिवत् मनोरञ्जनार्थ या ऐतिहासिक तथ्य में भ्रान्तिजननार्थ ही हैं। अनादि अपौरुषेय वेदों एवं तदनुसारी वाल्मीकीय आदि रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार वर्णित रामकथा ही वास्तविक रामकथा है। सर्वप्रथम बौद्धों और जैनों ने ही ऐतिहासिक तथ्यभूत रामकथा में भ्रमजननार्थ विकृत कल्पनाएँ की हैं। उसी का असर कुछ परवर्ती अन्य ग्रन्थों पर भी पड़ा है। परन्तु अधिकांश ग्रन्थों ने वाल्मीकीय रामायण का ही अनुसरण कर रामकथा का वर्णन किया है। थाईलैण्ड की रामकीर्ति में भी वाल्मीकीय रामायण का ही अधिकांश अनुसरण किया गया है। कुछ अन्य कल्पनाएँ भी हैं, पर वे वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध नहीं हैं। दशरथ-पूर्वजन्म की चर्चा रामकथाओं में दशरथ के पूर्वजन्म की चर्चा तो वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध न होकर उसकी पूरक ही है। वाल्मीकिरामायण के पूरक और समर्थक पुराणों द्वारा वर्णित दशरथ के पूर्वजन्म की कथा सत्य है। अन्य सब कल्पनामात्र ही हैं। दशरथ-विवाह आगे ३३७वें अनु० में दशरथ के विवाहों की चर्चा की गयी है। आनन्दरामायण (१।१।३२-७४) में दशरथ-कौशल्या विवाह का विस्तृत वर्णन है। उसके अनुसार दशरथ तथा कौशल्या के पुत्र तुम्हारा वध करेंगे यह बात ब्रह्मा से जानकर रावण सरयू में दशरथ की नौका तोड़कर उनको पराजित करता है। दशरथ तथा सुमन्त्र एक नौका-खण्ड के सहारे समुद्र की ओर बह जाते हैं। इतने में रावण कौशल्या को हर लेता है। उसे एक पेटिका में बन्द कर तिमिङ्गिल नामक मत्स्य की रक्षा में छोड़ देता है। तिमिङ्गिल उस पेटिका को एक द्वीप में रखकर अन्य मत्स्य से युद्ध करता है। दशरथ और सुमन्त्र उस द्वीप में पहुँचते हैं और पेटिका को देखकर उसे खोलते हैं। दशरथ कौशल्या से गान्धर्व विवाह करते हैं और तीनों पेटिका में छिप जाते हैं। अनन्तर रावण ब्रह्मा के सामने उनकी

३७६ रामायणमीमांसा त्रयोदश भविष्यवाणी को मिथ्या बतलाता है। ब्रह्मा से यह सुनकर कि दशरथ और कौशल्या का विवाह हो चुका है, रावण पेटिका मँगवाता है। उसको खोलकर कौशल्या, दशरथ तथा सुमन्त्र को देखता है। ब्रह्मा रावण को तीनों का वध करने से रोक देते हैं। वह पेटिका साकेत भेज दी जाती है, जहाँ सुमित्रा आदि अन्य सात सौ स्त्रियाँ दशरथ से विवाह करती हैं। भावार्थरामायण (५।९), पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३, स्वायम्भुवरामायण तथा रामचरितमानस के कुछ संस्करणों में इस कथा का उल्लेख है। आनन्दरामायण प्रामाणिक ग्रन्थ है, भावार्थरामायण भी प्रामाणिक ग्रन्थों पर ही आधृत है और उक्त कथा वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध न होकर उसकी पूरक ही है। अतः उक्त वृत्तान्त आस्तिकों को मान्य ही है। जैसे वाल्मीकीय रामायण आर्ष ग्रन्थ है वैसे ही महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि भी हैं, अतः उनका भी प्रामाण्य आस्तिकों द्वारा स्वीकृत है। पउमचरियं के अनुसार पद्म (राम) की माता का नाम अपराजिता था। वह अरुहस्थल के राजा सुकोशल तथा अमृतप्रभा की पुत्री थी। गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार राम की माता सुबाला थी। पूर्वजन्मसम्वन्धी कथाओं में कौशल्या को पूर्वजन्म की अदिति तथा शतरूपा माना गया है। वाल्मीकिरामायण में केकयराज-पुत्री कैकेयी के स्वयंवर की बात नहीं मिलती। पउमचरियं में (पर्व २४) इस स्वयंवर का प्रथम वर्णन हुआ है। इसके अनुसार कौतुकमङ्गल नगर के राजा शुभमति तथा उनकी पत्नी पृथ्वीश्री की पुत्री कैकेयी के स्वयंवर का आयोजन किया गया था। उस समय दशरथ तथा जनक रावण के भय से गुप्तवेश में भ्रमण कर रहे थे। संयोग से कैकेयी के स्वयंवर में पहुँच गये। कैकेयी ने दशरथ को चुन लिया। दशरथ का अन्य राजाओं से युद्ध होने लगा। उस समय कैकेयी ने राजा का रथ हाँका था। राजा ने रथ हाँकने के बदले में पुरस्काररूप से वर प्रदान किया। कैकेयी ने कहा जब आवश्यकता होगी तब माँग लूँगी। कृत्तिवासरामायण (१।२५) के अनुसार गिरिराज नगर में आयोजित कैकेयी के स्वयंवर में पृथ्वी भर के राजा निमन्त्रित थे, किन्तु उसमें युद्ध का उल्लेख नहीं है। असमीया बालकाण्ड (८।१०) में भी कैकेयी के स्वयंवर का वृत्तान्त मिलता है। सत्योपाख्यान के अनुसार किसी दिन नारद ने दशरथ के पास पहुँच कर कैकेयी के सौन्दर्य की प्रशंसा की। उन्होंने यह भी कहा कि कैकेयी की हस्तरेखा के अनुसार उसे एक महान् पुत्र उत्पन्न होगा। बाद में दशरथ ने एक देवयोगिनी को कैकेयी के पास भेजा। उसने दशरथ की प्रशंसा कर दशरथ की पत्नी बनने की इच्छा उसके मन में पैदा की। कैकेयी विरह के कारण उदासीन हो जाती है। माता उसकी उदासीनता का कारण जानकर केकयराज से दशरथ-कैकेयी विवाह का अनुरोध करती हैं। केकयराज ने दशरथ को बुलाकर कैकेयी से विवाह कर दिया और कैकेयी के पुत्र को राज्य अवश्य दिया जाय यह भी कहा। कैकेयी केकयराज की कन्या थी यह अश्वमेध के आयोजन के प्रसङ्ग में वाल्मीकिरामायण में वर्णित है। अन्य अंश की पूर्ति आर्षग्रन्थों से करनी उचित है। पउमचरियं आदि की कल्पना रामायण से ठीक विपरीत दिशा की ओर चलती है। पउमचरियं के अनुसार उसका मुख्य नायक पद्म ही है। पद्म में ही जैन विद्वान् राम का आरोप करते हैं, परन्तु उनके पात्र इनसे पृथक् और विचित्र नामों के हैं। उनका मेल-जोल रामायण से नहीं मिलता है। रामायण की कथाओं को विकृत रूप में उपस्थित करना उनकी विशिष्ट शैली है। उनके ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण के वर्णनों का उल्लेख कर खण्डन भी किया गया है। अतः रामायणप्रेमियों को पउमचरियं आदि से दूर ही रहना उचित है। ३३९ वाँ अनु०: सुमित्रा के सम्बन्ध में रघुवंश से विदित होता है कि वह मगधनरेश की पुत्री थी (रघुवंश ९।१७) यही प्रामाणिक है। पउमचरियं के अनुसार (१२।१०७, १०८) कमलसंकुलपुर के राजा सुबन्धुतिलक की कैकेयी नाम की पुत्री थी; दशरथ ने उससे विवाह किया और उसका नाम सुमित्रा रखा।

कृत्तिवास (१।२६) के अनुसार सिंहल के राजा सुमित्र ने अपनी पुत्री सुमित्रा के विवाह का निमन्त्रण दशरथ को भेजा। दशरथ ने कौशल्या तथा कैकेयी से मृगया का बहाना कर वहाँ जाकर उससे विवाह किया। विवाह की द्वितीय रात्रि को दशरथ ने नवविवाहिता पत्नी को लेकर अयोध्या को प्रस्थान किया। बंगाल में उस रात्रि को अशुभ मानकर कालरात्रि कहते हैं। वह अशुभ रात्रि दशरथ ने सुमित्रा के साथ बितायी, इसी कारण सुमित्रा दशरथ से उपेक्षित हुई। सुमित्रा को देखकर कौशल्या और कैकेयी को आशङ्का हुई। वे सोचने लगीं कि यह हमसे अधिक सुन्दरी है। दशरथ हमारी उपेक्षा करेंगे। अतः दोनों ने पार्वती तथा शङ्कर की उपासना की और उनसे वर माँगा कि सुमित्रा अभागिनी हो। बाद में सुमित्रा को प्रमाद हुआ; जिससे सब पत्नियों से सुन्दर होने पर भी दशरथ उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे तथा कैकेयी का अधिक आदर करने लगे। असमिया रामायण बालकाण्ड (अध्याय ११) के अनुसार सिंहल देश के राजा सुमित्र की पुत्री सुमित्रा थी। श्रीबुल्के की दृष्टि में कृत्तिवास की उक्त बात मौलिक है, परन्तु भारतीय प्राचीन विद्वानों की दृष्टि से मौलिक (निर्मूल) वस्तु प्रामाणिक नहीं होती है। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण तथा अध्यात्मरामायण आदि की दृष्टि से दशरथ की साढ़े तीन सौ रानियों में कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीन पट्टमहिषियाँ थीं। तीनों का अश्वमेध यज्ञ में भी विशेषोल्लेख है। दिव्य चरु के वितरण में भी सुमित्रा का ध्यान रखा गया है। दशरथ ने ही कौशल्या तथा कैकेयी दोनों के द्वारा सुमित्रा को दो भाग दिलाये जिसके परिणामस्वरूप सुमित्रा को लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो पुत्र हुए थे। कौशल्या और कैकेयी ज्येष्ठ थीं। उनकी अपेक्षा सुमित्रा कनिष्ठ थी। इस दृष्टि से उनका प्राधान्य होना भी युक्त ही है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार सुमित्रा स्वयं कौशल्या का अत्यधिक सम्मान करती थीं। वे ब्रह्मविदुषी थीं। अयोध्याकाण्ड में उन्होंने अपने तत्त्वज्ञान से कौशल्या को आश्वस्त किया था। उनके विचार में राम सूर्य के सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के प्रभु, श्री के श्री, कीर्त्ति के कीर्त्ति तथा क्षमा के भी क्षमा थे। जैसे श्रोत्र, मन आदि में शब्दादि-ग्रहण सामर्थ्यवाले श्रोत्रादि में वह सामर्थ्य आत्मा से प्राप्त होती है अतः वह श्रोत्रादि का श्रोत्रादि है— सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यः अग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्तेः कीर्त्तिः क्षमा-क्षमा ॥ (वा० रा० २।४४।१५) रामचरितमानस के अनुसार सुमित्रा के विचार से वही युवती पुत्रवती है जिसका पुत्र भगवद्भक्त होता है— “पुत्रवती युवती जग सोई, रघुवर भक्त जासु सुत होई।” (रा० मा० २।७४।१) वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण को उपदेश करती हुई कहती है कि तुम राम को दशरथ समझो, जानकी को मुझे समझो और वन को अवध समझकर जाओ राम की सेवा करो— “रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् । अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम् ॥” (वा० रा० २।४०।९) अतः सुमित्रा को अभागिनी बतलानेवाली कथा ही अभागिनी है। ३४० वाँ अनु० : जैन और बौद्धों के अनुसार अपराजिता (कौशल्या), सुमित्रा, कैकेयी तथा सुप्रभा दशरथ की चार रानियाँ थीं। अन्तिम शत्रुघ्न की माता थी। पद्मपुराण के (पाताल ख० अध्याय ११५) में चार पट्टरानियों के नाम मिलते हैं। उसके अनुसार भरत की माता सुरूपा है एवं शत्रुघ्न की माता सुवेषा है। दशरथजातक एवं तिब्बती तथा खेतानी रामायणों के अनुसार दशरथ की दो ही पटरानियाँ थीं। हिन्देशिया की रामायणों में भी दशरथ के दो ही विवाहों का उल्लेख है। सेरीराम तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार दशरथ ने अपनी नयी राजधानी का निर्माण करते समय बाँसों के समूह में सिंहासन पर बैठी हुई एक सुन्दर स्त्री को देखा जिसका ४८

२७८ | रामायणमीमांसा | त्रयोदश नाम मन्दूदारी था। दशरथ तथा मन्दूदारी विवाहोत्सव में वलियारी नामक एक उपपत्नी टूटनेवाली पालकी को सँभालती है। इसपर दशरथ उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर उसके भावी पुत्र को राज्य देने की प्रतिज्ञा करते हैं। जावा के सेरतकाण्ड में दशरथ बाँस के समूह में वलियादारू नामक एक अप्सरा को देखकर उसके साथ विवाह करते हैं तथा बाद में उसी स्थान पर वांदोदरी को भी प्राप्त करते हैं। वांदोदरी अपना नाम देवीरागो में बदल देती है। पाश्चात्यवृत्तान्त नं ११ में भी दशरथ की केवल दो रानियों का वर्णन है। भुइंआ माधवदास के उड़िया विचित्र रामायण में २१ पटरानियों की चर्चा है, जिनमें तीन श्रेष्ठ कही गयी हैं। वाल्मीकि के अनुसार राम ने वनवास के समय ३५० माताओं से बिदा ली थी— त्रयः शतशतार्धा हि ददर्शवेक्ष्य मातरः। ताश्चापि तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मजः ॥ धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलिः। संवासात् परुषं किञ्चिदज्ञानादपि यत्कृतम् ॥ तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि वः। (वा० रा० २।३९।३६-३८) पउमचरियं (२८।७१) में दशरथ की ५०० उत्तम स्त्रियों का उल्लेख है। आनन्दरामायण में दशरथ की तीन महिषियों के अतिरिक्त ७०० रानियों का उल्लेख है। कृत्तिवास एवं सारलादास के महाभारत के अनुसार दशरथ की ७५० रानियाँ थीं। असमीया बालकाण्ड के अनुसार ७०० तथा दशरथजातक के अनुसार १६००० दशरथ की स्त्रियाँ थीं। बिहोर जाति की रामकथा में दशरथ की रानियों की संख्या ७ तथा जावा के सेरतकाण्ड में दो महिषियों के अतिरिक्त ६ अन्य पत्नियाँ दशरथ की थीं। कहना न होगा कि दशरथ के चरित्र के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा रघुवंश महाकाव्य की कथाएँ ही प्रामाणिक एवं मूल हैं। अन्य लोगों ने उन्हीं के आधार पर विविध कल्पनाएँ की हैं। या अनेक स्रोतों से उन तक पहुंचते-पहुंचते उनमें अनेक विकृतियां जुड़ गयी हैं। रघुवंश का प्रत्येक राजा राजर्षि जितेन्द्रिय, सदाचारी तथा वैदिकधर्म का परम पोषक तथा विशुद्ध अधिकारी होता था। अतः दशरथ भी महान् धर्मात्मा थे। महर्षि वसिष्ठ के नेतृत्व में धर्मनियन्त्रित जीवन व्यतीत करते थे, अतः उनके उपपत्नी आदि की कल्पना सर्वथा निराधार एवं विकृतिमात्र है। वाल्मीकिरामायण तथा आनन्दरामायण का मतभेद तो कल्पभेद से समाहित कर लेना ही उचित है। समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से अनूभूत वाल्मीकिरामायण रामकथा में निष्भ्रान्त प्रमाण है। व्यास आदि महर्षियों की उक्तियाँ भी श्रद्धेय है। परन्तु अन्यथा कथन तो सुनी सुनायी बातों के आधार पर ही निर्भर है। दशरथ की सन्तति वाल्मीकि के अनुसार राजा दशरथ के राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चार पुत्र और उदीच्य पाठ के अनुसार एक शान्ता पुत्री थी। लक्ष्मण और शत्रुघ्न यमल थे। पउमचरियं में भी भरत और शत्रुघ्न यमल माने गये हैं (२५।१४)। संघदास के वसुदेवहिण्डि, गुणभद्र के उत्तरपुराण, संथाली रामकथा तथा मराठी भावार्थरामायण में भरत और शत्रुघ्न सहोदर भाई माने गये हैं। जावा के सेरतकाण्ड में दशरथ की दो पत्नियों के दो-दो पुत्र हुए। ज्येष्ठा के राम और भरत तथा कनिष्ठा के लक्ष्मण और शत्रुघ्न । हिकायत महाराज रावण में राम और लक्ष्मण कनिष्ठा के पुत्र माने गये हैं एवं भरत तथा शत्रुघ्न ज्येष्ठा के पुत्र । सेरीराम में राम तथा लक्ष्मण मन्दूदारी के पुत्र