भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 446

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६९ ब्रह्मदेश ३२९ अनु०। ब्रह्मदेश का रामकथा-साहित्य अर्वाचीन है। यहाँ के एक राजा ने १७६७ ई० में श्याम की राजधानी अयुतिया को नष्ट कर दिया था। इस विजय के बाद राजा ने श्याम के बहुत कैदियों को अपने साथ ले लिया था, जो ब्रह्मदेश में श्याम के राम-नाटक का अभिनय करने लगे। श्याम की रामकथा के आधार पर यू तो ने १८०० ई० के लगभग राम यागन की रचना की थी। यह ब्रह्मदेश का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण काव्य माना जाता है। आजकल रामनाटक, जिसे वहाँ की भाषा में याम प्वे कहते हैं, बहुत लोकप्रिय है। इसके अभिनेता बहुमूल्य चेहरे पहनते हैं और अभिनय के दिन इन चेहरों की पूजा भी करते हैं। श्याम केरामकियेन पर निर्भर होने पर भी कथानक में कहीं-कहीं मौलिकता है। सीता-हरण वहाँ के अभिनय का लोकप्रिय विषय है। इसमें शूर्पणखा, जिसका नाम गाम्बी रखा गया है, मृग का रूप धारण कर राम को दूर ले जाती है और राम से आहत किये जाने पर राक्षसीरूप से प्रकट होती है। राम की सहायता के लिए जाते हुए लक्ष्मण का कुटी के चारों ओर तीन रेखाएँ खींचने का भी इसमें उल्लेख है जो कि भारत तथा हिन्देशिया की कथाओं में मिलता है। इससे इतना तो स्पष्ट ही है कि राम-कथा, भारत में ही नहीं, किन्तु दूर-दूर पहुँची और अत्यन्त लोकप्रिय हुई। परन्तु उसी वाल्मीकिरामायण के ऐतिवृत्तिक तथ्य को विभिन्न देशों ने तथा विभिन्न धर्मानुयायियों ने अपने-अपने रूप में ढालने का प्रयत्न किया। फलतः उनकी भावनाओं के मिलजुल जाने से वेदों, उपनिषदों, वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायणों, आर्ष पुराणों, इतिहासों तथा संहिताओं के आदर्शों के विपरीत भी बहुत सी बातें जुड़ गयी हैं। त्रैलोक्यसुन्दरी सुलोचना राम के दरबार में आती है। राम के दरबार में वानरों की दृष्टि तक तो इधर-उधर नहीं हिलती है। हनुमान् तो भारतीय रामकथाओं के अनुसार अखण्ड ब्रह्मचारी, ज्ञानियों, भक्तों तथा सन्तों में अग्रगण्य हैं, परन्तु बाहरी राम-कथाओं में हनुमान्, राम और लक्ष्मण को भी अपने ही साँचे में ढालने का प्रयास किया गया है। पाश्चात्य वृत्तान्त ३३० अनु० में बुल्के कहते हैं, १५वीं० शती ई० से लेकर पाश्चात्य यात्रियों तथा मिशनरियों की भारतसम्बन्धी रचनाओं में रामकथा के विषय में बहुत सामग्री मिलती है। अर्वाचीनता तथा लेखकों की भी अपेक्षा- कृत कम जानकारी के कारण यह साहित्य महत्त्वपूर्ण नहीं है। फिर भी उपेक्षणीय नहीं है। (१) जे० फेनचियो (१६०९ ई०) एक जेसुइट मिशनरी जे० फेनचियो ने १६०९ ई० में लिव्रो डा० सेंटा की रचना की है, जिसमें दशा- वतार-निरूपण के अन्तर्गत दक्षिण की उस समय की एक रामकथा का वर्णन किया है। दशरथ के यज्ञ से लेकर सीता की अग्निपरीक्षा के प्रारम्भ तक का वृत्तान्त इसमें मिलता है। इसके बाद की हस्तलिपि के कई पन्ने खो जाने के कारण राम-कथा का पूरा वर्णन नहीं हो पाया। इसमें अधिकांश कथाएँ वाल्मीकिरामायण के अनुसार हैं। इसमें रावण-कथा का उल्लेख अरण्यकाण्ड की कथा के अन्तर्गत किया गया है। अग्निजा सीता तथा राम का स्वेच्छा से वन के लिए प्रस्थान करने का वृत्तान्त वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न है। (२) ए० रोजेरियुस (१७ वीं शती ई०) ए० रोजेरियुस डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पादरी की हैसियत से पुलिकत में ११ वर्ष तक रहे। उनकी रचना दि ओपन दोरे का प्रकाशन १६५१ में हुआ। इसमें दशावतारवर्णन के अन्तर्गत रावण-चरित से लेकर अयोध्या-प्रत्यागमन तक की रामकथा का वर्णन वाल्मीकिरामायण के अनुसार हुआ है। ४७