भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 447

३७० रामायणमीमांसा द्वादश ( ३ ) पी० वलडेयुस ( १७ वीं शती ई० ) वलडेयुस १६५८ ई० से लेकर ६ वर्ष तक सिंहलद्वीप तथा दक्षिण भारत में रहे । उनकी डच भाषा की रचना आफ गोडेरंय डर ओस्ट इंडिशे हाइडेनन जो अधिकांश उपर्युक्त वृत्तान्त नं० ( १ ) पर निर्भर है । १६७२ में प्रकाशित हुई थी । इसमें रावण-चरित से लेकर राम के स्वर्गारोहण तक की कथा है । अग्निपरीक्षा के अतिरिक्त सीता की और अनेक परीक्षाओं का उल्लेख इस रचना की एक विशेषता है । ( ४ ) ओ० डैप्पर ( १७ वीं शती ई० ) ओ० डैप्पर की असिया नामक रचना वृत्तान्त नं० ( २ ) और ( ३ ) पर निर्भर है । इसका प्रकाशन हालैण्ड में १७वीं शती में हुआ । ( ५ ) डे फरिया ( १७ वीं शती ई० ) इनकी स्पेनिश रचना असिया पोर्तुगेसा का प्रकाशन १६७४ ई० में हुआ । इसकी कथावस्तु वृत्तान्त नं० ( १ ) पर निर्भर है । ( ६ ) रलासियों डेस एरयर ( १६४४ ई० ) फ्रेञ्च भाषा की यह रचना सम्भवतः डे नोबिलि के नोट्स के आधार पर लिखी गयी हो । इसकी राम-कथा ( पृष्ठ १२-७ ) बहुत संक्षिप्त है । इसमें धोबी के वृत्तान्त के कारण सीता-त्याग का उल्लेख है । ( ७ ) ला जानटिलिटे डु बंगाल ( १६६८ ई० ) फ्रेञ्च भाषा की इस रचना की रामकथा एक पुर्तगाली वृत्तान्त से बहुत भिन्न नहीं है । इसका रचयिता अज्ञात है । ( ८ ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( क ) ( १६७० ई० ) डा० कालेंड ने तीन पुर्तगाली रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ इनका डच अनुवाद भी किया है । उक्त डाक्टर के अनुसार ( क ) वृत्तान्त १६७० ई० का है । इसमें उत्तरकाण्ड की सामग्री का भी वर्णन किया गया है । ( ६ ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( ख ) ( १७७४ ई० ) इस रचना में सीता अग्नि से उत्पन्न होती हैं । ( १० ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( ग ) ( १७२३ के पूर्व ) यह फ्रेञ्च वृत्तान्त न० ६ पर निर्भर है । ( ११ ) जे० बी० टावर्निये ( १७ वीं शती ई० ) इन्होंने अपनी भारत-यात्रा के वर्णन में, जो फ्रेञ्च भाषा में है, संक्षिप्त रामकथा का वर्णन किया है । ( १२ ) एम्० सोनेरा ( १८ वीं शती ई० ) एम्० सोनेरा ने अपनी रचना वोयाज़ ओस इंड ओरियंटाल १७८२ में पेरिस में प्रकाशित की थी । इसमें एक संक्षिप्त रामकथा मिलती है ( पृ० १६३ ) । इसमें राम १५ वर्ष की अवस्था में अयोध्या छोड़कर सीता तथा लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में तपस्या करते हैं ।