रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 448, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३७१ ( १३ ) डे पोलिये ( १८ वीं शती ई० ) इनकी रचना मिथोलोजो डेस इण्डू १८०९ ई० में पेरिस में प्रकाशित हुई। इसमें विस्तृत रामचरित ( भाग १ पृ० २९०-३९४ में ) मिलता है, जिसे डे पोलिये ने लखनऊ में १८ वीं शती के उत्तरार्द्ध में विलियम जोन्स के भूतपूर्व पण्डित से सुना था। इस रामकथा में बहुत सी कथाएँ पायी जाती हैं, जो वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न हैं लेकिन जो प्रायः अर्वाचीन वृत्तान्तों में भी मिलती हैं, जैसे रक्तजा सीता की जन्म-कथा, महिरावण के राम और लक्ष्मण को पाताल ले जाने की कथा आदि । ( १४ ) जे० ए० डुब्बा ( १६ वीं श० ई० ) इनकी प्रसिद्ध रचना 'हिन्दू मैनर्स, कस्टम्स एण्ड सेरेमोनिस' में एक संक्षिप्त रामकथा ( पृष्ठ ६१९-२४, तीसरा संस्करण ) जो वाल्मीकिरामायण से कई स्थलों में भिन्न है। जैसे, कैकेयी राम से अनुरोध करती है कि अपना राज्याधिकार भरत को दान करें। हनुमान् समुद्र की धारा पर चलकर लङ्का पहुँचते