रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं। यह अन्य बात है कि आस्तिक मण्डनीय विधया आप का चिन्तन करते हैं पर नास्तिक खण्डनीय विधया आपका चिन्तन करते हैं । परन्तु चिन्तन वह भी आपका अवश्य करते हैं । अतः जैसे आपने अपने विरोधी रावण आदि का कल्याण किया था वैसे ही आप उन नास्तिकों का भी यथासमय कल्याण अवश्य करें— “इत्येवं श्रुतिनीतिसंप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदाधासि हृदये ते शैलसाराशयाः । किन्तु प्रस्तुतविप्रतीपविधयाऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया नराः ॥” ३२७ वाँ अनु० : श्याम के उत्तर-पूर्वीय प्रान्तों में लावो भाषा बोली जाती है । लावोसाहित्य के पञ्चतन्त्र में दशरथ द्वारा अन्धमुनिपुत्र-वध तथा राम के विभीषण को शरण देने का उल्लेख मिलता है । इसके अतिरिक्त १६वी शती में रामजातक की लावो भाषा में रचना की गयी है । रामकियेन की भांति इस जातक में समस्त रामकथा का घटनास्थल श्यामदेश में ही माना गया है । पूर्वार्ध में रामजन्म की कथा दी गयी है जिसके अनुसार राम रावण के चचेरे भाई हैं । राम के केवल एक ही भाई लक्ष्मण तथा शान्ता बहन का उल्लेख है । रावण शान्ता का अपहरण करता है तथा राम और लक्ष्मण द्वारा पराजित होता है । उत्तरार्द्ध में वाल्मीकिरामायण के समस्त कथानक रामकियेन से मिलते-जुलते हैं । सीता को इन्द्राणी का अवतार माना गया है, किन्तु इनकी शेष जन्म-कथा रामकियेन के सदृश ही है । सीता-स्वयंवर में रावण उपस्थित था । सीता-खोज के समय दो वृत्तान्त अपेक्षाकृत विस्तृत हैं । (१) राम का वानर रूप धारण कर अञ्जना से हनुमान् को उत्पन्न करना । यह कथा सेरीराम के वृत्तान्त पर आधारित है । (२) राम का वाली की विधवा से विवाह करना तथा अङ्गद का पिता बनना । यह कथा अन्यत्र नहीं मिलती । इसके अनुसार हनुमान् और अङ्गद दोनों मिलकर सीता की खोज में लङ्का जाते हैं और वहाँ उत्पात भी मचाते हैं । विभीषण रावण की विधवा (शान्ता) से विवाह करते हैं । बेंजकाया के स्थान पर केले का एक वृक्ष संवार कर और उसे सीता का रूप देकर राम के शिविर के पास की नदी में बहाया जाता है । अन्य विशेषताएँ रामकियेन से अभिन्न हैं । नाग-कन्याओं का सेतु नष्ट करने का प्रयास, महिरावण की कथा, रावण के चित्र के कारण सीता का त्याग, वाल्मीकि द्वारा सीता के एक शिशु की सृष्टि, जिसका सीता पुत्रवत् पालन करती है, लव-कुश-युद्ध तथा सुखान्त निर्वहण । अन्त में जातकशैली के अनुसार राम बुद्ध, रावण देवदत्त, दशरथ शुद्धोदन, लक्ष्मण आनन्द, सीता उप्पलवण्णा आदि राम-कथा और बौद्ध इतिहास के पात्रों की अभिन्नता का उल्लेख किया गया है । रामजातक का एक अन्य रूप पालक-पालाम के नाम से विख्यात है । रामजातक से इसमें यह अन्तर है कि इसमें ब्रह्मा को रावण रूप में तथा बोधिसत्त्व को राम और लक्ष्मण के रूप में अवतरित माना गया है । अनु० ३२८ : एक विद्वान् ने ब्रह्मचक्र की एक हस्तलिपि प्राप्त की है । इसके कथानक का सार १९५७ ई० में प्रकाशित किया है । इसमें रावण, राम तथा सीता की जन्म-कथाओं का वर्णन है । इसमें सीता-स्वयंवर का वृत्तान्त दिया गया है, जिसमें अन्य राजाओं की उपस्थिति में राम धनुष चढ़ाते हैं । हनुमान् की जन्म-कथा तथा सीता-हरण का वृत्तान्त दोनों मौलिक हैं । राम का वनवास, वालि-वध, हनुमान् की लङ्का-यात्रा, लङ्का-दहन, सेतु- बन्धन, विभीषण की शरणागति, अङ्गद का दूतकार्य, महिरावण-कथा आदि सब कथाएँ अन्य रामकथाओं के समान ही हैं । सीता की अग्निपरीक्षा तथा सीता-त्याग में कुछ नये अंश हैं । लव-जन्म के बाद वाल्मीकि दूसरे शिशु कुश की सृष्टि करते हैं । लव-कुश बाद में राम से युद्ध करते हैं । इसमें भी सुखान्त राम-कथा का निर्वहण है ।