रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६७ सीता का हृदय इतना पवित्र था। दोनों पुत्रों को लेकर कुटिया पर आये जहाँ सीता पुत्रों की प्रतीक्षा कर रही थी। राम को आता जान कर सीता को बड़ा क्रोध आया। राम ने क्षमा माँगी, महलों में लौटने को कहा। सीता ने अस्वीकार कर दिया। कहा लङ्का में तो पहरे में थी, परन्तु जंगल में मैं दस वर्षों से अकेली हूँ। मेरे प्रति सन्देह के लिए अब तो पहले से भी प्रबल कारण हैं। अब मुझको पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं। राम निरुत्तर थे। पर सीता ने पुत्रों को जाने की अनुमति दे दी। अयोध्या पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। दादियों ने बड़ा ही प्रेम किया। सीता को बुलाने के लिए यह मिथ्या कहलाया गया कि राम का देहान्त हो गया है। समाचार सुनकर सीता बहुत दुःखी हुई और वह राम के शरीर का अन्तिम दर्शन करने को आयी। जहाँ राम की कल्पित अर्थी रखी हुई थी, सीता विलाप करने लगी। राम परदे के पीछे खड़े थे, निकल आये और सीता को अपने संतप्त हृदय से लगाना चाहा। पर यह देखकर तो सीता एकदम क्रुद्ध हो गयी। राम ने सीता को बलात् रोकना चाहा, पर उसने अपने मार्ग को अवरुद्ध देखकर पृथ्वी से प्रार्थना की वह उसे स्थान दे — पृथ्वी फट गयी। वह उसमें होकर पाताल चली गयी, भूमि-विवर बन्द हो गया। श्रीराम विभेक की राय से वन में जाकर तप करने लगे और राक्षसों का सफाया भी। यहाँ राम ने कुम्भाण्ड नामक देव का, जो राक्षसयोनि में था, उद्धार किया। इन्द्र ने ईश्वर से प्रार्थना की कि राम के प्रताप से राक्षसों का अन्त हो गया है। उन्होंने सम्पूर्ण जगत् को पीड़ामुक्त कर दिया है, परन्तु वे स्वयं अत्यन्त सन्तप्त हैं। उनकी प्रिय पत्नी सीता उनको त्याग कर चली गयी है। दयालु ईश्वर ने राम और सीता को बुलाया। दोनों कैलास पर्वत पर उपस्थित हुए। राम ने अनुताप से अपना दोष स्वीकार कर लिया। सीता से क्षमा-याचना की। परन्तु सीता अपने अपमान को न भूल सकती थीं और न क्षमा कर सकती थीं। फिर भी ईश्वर की निरन्तर प्रेरणा से सीता का हृदय पिघला। वह फिर राम पर स्नेह करने के लिए राजी हो गयीं। राम हर्ष से गद्गद हो गये। उनका मन आनन्द सागर में किलोलें करने लगा। प्रेम की ज्योति जाग्रत् हुई। राम आनन्द सागर में क्रीड़ा करने लगे। उनके यशपूर्ण पराक्रम से सारा जगत् जगमगा उठा। उनकी ख्याति की सुरभि से युग-युगान्तर और देश-देशान्तर सुरभित हो गये। इसी तरह अनेक देशों के अनेक विद्वानों, कवियों तथा महापुरुषों ने राम का गुणगान किया है। भले ही, महर्षि वाल्मीकि और व्यास जैसा आर्ष ज्ञान न होने से उनके वर्णनों में कहीं-कहीं रामायण के आदर्श से विभिन्नता आ गयी है। बहुत सी विचित्र एवं नयी बातें भी जुड़ गयी हैं। फिर भी उनकी भावनाएँ शुद्ध हैं। अतः वह सब भी भाव-वश्य भगवान् की आराधना ही है। परन्तु कुछ अनीश्वरवादी जैनों, बौद्धों तथा ईश्वरवादी कुछ ईसाइयों और मुस्लिमों—वेदादि शास्त्र विरोधी तत्त्वों—ने तो दुष्ट भावना से रामचरित्र को विकृत करने की भी चेष्टाएँ की हैं। उनके लिए भी यह कहा जा सकता है कि भाव-कुभाव, जैसे-तैसे, उन लोगों ने भी भगवान् राम का नाम, गुण, प्रभाव आदि का चिन्तन किया है। जैसे अनिच्छा से भी अग्निदेव का स्पर्श हो जाने पर वह दहन करता ही है। अतः उनका भी कल्याण होना उचित है। वैसे ही जाने अनजाने लिया गया भगवन्नाम भी पापों को नष्ट कर देता है— “हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तेरपि स्मृतः। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥” उदयनाचार्य नास्तिकों की सिफारिश करते हुए भगवान् से कहते हैं कि मैंने यद्यपि श्रुति-युक्ति रूप निर्मल जल से नास्तिकों के दुस्तर्क कलङ्क पङ्क से मसृणित मानस का प्रक्षालन किया तब भी यदि उनके मन में आप (परमेश्वर) पर आस्था नहीं होती तो उनके मन या अन्तःकरण को वज्र ही समझना चाहिये। किन्तु हे अकारण- करुणावरुणालय प्रभो ! प्रस्तुत ईश्वरसिद्धिविरोध के प्रसङ्ग से नास्तिक भी बड़े अभिनिवेश से आप का चिन्तन करते