रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदेश दिया सीता को ले जाओ इसे मारकर इसका कलेजा मेरे सामने लाओ । अयोध्या के भावी राजा की माता ने राम को समझाने का प्रयत्न किया, परन्तु राम ने कुछ नहीं सुना । लक्ष्मण को सन्देह नहीं था । परन्तु राजाज्ञा के सामने वह लाचार थे । दुःखी सीता रोती हुई लक्ष्मण के साथ बन की ओर चल पड़ी । किसी वृक्ष की छाया में सीता बैठ गयी और लक्ष्मण से आज्ञा पूर्ण करने की अनुरोध किया । पर लक्ष्मण निर्दोष सीता को मारने को तैयार नहीं हो सके । सीता ने मर्मभेदी वचन कहकर उन्हें उत्तेजित किया । लक्ष्मण ने लाचारी से तलवार चलायी, किन्तु स्वयं ही बेहोश होकर गिर पड़े । तलवार फूलों की माला के रूप में परिणत हो गयी । यह सीता के सतीत्व का चमत्कार था । होश आने पर लक्ष्मण सीता को जीवित देखकर प्रसन्न हुए । सच ने झूठ का मुँह काला कर दिया । लक्ष्मण देवताओं से सीता की रक्षा की प्रार्थना करके अयोध्या की ओर चल पड़े । सीता की चिन्ता में लक्ष्मण व्याकुल थे । साथ ही सीता का कलेजा भी राम के सामने हाजिर करना था । इन्द्र को दया आयी उसने माया से रेत के मैदान में एक मृत हरिण डाल दिया । लक्ष्मण ने उसका कलेजा निकाल कर राम को उसकी सूचना दे दी । राम ने उसे देखा । सीता की अवस्था पर इन्द्र को दया आयी । वह भैंसे का रूप धारण कर सीता के निकट आया । आँखों से मूक इशारा किया कि उसके साथ आओ । सीता उसके पीछे चल पड़ी । वह ऋषि की कुटिया में पहुँच गयी । दयाल ऋषि ने पितृवत् स्नेह दिया । वहीं भावी अयोध्या के राजा का जन्म हुआ । इन्द्र की पत्नियाँ धाय का काम करने लगीं । ऋषि ने बालक का नाम मङ्कुट रखा । पुत्र के मुख पर सीता के पति के सभी चिह्न थे, जिनको देखकर कलेजा दो टूक हुआ जाता था । एक दिन बालक को ऋषि के संरक्षण में छोड़कर सीता नदी में स्नान करने के लिए गयी । उसने देखा बन्दरियाँ अपने बच्चे को गले से चिपकाये हैं । बन्दरियों को कूदते देख सीता ने उनसे कहा तुम ऐसे क्यों कूदती हो, बच्चे का ध्यान नहीं ? बन्दिरियों ने कहा तुम तो हमसे भी असावधान हो । ऋषि जो कि समाधि में बैठा है, जिसे संसार की खबर ही नहीं है, उसके संरक्षण में बच्चे को छोड़कर आयी हो । सीता पर उसका असर पड़ा । वह लौट कर बच्चे को उठा लायी । इसी बीच ऋषि की समाधि खुली । बच्चा न देखकर उन्होंने दुर्घटना की सम्भावना कर सीता को दुःख से बचाने के लिए पहले बच्चे की आकृति का ही दूसरा बच्चा बना दिया । सीता ने दोनों का पालन किया । दूसरे का नाम लव हुआ । इस तरह सीता दो पुत्रों की माँ बन गयीं । लड़के दस ही वर्ष की आयु में तेजस्विता और वीरता में बड़े-बड़े सूरमाओं से भी बढ़ गये । मङ्कुट ने अपना धनुष लिया निशाना अजमाने के लिए एक वृक्ष की चोटी पर तीर छोड़ा । बाण ने विद्युत्-वेग से वृक्ष के दो टुकड़े कर दिये । उसका धमाका भूकम्प जैसा हुआ । धमाके की आवाज अयोध्या तक पहुँची । अभी तो नारायण नर-लीला कर ही रहे हैं यह कौन नया तेजस्वी पैदा हुआ । राम ने अश्वमेध रचाया । हनुमान्, भरत और शत्रुघ्न घोड़े के रक्षक नियुक्त हुए । घोड़ा घूमते हुए वहीं पहुँच गया जहाँ से वह धमाका हुआ था । घोड़े के गले में एक तख्ती बँधी थी उसमें लिखा था जो घोड़े पर चढ़ेगा विद्रोही समझा जायगा । दोनों भाइयों ने घोड़ा पकड़ लिया । युद्ध हुआ, हनुमान् मूर्च्छित हुए । परन्तु मूर्च्छा खुल गयी । मङ्कुट ने उसे ऐसा बाँध दिया कि जब तक मालिक न आयेगा बँधा ही रहेगा । भरत आदि ने बहुत यत्न किया पर बन्धन न खुला । हनुमान् लज्जित होकर राम के पास आये तो बन्धन टूटा । राम ने भरत आदि को आज्ञा दी कि लड़कों को पकड़ कर लाओ । घोर युद्ध हुआ । भरत के तीर से मङ्कुट आहत हुआ । लव माता की कुटिया में चला गया । मङ्कुट को भरत कैद कर अयोध्या ले गये । लव ने माँ से सब हाल कहा । सीता के पास एक माया की अंगूठी थी जिससे बड़े से बड़े बन्धन टूट जाते थे । लव उसे लेकर अयोध्या आया । अंगूठी के प्रभाव से मङ्कुट बन्धनमुक्त हो गया । दोनों वन वापस आये । राम ने बड़ी सेना लेकर मङ्कुट का पीछा किया । बाप-बेटों में घोर युद्ध हुआ । पुत्रों के तीर फूल बनकर पिता के चरणों पर गिरते थे पिता के तीर ऊपर ही ऊपर चले जाते थे । राम ने जानना चाहा ये किसके पुत्र हैं । जब उन्होंने सीता के पुत्र हैं, यह कहा तो उनको बड़ा कौतुक हुआ । लक्ष्मण ने राम को सीता की पूरी कहानी सुनायी, राम को बड़ा हर्ष हुआ कि महारानी