भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३९५ हनुमान् समझ गये चिकनाहट कम करने के लिए उस पर रेत फेंक दी । चिकनाहट कम हो गयी । उसको जकड़ कर मार दिया । राम अयोध्या पहुँच गये । राक्षसों के षड्यन्त्रों से भरत और शत्रुघ्न निराश होकर प्राण त्यागने के लिए तैयार थे । ठीक समय पर राम आ गये । राम का विधिवत् अभिषेक हुआ । लक्ष्मण को रोमगल प्रदेश का राजा और भरत तथा शत्रुघ्न को युवराज बनाया । सुग्रीव को खिदखिन का तथा विभेक को लङ्का का राजा बनाया गया । अङ्गद को फ्रया इन्द्रानुभाव के नाम से खिदखिन का युवराज बनाया गया । जम्बूवान को पंगताल का राज मिला । हनुमान् को अयोध्या का शासक बनाया गया । उसकी पदवी फ्रया अनुजित चक्र कृष्ण विषदन वोङ्गस हुई, परन्तु वह तो नारायण के वंशजों का राज था । ज्यों ही वह गद्दी पर बैठा उसके शरीर में आग सी लगने लगी । वह झट गद्दी पर से उतर पड़ा और अयोध्या की गद्दी गद्दी के अधिकारी को दे दी । कृतज्ञ राम ने एक तीर मारा और अनुजित को आज्ञा दी कि इसके मार्ग का पीछा करो जहाँ तीर गिरे वहीं तुम अपनी राजधानी बनाओ । तीर नौ चोटियोंवाले पहाड़ पर गिरा वह चूर चूर हो गया । राम ने विश्वकर्मा को आज्ञा दी "वहाँ अनुजित के लिए नगर बसाओ।" उसका नाम नवपुरी हुआ । फ्रया अनुजित वहाँ के राजा बने । राम सबके महाराज बने । लङ्का में विद्रोह चक्रवाल के राजा महापाल ने विभेक पर, जो कि दशगिरिवंश के नाम से वहाँ का राज करता था, आक्रमण कर दिया । राम ने अनुजित (हनुमान्) को सहायतार्थ भेजा । हनुमान् ने उसकी टाँग पकड़कर उसे चीर डाला, पर वह फिर से जुड़कर जी गया । विभेक के बताने पर हनुमान् ने उसका हृदय निकाल लिया, तब वह मर गया । कुछ दिन बाद लङ्का में फिर विद्रोह हो गया । मण्डो जब विभेक की रानी हुई तब वह गर्भवती थी । उसके पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम वैणासुरिवंश था । बड़ा होने पर गुरु ने उसके पिता का इतिहास बताया । वह विभेक से बदला लेने को तैयार हुआ । मण्डो ने समझाया पर वह नहीं माना । गुरुवरणीसुर और वैणासुरिवंश चक्रवर्ती मलिवन के पास पहुँचे । उसके पास अग्निमृत्यु और जलमृत्यु की खाइयाँ थीं । दोनों ने एक विधि से कुछ वैदिक मन्त्र पढ़े । उससे अग्नि बुझ गयी, जल पर रेत डालकर वे घुस गये । मलिवन ने उसकी सहायता के लिए लंका पर चढ़ाई कर दी और विभेक को कैद कर वैणासुरीवंश को लंका का राजा बना दिया । हनुमान् का लड़का, जो बैङ्गकाया से पैदा था, निकल भागा और पिता को सूचना दी । हनुमान् ने अयोध्या और खिदखिन की सेना लेकर लंका पर चढ़ायी की । नीलवद् ने अपना शरीर बढ़ा लिया, सागर पट गया उसी से सेना उतर गयी । भयंकर युद्ध हुआ । वैणासुरिवंश मारा गया । विभेक मुक्त हुए । मलिवन पर भी आक्रमण किया गया, वह भी मारा गया । उसकी गद्दी पर मच्छानु को बैठाया गया । सीता-वनवास विपत्ति के दिन बीत गये, आनन्द का समय आया । परन्तु भाग्य तो क्षण-क्षण में बदलता है । सीता गर्भवती थीं । सम्मनर्खा की बेटी अतुल ने संबन्धियों का बदला लेने की दृष्टि से महल की दासियों का रूप लेकर सीता से पूछा दशकण्ठ कैसा लगता था । उसको इस छल का भेद मालूम न था । उसने स्लेट पर उसका चित्र खींच दिया । वह राक्षसी उसी में समा गयी । राम अचानक आ गये । सीता ने चित्र मिटाना चाहा पर वह और अधिक चमक उठा । सीता ने उसको तकिया के नीचे छिपा दिया । राम पलंग पर लेटे तो गर्मी मालूम होने लगी, क्योंकि अतुल स्लेट के द्वारा आग जला रही थी । राम को नींद न आयी । राम ने लक्ष्मण को बुलाया । कमरे भर में गर्मी के कारण की तलाश हुई तो इस स्लेट का पता लगा । राम को आश्चर्य हुआ कि इस हत्यारे का चित्र किसने बनाया । सीता से पूछा तो उन्होंने सच-सच कह दिया । राम को इससे बड़ा आघात लगा । राम ने लक्ष्मण को