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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६७ सीता का हृदय इतना पवित्र था। दोनों पुत्रों को लेकर कुटिया पर आये जहाँ सीता पुत्रों की प्रतीक्षा कर रही थी। राम को आता जान कर सीता को बड़ा क्रोध आया। राम ने क्षमा माँगी, महलों में लौटने को कहा। सीता ने अस्वीकार कर दिया। कहा लङ्का में तो पहरे में थी, परन्तु जंगल में मैं दस वर्षों से अकेली हूँ। मेरे प्रति सन्देह के लिए अब तो पहले से भी प्रबल कारण हैं। अब मुझको पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं। राम निरुत्तर थे। पर सीता ने पुत्रों को जाने की अनुमति दे दी। अयोध्या पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। दादियों ने बड़ा ही प्रेम किया। सीता को बुलाने के लिए यह मिथ्या कहलाया गया कि राम का देहान्त हो गया है। समाचार सुनकर सीता बहुत दुःखी हुई और वह राम के शरीर का अन्तिम दर्शन करने को आयी। जहाँ राम की कल्पित अर्थी रखी हुई थी, सीता विलाप करने लगी। राम परदे के पीछे खड़े थे, निकल आये और सीता को अपने संतप्त हृदय से लगाना चाहा। पर यह देखकर तो सीता एकदम क्रुद्ध हो गयी। राम ने सीता को बलात् रोकना चाहा, पर उसने अपने मार्ग को अवरुद्ध देखकर पृथ्वी से प्रार्थना की वह उसे स्थान दे — पृथ्वी फट गयी। वह उसमें होकर पाताल चली गयी, भूमि-विवर बन्द हो गया। श्रीराम विभेक की राय से वन में जाकर तप करने लगे और राक्षसों का सफाया भी। यहाँ राम ने कुम्भाण्ड नामक देव का, जो राक्षसयोनि में था, उद्धार किया। इन्द्र ने ईश्वर से प्रार्थना की कि राम के प्रताप से राक्षसों का अन्त हो गया है। उन्होंने सम्पूर्ण जगत् को पीड़ामुक्त कर दिया है, परन्तु वे स्वयं अत्यन्त सन्तप्त हैं। उनकी प्रिय पत्नी सीता उनको त्याग कर चली गयी है। दयालु ईश्वर ने राम और सीता को बुलाया। दोनों कैलास पर्वत पर उपस्थित हुए। राम ने अनुताप से अपना दोष स्वीकार कर लिया। सीता से क्षमा-याचना की। परन्तु सीता अपने अपमान को न भूल सकती थीं और न क्षमा कर सकती थीं। फिर भी ईश्वर की निरन्तर प्रेरणा से सीता का हृदय पिघला। वह फिर राम पर स्नेह करने के लिए राजी हो गयीं। राम हर्ष से गद्गद हो गये। उनका मन आनन्द सागर में किलोलें करने लगा। प्रेम की ज्योति जाग्रत् हुई। राम आनन्द सागर में क्रीड़ा करने लगे। उनके यशपूर्ण पराक्रम से सारा जगत् जगमगा उठा। उनकी ख्याति की सुरभि से युग-युगान्तर और देश-देशान्तर सुरभित हो गये। इसी तरह अनेक देशों के अनेक विद्वानों, कवियों तथा महापुरुषों ने राम का गुणगान किया है। भले ही, महर्षि वाल्मीकि और व्यास जैसा आर्ष ज्ञान न होने से उनके वर्णनों में कहीं-कहीं रामायण के आदर्श से विभिन्नता आ गयी है। बहुत सी विचित्र एवं नयी बातें भी जुड़ गयी हैं। फिर भी उनकी भावनाएँ शुद्ध हैं। अतः वह सब भी भाव-वश्य भगवान् की आराधना ही है। परन्तु कुछ अनीश्वरवादी जैनों, बौद्धों तथा ईश्वरवादी कुछ ईसाइयों और मुस्लिमों—वेदादि शास्त्र विरोधी तत्त्वों—ने तो दुष्ट भावना से रामचरित्र को विकृत करने की भी चेष्टाएँ की हैं। उनके लिए भी यह कहा जा सकता है कि भाव-कुभाव, जैसे-तैसे, उन लोगों ने भी भगवान् राम का नाम, गुण, प्रभाव आदि का चिन्तन किया है। जैसे अनिच्छा से भी अग्निदेव का स्पर्श हो जाने पर वह दहन करता ही है। अतः उनका भी कल्याण होना उचित है। वैसे ही जाने अनजाने लिया गया भगवन्नाम भी पापों को नष्ट कर देता है— “हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तेरपि स्मृतः। अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥” उदयनाचार्य नास्तिकों की सिफारिश करते हुए भगवान् से कहते हैं कि मैंने यद्यपि श्रुति-युक्ति रूप निर्मल जल से नास्तिकों के दुस्तर्क कलङ्क पङ्क से मसृणित मानस का प्रक्षालन किया तब भी यदि उनके मन में आप (परमेश्वर) पर आस्था नहीं होती तो उनके मन या अन्तःकरण को वज्र ही समझना चाहिये। किन्तु हे अकारण- करुणावरुणालय प्रभो ! प्रस्तुत ईश्वरसिद्धिविरोध के प्रसङ्ग से नास्तिक भी बड़े अभिनिवेश से आप का चिन्तन करते

हैं। यह अन्य बात है कि आस्तिक मण्डनीय विधया आप का चिन्तन करते हैं पर नास्तिक खण्डनीय विधया आपका चिन्तन करते हैं । परन्तु चिन्तन वह भी आपका अवश्य करते हैं । अतः जैसे आपने अपने विरोधी रावण आदि का कल्याण किया था वैसे ही आप उन नास्तिकों का भी यथासमय कल्याण अवश्य करें— “इत्येवं श्रुतिनीतिसंप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदाधासि हृदये ते शैलसाराशयाः । किन्तु प्रस्तुतविप्रतीपविधयाऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया नराः ॥” ३२७ वाँ अनु० : श्याम के उत्तर-पूर्वीय प्रान्तों में लावो भाषा बोली जाती है । लावोसाहित्य के पञ्चतन्त्र में दशरथ द्वारा अन्धमुनिपुत्र-वध तथा राम के विभीषण को शरण देने का उल्लेख मिलता है । इसके अतिरिक्त १६वी शती में रामजातक की लावो भाषा में रचना की गयी है । रामकियेन की भांति इस जातक में समस्त रामकथा का घटनास्थल श्यामदेश में ही माना गया है । पूर्वार्ध में रामजन्म की कथा दी गयी है जिसके अनुसार राम रावण के चचेरे भाई हैं । राम के केवल एक ही भाई लक्ष्मण तथा शान्ता बहन का उल्लेख है । रावण शान्ता का अपहरण करता है तथा राम और लक्ष्मण द्वारा पराजित होता है । उत्तरार्द्ध में वाल्मीकिरामायण के समस्त कथानक रामकियेन से मिलते-जुलते हैं । सीता को इन्द्राणी का अवतार माना गया है, किन्तु इनकी शेष जन्म-कथा रामकियेन के सदृश ही है । सीता-स्वयंवर में रावण उपस्थित था । सीता-खोज के समय दो वृत्तान्त अपेक्षाकृत विस्तृत हैं । (१) राम का वानर रूप धारण कर अञ्जना से हनुमान् को उत्पन्न करना । यह कथा सेरीराम के वृत्तान्त पर आधारित है । (२) राम का वाली की विधवा से विवाह करना तथा अङ्गद का पिता बनना । यह कथा अन्यत्र नहीं मिलती । इसके अनुसार हनुमान् और अङ्गद दोनों मिलकर सीता की खोज में लङ्का जाते हैं और वहाँ उत्पात भी मचाते हैं । विभीषण रावण की विधवा (शान्ता) से विवाह करते हैं । बेंजकाया के स्थान पर केले का एक वृक्ष संवार कर और उसे सीता का रूप देकर राम के शिविर के पास की नदी में बहाया जाता है । अन्य विशेषताएँ रामकियेन से अभिन्न हैं । नाग-कन्याओं का सेतु नष्ट करने का प्रयास, महिरावण की कथा, रावण के चित्र के कारण सीता का त्याग, वाल्मीकि द्वारा सीता के एक शिशु की सृष्टि, जिसका सीता पुत्रवत् पालन करती है, लव-कुश-युद्ध तथा सुखान्त निर्वहण । अन्त में जातकशैली के अनुसार राम बुद्ध, रावण देवदत्त, दशरथ शुद्धोदन, लक्ष्मण आनन्द, सीता उप्पलवण्णा आदि राम-कथा और बौद्ध इतिहास के पात्रों की अभिन्नता का उल्लेख किया गया है । रामजातक का एक अन्य रूप पालक-पालाम के नाम से विख्यात है । रामजातक से इसमें यह अन्तर है कि इसमें ब्रह्मा को रावण रूप में तथा बोधिसत्त्व को राम और लक्ष्मण के रूप में अवतरित माना गया है । अनु० ३२८ : एक विद्वान् ने ब्रह्मचक्र की एक हस्तलिपि प्राप्त की है । इसके कथानक का सार १९५७ ई० में प्रकाशित किया है । इसमें रावण, राम तथा सीता की जन्म-कथाओं का वर्णन है । इसमें सीता-स्वयंवर का वृत्तान्त दिया गया है, जिसमें अन्य राजाओं की उपस्थिति में राम धनुष चढ़ाते हैं । हनुमान् की जन्म-कथा तथा सीता-हरण का वृत्तान्त दोनों मौलिक हैं । राम का वनवास, वालि-वध, हनुमान् की लङ्का-यात्रा, लङ्का-दहन, सेतु- बन्धन, विभीषण की शरणागति, अङ्गद का दूतकार्य, महिरावण-कथा आदि सब कथाएँ अन्य रामकथाओं के समान ही हैं । सीता की अग्निपरीक्षा तथा सीता-त्याग में कुछ नये अंश हैं । लव-जन्म के बाद वाल्मीकि दूसरे शिशु कुश की सृष्टि करते हैं । लव-कुश बाद में राम से युद्ध करते हैं । इसमें भी सुखान्त राम-कथा का निर्वहण है ।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६९ ब्रह्मदेश ३२९ अनु०। ब्रह्मदेश का रामकथा-साहित्य अर्वाचीन है। यहाँ के एक राजा ने १७६७ ई० में श्याम की राजधानी अयुतिया को नष्ट कर दिया था। इस विजय के बाद राजा ने श्याम के बहुत कैदियों को अपने साथ ले लिया था, जो ब्रह्मदेश में श्याम के राम-नाटक का अभिनय करने लगे। श्याम की रामकथा के आधार पर यू तो ने १८०० ई० के लगभग राम यागन की रचना की थी। यह ब्रह्मदेश का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण काव्य माना जाता है। आजकल रामनाटक, जिसे वहाँ की भाषा में याम प्वे कहते हैं, बहुत लोकप्रिय है। इसके अभिनेता बहुमूल्य चेहरे पहनते हैं और अभिनय के दिन इन चेहरों की पूजा भी करते हैं। श्याम केरामकियेन पर निर्भर होने पर भी कथानक में कहीं-कहीं मौलिकता है। सीता-हरण वहाँ के अभिनय का लोकप्रिय विषय है। इसमें शूर्पणखा, जिसका नाम गाम्बी रखा गया है, मृग का रूप धारण कर राम को दूर ले जाती है और राम से आहत किये जाने पर राक्षसीरूप से प्रकट होती है। राम की सहायता के लिए जाते हुए लक्ष्मण का कुटी के चारों ओर तीन रेखाएँ खींचने का भी इसमें उल्लेख है जो कि भारत तथा हिन्देशिया की कथाओं में मिलता है। इससे इतना तो स्पष्ट ही है कि राम-कथा, भारत में ही नहीं, किन्तु दूर-दूर पहुँची और अत्यन्त लोकप्रिय हुई। परन्तु उसी वाल्मीकिरामायण के ऐतिवृत्तिक तथ्य को विभिन्न देशों ने तथा विभिन्न धर्मानुयायियों ने अपने-अपने रूप में ढालने का प्रयत्न किया। फलतः उनकी भावनाओं के मिलजुल जाने से वेदों, उपनिषदों, वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायणों, आर्ष पुराणों, इतिहासों तथा संहिताओं के आदर्शों के विपरीत भी बहुत सी बातें जुड़ गयी हैं। त्रैलोक्यसुन्दरी सुलोचना राम के दरबार में आती है। राम के दरबार में वानरों की दृष्टि तक तो इधर-उधर नहीं हिलती है। हनुमान् तो भारतीय रामकथाओं के अनुसार अखण्ड ब्रह्मचारी, ज्ञानियों, भक्तों तथा सन्तों में अग्रगण्य हैं, परन्तु बाहरी राम-कथाओं में हनुमान्, राम और लक्ष्मण को भी अपने ही साँचे में ढालने का प्रयास किया गया है। पाश्चात्य वृत्तान्त ३३० अनु० में बुल्के कहते हैं, १५वीं० शती ई० से लेकर पाश्चात्य यात्रियों तथा मिशनरियों की भारतसम्बन्धी रचनाओं में रामकथा के विषय में बहुत सामग्री मिलती है। अर्वाचीनता तथा लेखकों की भी अपेक्षा- कृत कम जानकारी के कारण यह साहित्य महत्त्वपूर्ण नहीं है। फिर भी उपेक्षणीय नहीं है। (१) जे० फेनचियो (१६०९ ई०) एक जेसुइट मिशनरी जे० फेनचियो ने १६०९ ई० में लिव्रो डा० सेंटा की रचना की है, जिसमें दशा- वतार-निरूपण के अन्तर्गत दक्षिण की उस समय की एक रामकथा का वर्णन किया है। दशरथ के यज्ञ से लेकर सीता की अग्निपरीक्षा के प्रारम्भ तक का वृत्तान्त इसमें मिलता है। इसके बाद की हस्तलिपि के कई पन्ने खो जाने के कारण राम-कथा का पूरा वर्णन नहीं हो पाया। इसमें अधिकांश कथाएँ वाल्मीकिरामायण के अनुसार हैं। इसमें रावण-कथा का उल्लेख अरण्यकाण्ड की कथा के अन्तर्गत किया गया है। अग्निजा सीता तथा राम का स्वेच्छा से वन के लिए प्रस्थान करने का वृत्तान्त वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न है। (२) ए० रोजेरियुस (१७ वीं शती ई०) ए० रोजेरियुस डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पादरी की हैसियत से पुलिकत में ११ वर्ष तक रहे। उनकी रचना दि ओपन दोरे का प्रकाशन १६५१ में हुआ। इसमें दशावतारवर्णन के अन्तर्गत रावण-चरित से लेकर अयोध्या-प्रत्यागमन तक की रामकथा का वर्णन वाल्मीकिरामायण के अनुसार हुआ है। ४७

३७० रामायणमीमांसा द्वादश ( ३ ) पी० वलडेयुस ( १७ वीं शती ई० ) वलडेयुस १६५८ ई० से लेकर ६ वर्ष तक सिंहलद्वीप तथा दक्षिण भारत में रहे । उनकी डच भाषा की रचना आफ गोडेरंय डर ओस्ट इंडिशे हाइडेनन जो अधिकांश उपर्युक्त वृत्तान्त नं० ( १ ) पर निर्भर है । १६७२ में प्रकाशित हुई थी । इसमें रावण-चरित से लेकर राम के स्वर्गारोहण तक की कथा है । अग्निपरीक्षा के अतिरिक्त सीता की और अनेक परीक्षाओं का उल्लेख इस रचना की एक विशेषता है । ( ४ ) ओ० डैप्पर ( १७ वीं शती ई० ) ओ० डैप्पर की असिया नामक रचना वृत्तान्त नं० ( २ ) और ( ३ ) पर निर्भर है । इसका प्रकाशन हालैण्ड में १७वीं शती में हुआ । ( ५ ) डे फरिया ( १७ वीं शती ई० ) इनकी स्पेनिश रचना असिया पोर्तुगेसा का प्रकाशन १६७४ ई० में हुआ । इसकी कथावस्तु वृत्तान्त नं० ( १ ) पर निर्भर है । ( ६ ) रलासियों डेस एरयर ( १६४४ ई० ) फ्रेञ्च भाषा की यह रचना सम्भवतः डे नोबिलि के नोट्स के आधार पर लिखी गयी हो । इसकी राम-कथा ( पृष्ठ १२-७ ) बहुत संक्षिप्त है । इसमें धोबी के वृत्तान्त के कारण सीता-त्याग का उल्लेख है । ( ७ ) ला जानटिलिटे डु बंगाल ( १६६८ ई० ) फ्रेञ्च भाषा की इस रचना की रामकथा एक पुर्तगाली वृत्तान्त से बहुत भिन्न नहीं है । इसका रचयिता अज्ञात है । ( ८ ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( क ) ( १६७० ई० ) डा० कालेंड ने तीन पुर्तगाली रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ इनका डच अनुवाद भी किया है । उक्त डाक्टर के अनुसार ( क ) वृत्तान्त १६७० ई० का है । इसमें उत्तरकाण्ड की सामग्री का भी वर्णन किया गया है । ( ६ ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( ख ) ( १७७४ ई० ) इस रचना में सीता अग्नि से उत्पन्न होती हैं । ( १० ) पुर्तगाली वृत्तान्त ( ग ) ( १७२३ के पूर्व ) यह फ्रेञ्च वृत्तान्त न० ६ पर निर्भर है । ( ११ ) जे० बी० टावर्निये ( १७ वीं शती ई० ) इन्होंने अपनी भारत-यात्रा के वर्णन में, जो फ्रेञ्च भाषा में है, संक्षिप्त रामकथा का वर्णन किया है । ( १२ ) एम्० सोनेरा ( १८ वीं शती ई० ) एम्० सोनेरा ने अपनी रचना वोयाज़ ओस इंड ओरियंटाल १७८२ में पेरिस में प्रकाशित की थी । इसमें एक संक्षिप्त रामकथा मिलती है ( पृ० १६३ ) । इसमें राम १५ वर्ष की अवस्था में अयोध्या छोड़कर सीता तथा लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में तपस्या करते हैं ।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३७१ ( १३ ) डे पोलिये ( १८ वीं शती ई० ) इनकी रचना मिथोलोजो डेस इण्डू १८०९ ई० में पेरिस में प्रकाशित हुई। इसमें विस्तृत रामचरित ( भाग १ पृ० २९०-३९४ में ) मिलता है, जिसे डे पोलिये ने लखनऊ में १८ वीं शती के उत्तरार्द्ध में विलियम जोन्स के भूतपूर्व पण्डित से सुना था। इस रामकथा में बहुत सी कथाएँ पायी जाती हैं, जो वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न हैं लेकिन जो प्रायः अर्वाचीन वृत्तान्तों में भी मिलती हैं, जैसे रक्तजा सीता की जन्म-कथा, महिरावण के राम और लक्ष्मण को पाताल ले जाने की कथा आदि । ( १४ ) जे० ए० डुब्बा ( १६ वीं श० ई० ) इनकी प्रसिद्ध रचना 'हिन्दू मैनर्स, कस्टम्स एण्ड सेरेमोनिस' में एक संक्षिप्त रामकथा ( पृष्ठ ६१९-२४, तीसरा संस्करण ) जो वाल्मीकिरामायण से कई स्थलों में भिन्न है। जैसे, कैकेयी राम से अनुरोध करती है कि अपना राज्याधिकार भरत को दान करें। हनुमान् समुद्र की धारा पर चलकर लङ्का पहुँचते

३७२ रामायणमीमांसा द्वादश राम हनुमान् के कानों में कुण्डल देखते हैं, जिससे हनुमान् राम की सेवा स्वीकार करतें हैं, क्योंकि उनकी माता ने उनसे कहा था जब तुम अपना स्वामी देखोगे तभी तुम्हारे कान में कुण्डल दिखाई देंगे । हनुमान् के कुण्डलों का प्रसंग पाश्चात्य वृत्तान्त न० १, सेरीराम, रामकेर्ति तथा रामकियेन में भी मिलता है । अभी-अभी गत दिनों रूस में भारत तथा रामायण का रसियन भाषा में प्रकाशन वारेन्निकोव ने २००० वि० में ही तुलसीदास के रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया है । रामचरितमानस का अनुवाद मराठी, गुजराती आदि के अतिरिक्त अन्य विदेशी भाषाओं में भी प्रकाशित हुआ है । पाश्चात्य विद्वानों ने सुनी सुनायी वार्ता के अनुसार अधिकांश वृत लिखे हैं । भारत में ईसाई-धर्म-प्रचार के लिए मैक्समूलर ने वेदों का प्रकाशन अत्यावश्यक समझा था, क्योंकि उनकी दृष्टि से इससे हिन्दूधर्म की बहुत सी कमजोरियाँ विदित हो जायेंगी । इसी तरह ईसाई प्रचारकों को रामायण का विशेषतः विकृत रामकथा का प्रसार ईसाइयत के प्रचार में उपयुक्त प्रतीत हुआ होगा । ✱

त्रयोदश अध्याय बालकाण्ड रामकथा के १४ वें अध्याय ३३१ वें अनुच्छेद में श्रीबुल्के ने रामकथा के विकास का वर्णन किया है। उसमें उन्होंने बालकाण्ड के अधिकांश भाग को पीछे का विकास अर्थात् प्रक्षेप माना है। विशेषतः देवताओं द्वारा विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना तथा पायस प्राप्त कर दशरथ का उसे अपनी पत्नियों में बाँटना (सर्ग १५ और १६), देवताओं द्वारा अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों की उत्पत्ति का वर्णन (सर्ग १७), सिद्धाश्रम वामन की कथा (सर्ग २९), सगरपुत्रों का पाताल में भस्म होना (सर्ग ४०), समुद्रमन्थन (सर्ग ४५), विश्वामित्र के वंश की कथा (सर्ग ३२-३४) जनक द्वारा धनुष तथा सीता के अलौकिक जन्म की कथा तथा उनकी सीता-विवाह- विषयक प्रतिज्ञा (सर्ग ६६, ६७), उनकी दृष्टि में ये सब विकास ही हैं। परशुरामकथा (सर्ग ५१-६५), उनकी दृष्टि में प्रक्षेप ही है। दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय तीनों पाठों की विभिन्नता के आधार पर वे बहुत सी कथाओं को प्रक्षेप कहते हैं। परन्तु स्वयं भी वे निर्णय नहीं कर पाते हैं कि वस्तुतः कौन पाठ ठीक ओर सही है। अतएव वे इस पाठभेद का दुरुपयोग करते हुए बहुत से अंशों को प्रक्षेप सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं। इतना ही नहीं जो राम के परब्रह्म तथा विष्णु के अवतार होने की बात तीनों ही पाठों में मिलती है उसे भी प्रक्षेप कहने में उन्हें हिचक नहीं होती है। यह पीछे कहा जा चुका है कि जैसे वेदों में विभिन्न शाखाओं में पुरुषसूक्त भिन्न-भिन्न हैं। उनमें पर्याप्त पाठभेद है, परन्तु वे सभी प्रामाणिक हैं। जिस प्रकार उनको प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता उसी प्रकार प्रकृत में दाक्षिणात्य पाठ, गौडीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ तीनों ही पाठ ठीक हैं। शतकोटि-प्रविस्तर रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपने विभिन्न शिष्यों में कुछ विभिन्न पाठभेदों और कथाभेदों का उपदेश किया हो तो असम्भव नहीं है। आधुनिक विद्वान् भी अपनी विभिन्न रचनाओं में कुछ परिवर्तन, संशोधन और परिष्कार करते ही हैं। इसी तरह दुर्गासप्तशती में जिसके कोटि-कोटि पाठ होते रहते हैं, दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा मैथिली पाठों में भेद हैं और वे सभी प्रामाणिक माने जाते हैं। जब तीनों पाठों में प्राप्त होनेवाली अवतार-सामग्री को श्रीबुल्के प्रक्षेप मानते हैं तो पाठभेद का नाम लेकर उसी अंश को प्रक्षेप कहने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। ३३३ वें अनुच्छेद में उन्होंने सम्पूर्ण बालकाण्ड को प्रक्षेप बना दिया है। उक्त प्रसङ्ग में दिये गये उनके कारणों का पूर्व में पूर्णरूप से निराकरण कर दिया गया है। महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पुरुषों के चरित्र का वर्णन करते समय उनके जन्म, बाल्यकाल, विवाह आदि का वर्णन किया ही जाता है। फलतः वाल्मीकि द्वारा भी बालकाण्ड में उनके जन्मादि का वर्णन किया जाना उचित ही था। इस सम्बन्ध में वे अनुमान करते हैं कि वाल्मीकिकृत रचना में अयोध्या, दशरथ और उनके पुत्रों के परिचय के बाद अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का वर्णन प्रारम्भ हुआ होगा। इस अनुमान में वे महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश तथा विष्णुपुराण का सहारा लेते हैं। जिनमें वनवास से लेकर रावणवध तक की ही घटनाएँ वर्णित हैं। परन्तु वे उन ग्रन्थों को भी सर्वांश में प्रमाण मानने को प्रस्तुत नहीं होते, अन्यथा उन्हीं ग्रन्थों में श्रीराम को स्पष्टरूप से विष्णु का अवतार कहा गया है, पर उसे वे नहीं मानते हैं। वस्तुतः महाभारत और विष्णुपुराण आदि की रामकथा का मुख्य स्रोत वाल्मीकिरामायण को ही मानते हैं, अतः उसी का संक्षिप्त वर्णन करते हैं। संक्षिप्त करने में कुछ अंशों का छूट जाना स्वाभाविक ही है। परन्तु यदि राम के सम्पूर्ण वृत्तान्त के मूल ग्रन्थ में भी सम्पूर्ण वृत्तान्तों

३७४ रामायणमीमांसा त्रयोदश का वर्णन न किया जाय तो ऐसी स्थिति में उनकी जानकारी का कोई साधन ही नहीं रहेगा । उनके अन्य सभी तर्कों का खण्डन पीछे किया जा चुका है । दशरथवंशावली दशरथ की वंशावली के सम्बन्ध में ३३६ वें अनुच्छेद में श्रीबुल्के कहते हैं कि पौराणिक साहित्य और वाल्मीकिरामायण में प्रधान अन्तर यह है कि पौराणिक साहित्य में इक्ष्वाकु से राम तक ६३ राजाओं के नाम दिये गये हैं, किन्तु रामायण में उनकी संख्या केवल ३६ है । रामायण के ३६ नामों में केवल १८ ही नाम दोनों वंशावलियों में विद्यमान हैं । सम्भव है कि रामायण में केवल उन राजाओं के नामों का उल्लेख हो जिनका राज्याभिषेक हुआ हो । रामसाहित्य की दो अत्यन्त महत्वपूर्ण रचनाओं में वंशावली के विषय में एकरूपता नहीं है । वाल्मीकिरामायण की सूची के अनुसार २३ वाँ नाम दिलीप का है, ३६ वाँ रघु का, ३८ वाँ अज का तथा ३९ वाँ दशरथ का है (दे० बालकाण्ड सर्ग ७०) । कालिदास के रघुवंश तथा हरिवंशपुराण (१।१५।२५-२६) के अनुसार दिलीप, रघु, अज और दशरथ में क्रमशः पिता और पुत्र का सम्बन्ध है । धीरायकृष्णदास के अनुसार इसका समन्वय यह है कि इस वंश में दिलीप तथा रघु नाम के दो-दो राजा हुए हैं। द्वितीय दिलीप का नाम खट्वाङ्ग तथा द्वितीय रघु का नाम दीर्घबाहु था । परन्तु वस्तुस्थिति इससे भी पृथक् ही है, क्योंकि युगों की कल्पव्यवस्था के अनुसार पुराणों तथा रामायण की कोई भी सूची सम्पूर्ण राजाओं की सूची नहीं मानी जा सकती है । भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार ब्रह्मसंवत् सबसे प्राचीन काल-गणना है जो ब्रह्मा की उत्पत्ति से आरम्भ होकर ब्रह्मा की समाप्ति पर समाप्त होती है । २४००००० मानव वर्ष ब्रह्मा का एक पल होता है । इसी तरह घटी, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा वर्ष के अनुसार ब्रह्मा की द्विपरार्ध आयु होती है । एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, महापद्म, शङ्कु, समुद्र, अल्पपरार्ध, द्विपरार्ध सङ्ख्या होती हैं । ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं । ब्रह्मा का एक दिन चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्षों का होता है । उसमें सन्धि सहित १४ मन्वन्तर होते हैं । उनमें से ६ मन्वन्तर बीत चुके हैं । एक मन्वन्तर में ७१ महायुग (चतुर्युग) होते हैं । उनमें से २७ महायुग बीत चुके हैं । २८ वें महायुग के सत्य, त्रेता और द्वापर बीत कर २८ वां कलियुग बीत रहा है । युधिष्ठिर संवत्सर ३०४४, विक्रमी २०२७-२८ या ईसवीय १९७१-७२ में ५०७२ वर्ष कलि के बीत गये; ४२६९२६ वर्ष अवशिष्ट हैं । युगों का—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि का—दिव्य मान क्रम से ४०००, ३०००, २००० और १००० वर्ष का है । परन्तु मानव वर्ष के अनुसार कृतयुग का मान १७२८०००, त्रेता का १२९६०००, द्वापर का ८६४००० और कलि का ४३२००० वर्ष है । ऐसी स्थिति में यदि पौराणिक सूर्यवंशी ६३ राजाओं का सौ सौ वर्ष का भी राज्य-काल माना जाय तो भी दशरथ तक ६३ सौ ही वर्ष व्यतीत होते हैं । अतः यह मानना होगा कि सूर्यवंश के प्रधान प्रधान राजाओं के नामों की ही रामायण और पुराणों में सूचियाँ हैं । साथ ही उनकी आयु भी सामान्य मनुष्यों की आयु से विशिष्ट मानना उचित है, जैसे श्रीराम ने ११ हजार वर्ष तक राज्य किया था, उनके पूर्वजों ने उनसे भी अधिक काल तक राज्य किया है । नारायण, ब्रह्मा, मरीचि, कश्यप, सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि क्रम से दशरथ ६३वें ठहरते हैं । राम ६४वें ठहरते हैं । रामायण में और भी प्रधान प्रधानों का ही सङ्कलन कर संख्या घटायी गयी है । प्रतिमानाटक, अग्नि- पुराण, लिङ्गपुराण, ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, भविष्यपुराण आदि की संख्याओं का समन्वय इसी आधार पर किया जा सकता है ।

पउमचरियं के पर्व २१-२२ में दशरथसम्बन्धी विस्तृत वंशावली और उनके नाम कल्पनाप्रधान हैं । वे नाम जैनों द्वारा परिकल्पित किसी जैन राम के लिए ही सङ्गत हो सकते हैं। वैदिक रामायण के राम के लिए नहीं । इसी तरह खोतानीरामायण के अनुसार सहस्रबाहु दशरथ के पुत्र तथा राम और लक्ष्मण सहस्रबाहु के पुत्र हैं, यह कल्पना भी कल्पना ही है। सेरीराम की नामावली के अनुसार नबी आदम, दशरथ रामन, दशरथ चक्रवर्ती तथा दशरथ नामावली भी कल्पनाप्रधान ही है। इसी तरह श्याम के जातक के अनुसार दशरथ को रावण का चाचा माना जाता है। ब्रह्मा के पुत्र तप्परमेस के दशरथ और विरूह्लोक (विश्ववा) दो पुत्र थे। तप्परमेस दशरथ को अच्छा योद्धा न समझकर अपने कनिष्ठ पुत्र विरूह्लोक को राज्याधिकारी बनाता है। दशरथ राज्य छोड़कर अपनी नयी राजधानी बनाते हैं। दशरथ का भतीजा रावण भी एक नयी राजधानी लङ्का बनाता है तथा दशरथ की पुत्री शान्ता को हर लेता है। दशरथ के दो पुत्र राम और लक्ष्मण अपनी बहन शान्ता के हरण का प्रतीकार करने के लिए रावण को पराजित करते हैं। रावण की राजधानी की यात्रा में तथा यात्रा की वापसी में राम और लक्ष्मण दोनों ही अनेक विवाह करते हैं। उन विवाहों से जो पुत्र उत्पन्न होते हैं वे दूसरे राम-रावण युद्ध में राम की सहायता करते हैं। बाद में रावण के साथ सन्धि की जाती है तथा रावण और शान्ता का विवाह सम्पन्न हो जाता है। इस भूमिका के पश्चात् ही रामायण की कथा प्रारम्भ होती है, जिसमें रावण द्वारा सीता-हरण के कारण राम और रावण का नया युद्ध छिड़ जाता है। किसी भी घटना के सम्बन्ध में जब अनेक प्रकार के परस्पर विरुद्ध वर्णन विभिन्न ग्रन्थों में मिलते हैं तो सुतरां कहना पड़ता है कि उनमें से एक वर्णन ही ऐतिहासिक तथ्य है अन्य सब अप्रामाणिक एवं कल्पनाप्रधान काव्य, नाटकादिवत् मनोरञ्जनार्थ या ऐतिहासिक तथ्य में भ्रान्तिजननार्थ ही हैं। अनादि अपौरुषेय वेदों एवं तदनुसारी वाल्मीकीय आदि रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार वर्णित रामकथा ही वास्तविक रामकथा है। सर्वप्रथम बौद्धों और जैनों ने ही ऐतिहासिक तथ्यभूत रामकथा में भ्रमजननार्थ विकृत कल्पनाएँ की हैं। उसी का असर कुछ परवर्ती अन्य ग्रन्थों पर भी पड़ा है। परन्तु अधिकांश ग्रन्थों ने वाल्मीकीय रामायण का ही अनुसरण कर रामकथा का वर्णन किया है। थाईलैण्ड की रामकीर्ति में भी वाल्मीकीय रामायण का ही अधिकांश अनुसरण किया गया है। कुछ अन्य कल्पनाएँ भी हैं, पर वे वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध नहीं हैं। दशरथ-पूर्वजन्म की चर्चा रामकथाओं में दशरथ के पूर्वजन्म की चर्चा तो वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध न होकर उसकी पूरक ही है। वाल्मीकिरामायण के पूरक और समर्थक पुराणों द्वारा वर्णित दशरथ के पूर्वजन्म की कथा सत्य है। अन्य सब कल्पनामात्र ही हैं। दशरथ-विवाह आगे ३३७वें अनु० में दशरथ के विवाहों की चर्चा की गयी है। आनन्दरामायण (१।१।३२-७४) में दशरथ-कौशल्या विवाह का विस्तृत वर्णन है। उसके अनुसार दशरथ तथा कौशल्या के पुत्र तुम्हारा वध करेंगे यह बात ब्रह्मा से जानकर रावण सरयू में दशरथ की नौका तोड़कर उनको पराजित करता है। दशरथ तथा सुमन्त्र एक नौका-खण्ड के सहारे समुद्र की ओर बह जाते हैं। इतने में रावण कौशल्या को हर लेता है। उसे एक पेटिका में बन्द कर तिमिङ्गिल नामक मत्स्य की रक्षा में छोड़ देता है। तिमिङ्गिल उस पेटिका को एक द्वीप में रखकर अन्य मत्स्य से युद्ध करता है। दशरथ और सुमन्त्र उस द्वीप में पहुँचते हैं और पेटिका को देखकर उसे खोलते हैं। दशरथ कौशल्या से गान्धर्व विवाह करते हैं और तीनों पेटिका में छिप जाते हैं। अनन्तर रावण ब्रह्मा के सामने उनकी

३७६ रामायणमीमांसा त्रयोदश भविष्यवाणी को मिथ्या बतलाता है। ब्रह्मा से यह सुनकर कि दशरथ और कौशल्या का विवाह हो चुका है, रावण पेटिका मँगवाता है। उसको खोलकर कौशल्या, दशरथ तथा सुमन्त्र को देखता है। ब्रह्मा रावण को तीनों का वध करने से रोक देते हैं। वह पेटिका साकेत भेज दी जाती है, जहाँ सुमित्रा आदि अन्य सात सौ स्त्रियाँ दशरथ से विवाह करती हैं। भावार्थरामायण (५।९), पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३, स्वायम्भुवरामायण तथा रामचरितमानस के कुछ संस्करणों में इस कथा का उल्लेख है। आनन्दरामायण प्रामाणिक ग्रन्थ है, भावार्थरामायण भी प्रामाणिक ग्रन्थों पर ही आधृत है और उक्त कथा वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध न होकर उसकी पूरक ही है। अतः उक्त वृत्तान्त आस्तिकों को मान्य ही है। जैसे वाल्मीकीय रामायण आर्ष ग्रन्थ है वैसे ही महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि भी हैं, अतः उनका भी प्रामाण्य आस्तिकों द्वारा स्वीकृत है। पउमचरियं के अनुसार पद्म (राम) की माता का नाम अपराजिता था। वह अरुहस्थल के राजा सुकोशल तथा अमृतप्रभा की पुत्री थी। गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार राम की माता सुबाला थी। पूर्वजन्मसम्वन्धी कथाओं में कौशल्या को पूर्वजन्म की अदिति तथा शतरूपा माना गया है। वाल्मीकिरामायण में केकयराज-पुत्री कैकेयी के स्वयंवर की बात नहीं मिलती। पउमचरियं में (पर्व २४) इस स्वयंवर का प्रथम वर्णन हुआ है। इसके अनुसार कौतुकमङ्गल नगर के राजा शुभमति तथा उनकी पत्नी पृथ्वीश्री की पुत्री कैकेयी के स्वयंवर का आयोजन किया गया था। उस समय दशरथ तथा जनक रावण के भय से गुप्तवेश में भ्रमण कर रहे थे। संयोग से कैकेयी के स्वयंवर में पहुँच गये। कैकेयी ने दशरथ को चुन लिया। दशरथ का अन्य राजाओं से युद्ध होने लगा। उस समय कैकेयी ने राजा का रथ हाँका था। राजा ने रथ हाँकने के बदले में पुरस्काररूप से वर प्रदान किया। कैकेयी ने कहा जब आवश्यकता होगी तब माँग लूँगी। कृत्तिवासरामायण (१।२५) के अनुसार गिरिराज नगर में आयोजित कैकेयी के स्वयंवर में पृथ्वी भर के राजा निमन्त्रित थे, किन्तु उसमें युद्ध का उल्लेख नहीं है। असमीया बालकाण्ड (८।१०) में भी कैकेयी के स्वयंवर का वृत्तान्त मिलता है। सत्योपाख्यान के अनुसार किसी दिन नारद ने दशरथ के पास पहुँच कर कैकेयी के सौन्दर्य की प्रशंसा की। उन्होंने यह भी कहा कि कैकेयी की हस्तरेखा के अनुसार उसे एक महान् पुत्र उत्पन्न होगा। बाद में दशरथ ने एक देवयोगिनी को कैकेयी के पास भेजा। उसने दशरथ की प्रशंसा कर दशरथ की पत्नी बनने की इच्छा उसके मन में पैदा की। कैकेयी विरह के कारण उदासीन हो जाती है। माता उसकी उदासीनता का कारण जानकर केकयराज से दशरथ-कैकेयी विवाह का अनुरोध करती हैं। केकयराज ने दशरथ को बुलाकर कैकेयी से विवाह कर दिया और कैकेयी के पुत्र को राज्य अवश्य दिया जाय यह भी कहा। कैकेयी केकयराज की कन्या थी यह अश्वमेध के आयोजन के प्रसङ्ग में वाल्मीकिरामायण में वर्णित है। अन्य अंश की पूर्ति आर्षग्रन्थों से करनी उचित है। पउमचरियं आदि की कल्पना रामायण से ठीक विपरीत दिशा की ओर चलती है। पउमचरियं के अनुसार उसका मुख्य नायक पद्म ही है। पद्म में ही जैन विद्वान् राम का आरोप करते हैं, परन्तु उनके पात्र इनसे पृथक् और विचित्र नामों के हैं। उनका मेल-जोल रामायण से नहीं मिलता है। रामायण की कथाओं को विकृत रूप में उपस्थित करना उनकी विशिष्ट शैली है। उनके ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण के वर्णनों का उल्लेख कर खण्डन भी किया गया है। अतः रामायणप्रेमियों को पउमचरियं आदि से दूर ही रहना उचित है। ३३९ वाँ अनु०: सुमित्रा के सम्बन्ध में रघुवंश से विदित होता है कि वह मगधनरेश की पुत्री थी (रघुवंश ९।१७) यही प्रामाणिक है। पउमचरियं के अनुसार (१२।१०७, १०८) कमलसंकुलपुर के राजा सुबन्धुतिलक की कैकेयी नाम की पुत्री थी; दशरथ ने उससे विवाह किया और उसका नाम सुमित्रा रखा।

कृत्तिवास (१।२६) के अनुसार सिंहल के राजा सुमित्र ने अपनी पुत्री सुमित्रा के विवाह का निमन्त्रण दशरथ को भेजा। दशरथ ने कौशल्या तथा कैकेयी से मृगया का बहाना कर वहाँ जाकर उससे विवाह किया। विवाह की द्वितीय रात्रि को दशरथ ने नवविवाहिता पत्नी को लेकर अयोध्या को प्रस्थान किया। बंगाल में उस रात्रि को अशुभ मानकर कालरात्रि कहते हैं। वह अशुभ रात्रि दशरथ ने सुमित्रा के साथ बितायी, इसी कारण सुमित्रा दशरथ से उपेक्षित हुई। सुमित्रा को देखकर कौशल्या और कैकेयी को आशङ्का हुई। वे सोचने लगीं कि यह हमसे अधिक सुन्दरी है। दशरथ हमारी उपेक्षा करेंगे। अतः दोनों ने पार्वती तथा शङ्कर की उपासना की और उनसे वर माँगा कि सुमित्रा अभागिनी हो। बाद में सुमित्रा को प्रमाद हुआ; जिससे सब पत्नियों से सुन्दर होने पर भी दशरथ उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे तथा कैकेयी का अधिक आदर करने लगे। असमिया रामायण बालकाण्ड (अध्याय ११) के अनुसार सिंहल देश के राजा सुमित्र की पुत्री सुमित्रा थी। श्रीबुल्के की दृष्टि में कृत्तिवास की उक्त बात मौलिक है, परन्तु भारतीय प्राचीन विद्वानों की दृष्टि से मौलिक (निर्मूल) वस्तु प्रामाणिक नहीं होती है। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण तथा अध्यात्मरामायण आदि की दृष्टि से दशरथ की साढ़े तीन सौ रानियों में कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीन पट्टमहिषियाँ थीं। तीनों का अश्वमेध यज्ञ में भी विशेषोल्लेख है। दिव्य चरु के वितरण में भी सुमित्रा का ध्यान रखा गया है। दशरथ ने ही कौशल्या तथा कैकेयी दोनों के द्वारा सुमित्रा को दो भाग दिलाये जिसके परिणामस्वरूप सुमित्रा को लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो पुत्र हुए थे। कौशल्या और कैकेयी ज्येष्ठ थीं। उनकी अपेक्षा सुमित्रा कनिष्ठ थी। इस दृष्टि से उनका प्राधान्य होना भी युक्त ही है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार सुमित्रा स्वयं कौशल्या का अत्यधिक सम्मान करती थीं। वे ब्रह्मविदुषी थीं। अयोध्याकाण्ड में उन्होंने अपने तत्त्वज्ञान से कौशल्या को आश्वस्त किया था। उनके विचार में राम सूर्य के सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के प्रभु, श्री के श्री, कीर्त्ति के कीर्त्ति तथा क्षमा के भी क्षमा थे। जैसे श्रोत्र, मन आदि में शब्दादि-ग्रहण सामर्थ्यवाले श्रोत्रादि में वह सामर्थ्य आत्मा से प्राप्त होती है अतः वह श्रोत्रादि का श्रोत्रादि है— सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यः अग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्तेः कीर्त्तिः क्षमा-क्षमा ॥ (वा० रा० २।४४।१५) रामचरितमानस के अनुसार सुमित्रा के विचार से वही युवती पुत्रवती है जिसका पुत्र भगवद्भक्त होता है— “पुत्रवती युवती जग सोई, रघुवर भक्त जासु सुत होई।” (रा० मा० २।७४।१) वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण को उपदेश करती हुई कहती है कि तुम राम को दशरथ समझो, जानकी को मुझे समझो और वन को अवध समझकर जाओ राम की सेवा करो— “रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् । अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम् ॥” (वा० रा० २।४०।९) अतः सुमित्रा को अभागिनी बतलानेवाली कथा ही अभागिनी है। ३४० वाँ अनु० : जैन और बौद्धों के अनुसार अपराजिता (कौशल्या), सुमित्रा, कैकेयी तथा सुप्रभा दशरथ की चार रानियाँ थीं। अन्तिम शत्रुघ्न की माता थी। पद्मपुराण के (पाताल ख० अध्याय ११५) में चार पट्टरानियों के नाम मिलते हैं। उसके अनुसार भरत की माता सुरूपा है एवं शत्रुघ्न की माता सुवेषा है। दशरथजातक एवं तिब्बती तथा खेतानी रामायणों के अनुसार दशरथ की दो ही पटरानियाँ थीं। हिन्देशिया की रामायणों में भी दशरथ के दो ही विवाहों का उल्लेख है। सेरीराम तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार दशरथ ने अपनी नयी राजधानी का निर्माण करते समय बाँसों के समूह में सिंहासन पर बैठी हुई एक सुन्दर स्त्री को देखा जिसका ४८

२७८ | रामायणमीमांसा | त्रयोदश नाम मन्दूदारी था। दशरथ तथा मन्दूदारी विवाहोत्सव में वलियारी नामक एक उपपत्नी टूटनेवाली पालकी को सँभालती है। इसपर दशरथ उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर उसके भावी पुत्र को राज्य देने की प्रतिज्ञा करते हैं। जावा के सेरतकाण्ड में दशरथ बाँस के समूह में वलियादारू नामक एक अप्सरा को देखकर उसके साथ विवाह करते हैं तथा बाद में उसी स्थान पर वांदोदरी को भी प्राप्त करते हैं। वांदोदरी अपना नाम देवीरागो में बदल देती है। पाश्चात्यवृत्तान्त नं ११ में भी दशरथ की केवल दो रानियों का वर्णन है। भुइंआ माधवदास के उड़िया विचित्र रामायण में २१ पटरानियों की चर्चा है, जिनमें तीन श्रेष्ठ कही गयी हैं। वाल्मीकि के अनुसार राम ने वनवास के समय ३५० माताओं से बिदा ली थी— त्रयः शतशतार्धा हि ददर्शवेक्ष्य मातरः। ताश्चापि तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मजः ॥ धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलिः। संवासात् परुषं किञ्चिदज्ञानादपि यत्कृतम् ॥ तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि वः। (वा० रा० २।३९।३६-३८) पउमचरियं (२८।७१) में दशरथ की ५०० उत्तम स्त्रियों का उल्लेख है। आनन्दरामायण में दशरथ की तीन महिषियों के अतिरिक्त ७०० रानियों का उल्लेख है। कृत्तिवास एवं सारलादास के महाभारत के अनुसार दशरथ की ७५० रानियाँ थीं। असमीया बालकाण्ड के अनुसार ७०० तथा दशरथजातक के अनुसार १६००० दशरथ की स्त्रियाँ थीं। बिहोर जाति की रामकथा में दशरथ की रानियों की संख्या ७ तथा जावा के सेरतकाण्ड में दो महिषियों के अतिरिक्त ६ अन्य पत्नियाँ दशरथ की थीं। कहना न होगा कि दशरथ के चरित्र के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा रघुवंश महाकाव्य की कथाएँ ही प्रामाणिक एवं मूल हैं। अन्य लोगों ने उन्हीं के आधार पर विविध कल्पनाएँ की हैं। या अनेक स्रोतों से उन तक पहुंचते-पहुंचते उनमें अनेक विकृतियां जुड़ गयी हैं। रघुवंश का प्रत्येक राजा राजर्षि जितेन्द्रिय, सदाचारी तथा वैदिकधर्म का परम पोषक तथा विशुद्ध अधिकारी होता था। अतः दशरथ भी महान् धर्मात्मा थे। महर्षि वसिष्ठ के नेतृत्व में धर्मनियन्त्रित जीवन व्यतीत करते थे, अतः उनके उपपत्नी आदि की कल्पना सर्वथा निराधार एवं विकृतिमात्र है। वाल्मीकिरामायण तथा आनन्दरामायण का मतभेद तो कल्पभेद से समाहित कर लेना ही उचित है। समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से अनूभूत वाल्मीकिरामायण रामकथा में निष्भ्रान्त प्रमाण है। व्यास आदि महर्षियों की उक्तियाँ भी श्रद्धेय है। परन्तु अन्यथा कथन तो सुनी सुनायी बातों के आधार पर ही निर्भर है। दशरथ की सन्तति वाल्मीकि के अनुसार राजा दशरथ के राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चार पुत्र और उदीच्य पाठ के अनुसार एक शान्ता पुत्री थी। लक्ष्मण और शत्रुघ्न यमल थे। पउमचरियं में भी भरत और शत्रुघ्न यमल माने गये हैं (२५।१४)। संघदास के वसुदेवहिण्डि, गुणभद्र के उत्तरपुराण, संथाली रामकथा तथा मराठी भावार्थरामायण में भरत और शत्रुघ्न सहोदर भाई माने गये हैं। जावा के सेरतकाण्ड में दशरथ की दो पत्नियों के दो-दो पुत्र हुए। ज्येष्ठा के राम और भरत तथा कनिष्ठा के लक्ष्मण और शत्रुघ्न । हिकायत महाराज रावण में राम और लक्ष्मण कनिष्ठा के पुत्र माने गये हैं एवं भरत तथा शत्रुघ्न ज्येष्ठा के पुत्र । सेरीराम में राम तथा लक्ष्मण मन्दूदारी के पुत्र

माने जाते हैं। इस रचना में शान्ता भरत और शत्रुघ्न की सहोदरी है। माता का नाम बलियादारी है। सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार लक्ष्मण राम के सखा थे, भाई नहीं। राम स्वयं विष्णु के सेनापति के पुत्र हैं। एक अन्य विकृत वृत्तान्त के अनुसार राम परमेश्वरी के पुत्र माने जाते हैं। ज्ञातव्य है कि श्रीबुल्के भी उक्त वृत्तान्त को विकृत ही मानते हैं। इसी प्रकार कहा जाता है कि वाल्मीकिरामायण के पाठ-भेदों में भरत तथा लक्ष्मण में कौन ज्येष्ठ है इस संबन्ध में मतभेद है। दशरथजातक तथा वाल्मीकिरामायण के उदीच्य पाठ में भरत कनिष्ठ माने जाते हैं (वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ १।१९।१०। वा० रा० पश्चिमोत्तरीय पाठ १।१४।५) । लेकिन दाक्षिणात्य पाठ में लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न कनिष्ठ हैं। परन्तु दाक्षिणात्य पाठ में भी एक स्थल पर भरत कनिष्ठ प्रतीत होते हैं जैसे— “ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीञ्च परन्तपः । अथाभ्यवादयत्प्रीतो भरतो नाम चाब्रवीत् ॥” (वा० रा० ६।१२।७) अर्थात् राम से मिलने के बाद भरत ने लक्ष्मण और वैदेही से मिलकर भरत नाम लेकर अभिवादन किया। वस्तुतः उपर्युक्त श्लोक का अर्थ यह समझना चाहिये कि राम से मिलने के बाद परन्तप भरत ने लक्ष्मण से मिलकर अपना भरत नाम लेकर वैदेही का अभिवादन किया, अतएव भरतज्यैष्ठ्यनिर्णय ग्रन्थ द्वारा भरत का ही ज्येष्ठत्व निश्चित है (दे० मद्रास कैटलाग नं० ३४९२ सी) तथा प्रतिमानाटक में भरत को लक्ष्मण का अनुज कहा गया है। श्रीबुल्के के अनुसार भी प्राचीन काल में अधिकांश रामकथाओं में अग्निपुराण, कूर्मपुराण, रामायणमञ्जरी, रघुवंश आदि में भरत को ही ज्येष्ठ माना गया है। अतएव युद्ध के बाद लक्ष्मण ही भरत का अभिवादन करते हैं रघुवंश (१३।७३) । पाठभेद के आधार पर भरत के कनिष्ठ होने की कथा को कल्पान्तरीय मानना चाहिये। बहुत सी विदेशी कथाओं में दशरथ के केवल दो पुत्रों का उल्लेख है। तिब्बती रामायण में दशरथ की दो पत्नियों को एक-एक पुत्र हुआ था। खोतानी रामायण में भी राम और लक्ष्मण दो पुत्रों का ही उल्लेख है। किन्तु इस रचना में दोनों सहस्रबाहु के पुत्र तथा दशरथ के पौत्र माने जाते हैं। प्रधानता के कारण संभव है कि विदेशों में राम और लक्ष्मण की ही चर्चा पहुँची होगी, फिर भी प्रामाणिक रामायणों के अनुसार चार पुत्र और शान्ता कन्या की बात ही प्रामाणिक है। शान्ता दशरथ की औरसी तथा रोमपाद की दत्ता पुत्री अनु० ३४३ : वाल्मीकिरामायण के दक्षिणात्य पाठ में दशरथ तथा रोमपाद की घनिष्ठता का निर्देश है। “अङ्गराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति ।” (वा० रा० १।९।१३) “सख्यं सम्बन्धकञ्चैव तदा तं प्रत्यपूजयत् ।” (वा० रा० १।९।१८) यों शान्ता रोमपाद की पुत्री थी (वा० रा० १।९।१३ और १।११।१९)। यह भी स्पष्ट है कि शान्ता को रोमपाद ने ऋष्यशृङ्ग के लिए पत्नीरूप में प्रदान किया था। सुमन्त्र के परामर्शानुसार दशरथ रोमपाद के निकट जाकर निवेदन करते हैं कि ऋष्यशृङ्ग अयोध्या आकर अश्वमेध अनुष्ठान करें। तदनुसार ऋष्यशृङ्ग सपत्नीक दशरथ के साथ अयोध्या आते हैं। पुनश्च शान्ता अपने मायके वापस आयी इसका कोई संकेत नहीं मिलता¹ (वा० रा० १।११।३०) । दशरथ को अपत्य भी कहा गया है (वा० रा० १।११।५) । गौडीय पश्चिमोत्तरीय पाठों में शान्ता रोमपाद की पुत्री मानी जाती है। “शान्तां स्वकां दुहितरम्” (गौ० पा० वा० रा० १।८।२६; प० पा० १।८।२५ ।) “उवास तत्र सुखिता कञ्चित् कालं सहद्विजा ।” (वा० रा० १।११।३१) के अनुसार विदित होता है कि शान्ता अपने पति के साथ वहाँ कुछ ही काल रही थी। एतावता यज्ञसंपादन के अनन्तर वह अपने मायके गयी ही होगी।

३८० रामायणमीमांसा त्रयोदश महाभारत में रोमपाद को 'सखा दशरथस्य' कहा है ( म०भा० ३।११०।१९ ) तथा इसका कई स्थलों पर उल्लेख है कि रोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता को ऋष्यशृङ्ग को प्रदान किया था । ( म० भा० ३।११०।५; १२।२२६।३५; १३।१३७।२५ ) । हरिवंश ( १।३१।४६ ), मत्स्यपुराण ( ४८।९९, ९९।१०३ ) तथा ब्रह्मपुराण ( १३।४० ) । इन सब में शान्ता को रोमपाद की पुत्री कहा गया है । फिर भी यह असंभव नहीं है कि दाक्षिणात्य पाठ के कुछ द्वयर्थक स्थलों के कारण शान्ता दशरथ की पुत्री मानी जाने लगी हो । सुमन्त्र दशरथ से कहते हैं, “ऋष्यशृङ्गस्तु जामाता पुत्रांस्तव विधास्यति” ( वा० रा० १।९।१९ ) । यहाँ पर सन्दर्भ के कारण ऋष्यशृङ्ग को रोमपाद का ही जामाता समझना चाहिये, किन्तु व्याकरण की दृष्टि से वह दशरथ के भी जामाता हो सकते हैं । इसी कारण टीकाकार गोविन्दराज लिखते हैं— “जामाता रोमपादस्य दशरथस्यापि दशरथस्यौरसी शान्ता दत्ता रोमपादस्य ।” १. यह कहना चिन्त्य है। १।११।३० श्लोकार्थ पर दृष्टि देने से संकेत स्पष्टतः प्रतीत होता है— विशालाक्षी शान्ता को पति के साथ आयी हुई देखकर राजा दशरथ का सारा अन्तःपुर शान्ताविषयक प्रेम से अत्यन्त आनन्दित हुआ । रामाभिरामीय टीका में नागेशजी लिखते हैं—बहुकालविश्लेषोत्तरं मिलितत्वाच्चा- नन्दाभिरन्तःपुरस्य । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि नागेशजी को भी शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री है यह इष्ट था । रोमपाद की वह दत्ता पुत्री थी । वस्तुतः शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री तथा रोमपाद की दत्ता पुत्री थी । यहाँ व्याकरण की कोई बात नहीं है, अतएव महावैयाकरण नागेश अपनी रामाभिरामीया टीका में यही समाधान करते हैं कि अङ्गराज रोमपाद दशरथ के मित्र हैं, अतः मित्र के जामाता होने से दशरथ के भी जामाता हैं । “मित्रजामाता स्वस्यापि जामातेवेत्यतो जामातेत्युक्तिः ।” इसी तरह “इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः । नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रवः ॥” ( वा० रा० १।११।२ ) तथा अङ्गराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति । कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति ।” ( वा० रा० १।११।३ ) यहाँ 'अस्य' शब्द स्पष्टरूप से रोमपाद से सम्बन्ध रखता है भले किसी संस्करण में तस्य पाठ भी मिलता हो तथापि मूल व्यापक पाठ 'अस्य' ही है । नागेश ने 'अस्य' का 'अङ्गराजस्य' अर्थ किया है । “अङ्गोराजोऽनपत्यस्तु लोमपादो भविष्यति । स राजानं दशरथं प्रार्थयिष्यति भूमिपः ॥ अनपत्याय मे कन्यां सखे दातुं त्वमर्हसि । शान्तां शान्तेन मनसा पुत्रार्थं वरवर्णिनीम् ॥” ( गो० पा० वा० रा० १।१०।४) ; प० पा० वा० रा० १।९।४,५ ) । उदीच्य पाठों के उसी सर्ग में लोमपाद ऋष्यशृङ्ग के पास जाकर दशरथ के विषय में कहते हैं— “अनेन मेऽनपत्याय दत्तेयं वरणिनी । याचते पुत्रकृत्यार्थं शान्ता प्रियतमात्मजा ॥”

अध्याय बालकाण्ड ३८१ इससे स्पष्ट है कि गौडीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ के अनुसार शान्ता दशरथ की ही पुत्री थी, जिसे दशरथ ने लोमपाद को दत्तकरूप में प्रदान किया था। श्रीबुल्के के अनुसार उदीच्य पाठों की यह धारणा दाक्षिणात्य पाठ की द्व्यर्थता से उत्पन्न तो हो सकी है, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि इसका वास्तविक कारण अन्यत्र ढूंढ़ना चाहिए। हरिवंश, मत्स्यपुराण, वायुपुराण तथा ब्रह्मपुराण के अनुसार अङ्गराज चित्ररथ के दो नाम थे दशरथ तथा लोमपाद, अतः शान्ता पहले अङ्गराज दशरथ की पुत्री मानी गयी थी; किन्तु अयोध्यानरेश अज-पुत्र दशरथ कहीं अधिक विख्यात थे, शान्ता बाद में उन्हीं दशरथ की पुत्री मानी जाने लगी। “अथ चित्ररथस्यापि पुत्रो दशरथोऽभवत् । लोमपाद इति ख्यातो यस्य शान्ता सुताऽभवत् ॥” (ह० व० १।३१।४६) परवर्ती रचनाओं, में बहुधा अयोध्यानरेश दशरथ की पुत्री शान्ता का उल्लेख किया गया। उदाहरणार्थ विष्णुपुराण (४।१२।१६), भवभूति का उत्तररामचरित (अङ्क १ की प्रस्तावना ), स्कन्दपुराण (नागरखण्ड अध्याय ९८) पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० १२) आनन्दरामायण (१।१।१६,१७), असमिया बालकाण्ड (अ० १८), मराठी भावार्थरामायण तथा सारलादास का उड़िया महाभारत । भावार्थरामायण में इन्द्र दशरथ को शान्ता तथा ऋष्यशृङ्ग का विवाह सम्पन्न करने का परामर्श देते हैं (१।१) । गोविन्दराज ने ( १।९।१९) उद्धरण में शान्ता को दशरथ की औरसी पुत्री माना है। इसी प्रकार सर्ग ११ में रोमपाद तथा दशरथ के जो 'सम्बन्धकम्' का उल्लेख है उसका रामवर्मा तथा गोविन्दराज यह अर्थ करते हैं कि शान्ता दशरथ की पुत्री थी जिसे उन्होंने रोमपाद को प्रदान किया था (वा० रा० १।११।१८) । कृत्तिवास रामायण ( १।२९ ) के अनुसार दशरथ ने निःसन्तान लोमपाद को अपनी पहली सन्तान देने की प्रतिज्ञा की थी। अतः जब उनकी पत्नी (भार्गव राजा की पुत्री) एक कन्या को जन्म देती है, दशरथ उसका नाम हेमलता रखकर उसे लोमपाद के यहाँ भेजते हैं। बाद में हेमलता के नाम का उल्लेख नहीं मिलता है। किन्तु दशरथ की कन्या का नाम शान्ता ही माना जाता है। बङ्गाल की रामकथाओं में दशरथ की पुत्री का प्रायः उल्लेख मिलता है। अद्भुताचार्य के रामायण में इनका नाम शान्ता ही है, किन्तु चन्द्रावतीकृत रामायण में कुकुआ नाम की कैकेयी की एक पुत्री की चर्चा है (दे० दिनेशचन्द्र सेन पृ० १९७) । सुवर्चँस् रामायण में शान्ता के प्रति सीता के शाप तथा उसके पक्षी योनि प्राप्त करने की कथा पायी जाती है। विदेश की कुछ ही कथाओं में दशरथ की पुत्री का उल्लेख है। हिन्दोनेशिया के सेरीराम में इनका नाम कीकवी है और वह भरत और शत्रुघ्न की सहोदरी मानी जाती हैं। श्याम के रामजातक तथा पालकपालाम में दशरथात्मजा शान्ता का विवाह रावण से होता है। दशरथजातक में सीता को दशरथ की पुत्री माना जाता है। माधवदासकृत विचित्ररामायण के अनुसार शान्ता की उत्पत्ति निम्नोक्त प्रकार से हुई है, दशरथ ने इन्द्र के यहाँ जाते समय उतावली के कारण गोमाता तथा मुनि ताराक्ष्य की अवज्ञा की थी और मुनि ने उन्हें निःसन्तान होने का शाप दिया था। लौटते समय दशरथ मुनि से मिले। दशरथ की अनुनयविनय को सुनकर मुनि ने शाप बदल कर कहा तुम्हारी पहली सन्तान एक लड़की होगी; तुमको उसे ऋष्यशृङ्ग को देना चाहिये। ऋष्यशृङ्ग से यज्ञ कराने से तुम्हें पुत्र उत्पन्न होंगे। बाद में शान्ता के स्वयंवर के अवसर पर परशुराम आ पहुँचते हैं तथा ऋष्यशृङ्ग के साथ कन्या का विवाह कराने का आदेश देते हैं। इस पर एक वेश्या को भेजकर ऋष्यशृङ्ग को बुलाया जाता है और उनके साथ शान्ता का विवाह सम्पन्न किया जाता है। श्रीबुल्के के अनुसार दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार शान्ता दशरथ की पुत्री नहीं है, परन्तु द्व्यर्थकता से उदीच्य पाठों की यह धारणा बनी कि शान्ता दशरथ की पुत्री है। परन्तु उनके

अनुसार इसका कारण अन्यत्र ढूँढ़ना चाहिये और हरिवंशपुराण आदि के अनुसार अङ्गराज चित्ररथ के पुत्र ही दशरथ और लोमपाद दो नाम थे, अतः लोमपाद की पुत्री ही दशरथ-पुत्री है, किन्तु अयोध्यानरेश दशरथ की प्रधानता के कारण उस दशरथ को भूलकर लोग भ्रान्तिवश अयोध्यानरेश की पुत्री शान्ता को समझने लगे । अतः परवर्ती विष्णुपुराण आदि प्रायः सभी ग्रन्थों में भ्रान्ति से ही अयोध्यानरेश दशरथ की पुत्री शान्ता मानी जाने लगी । वस्तुतः यह श्रीबुल्के का महान् दुःसाहस ही है, क्योंकि इसमें उदीच्य, पश्चिमीय सभी पाठों तथा विष्णु- पुराण आदि सभी ग्रन्थों को भ्रान्तिमूलक मानना पड़ेगा, जो सर्वथा असंगत है। वाल्मीकिरामायण के उदीच्य तथा पश्चिमीय पाठ भी प्रामाणिक ही हैं। यह ठीक है कि दाक्षिणात्य पाठ में शान्ता दशरथ की पुत्री नहीं मानी गयी । यद्यपि गोविन्दराज अन्य पाठों और पुराणों के समन्वय की दृष्टि से शान्ता को दशरथ की औरसी पुत्री मानकर दाक्षिणात्य पाठ को तदनुगुण ही लगाते हैं, तथापि रामवर्मा के नाम से रामाभिरामीय टीका रचनेवाले उनके गुरु नागेश भट्ट ने तत्र तत्र लोमपाद की ही पुत्री शान्ता है यही कहा है। “संख्यं सम्बन्धकञ्चैव” ( वा रा० १।११।१८ ) की टीका में भी उन्होंने यही कहा है कि स्वमैत्रीसम्बन्ध जानकर ऋष्यशृङ्ग ने दशरथ का आदर किया । यह सम्बन्ध वैसा है जिससे ऋष्यशृङ्ग दशरथ के भी जामातृत्व व्यवहार के योग्य सिद्ध होते हैं। इसी अभिप्राय से पीछे ऋष्यशृङ्ग को जामाता कहा गया है। 'संख्यं स्वमैत्रीसम्बन्धकं यौनादिसम्बन्धः ऋषिपुत्राय रोमपादेनाख्यातं कथितं तदा तच्छ्रवणसमनन्तरकाले तं दशरथं प्रत्यपूजयत् ऋष्यशृङ्ग इति शेषः। तेन सह रोमपादेन सम्बन्धश्चायं तादृशो येन दशरथस्यापि जामातृत्वव्यवहारयोग्यः ऋष्यशृङ्गः, एतदेवाभिप्रेत्योक्तं प्राक् तव जामातेति' इतना ही नहीं रामाभिरामीय तिलक व्याख्या में पाठान्तर का भी स्मरण किया है— क्वचिच्चैवं पठ्यतेऽपि “अनेन मेऽनपत्याय दत्तेयं वरवर्णिनी । याचते पुत्रतुल्यैषा शान्ता प्रियतरात्मजा ।” अर्थात् इन्होंने मेरी प्रार्थना पर मुझ अनपत्य को यह पुत्रतुल्य सुन्दर रूपवाली प्रियतरा पुत्री प्रदान की थी । अतः तिलक या रामाभिरामीयकार को भी पाठान्तर ज्ञात है । वह पाठान्तर-भ्रान्तिकृत नहीं है, किन्तु सम्प्रदाय- भेदकृत है और वह सम्प्रदायभेद कल्पभेद को लेकर उत्पन्न हो जाता है । रामाभिरामीय टीका की दृष्टि से यद्यपि दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार शान्ता दशरथ की पुत्री नहीं है। वह लोमपाद की ही पुत्री है। दशरथ के वे मित्र थे, अतः ऋष्यशृङ्ग मित्र के जामाता होने के कारण दशरथ के भी जामाता कहे गये हैं । तथापि गोविन्दराज विष्णुपुराण तथा दाक्षिणात्य पाठ को भी उसके अनुगुण लगाते हैं। इस पक्ष में कोई दोष न होने से कल्पभेद मानने की कोई आवश्यकता नहीं रहती है। गौडीय आदि वाल्मीकिरामायणपाठ तथा विष्णुपुराण आदि भ्रान्तिमूलक नहीं हैं। विष्णुपुराण भी आर्ष ग्रन्थ है। श्रीबुल्के की धारणा के अनुसार वह ७वीं श० ई० का नहीं है। हरिवंश के अनुसार चित्ररथ के पुत्र लोमपाद का दशरथ नाम भी इसीलिए था कि वे दशरथ के अभिन्नहृदय मित्र थे। इसीलिए लोग उन्हें दशरथ ही समझते थे । अन्य वचनों के साथ एकवाक्यता करने पर दशरथ की शान्ता औरसी पुत्री थी और लोमपाद की दत्ता पुत्री थी। इस तरह हरिवंश की भी संगति लग जाती है। दाक्षिणात्य, गौडीय, उदीच्य, पश्चिमीय पाठों तथा विष्णुपुराण आदि की संगति लग जाती है। किसी को भी भ्रान्तिमूलक मानने की आवश्यकता नहीं रहती । इसके अनुसार मित्र के जमाता होने के कारण ऋष्यशृङ्ग दशरथ के भी जामाता कहे जा सकते हैं । वैसे ही दत्तक पुत्री होने पर भी शान्ता रोमपाद की दुहिता कही ही जा सकती है। इसी दृष्टि से हरिवंशपुराण (१।३१।४६) की तथा विष्णुपुराण और ब्रह्मपुराण की भी संगति लग जाती है। जिनमें कि शान्ता को लोमपाद की पुत्री और उनके द्वारा ऋष्यशृङ्ग को उसका प्रदान करना कहा गया है, क्योंकि दत्तक पुत्री होने से भी शान्ता लोमपाद की पत्नी ही

है। स्कन्दपुराण, आनन्दरामायण आदि भी आर्ष और प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। उनको आधुनिक मानना भी असङ्गत ही है। शान्ता भार्गवराजपुत्री कि कन्या है या कैकेयी की कन्या है या शत्रुघ्न की सहोदरी है यह अवान्तर प्रश्न है। सीता दशरथ की पुत्री है यह तो वर्णाश्रमविरोधी बौद्धों द्वारा अपनी भावनाओं का प्रदर्शनमात्र है। उनकी दृष्टि में भाई-बहन की शादी में भी कोई दोष नहीं होता। अहल्योद्धार २४४ वें अनुच्छेद में अहल्योद्धार के प्रसङ्ग पर श्रीबुल्के का कहना है कि शतपथब्राह्मण से लेकर वैदिक साहित्य के अनेक ग्रन्थों में इन्द्र और अहल्या की कथा का बीज मिलता है। उनमें इन्द्र को अहल्या का जार कहा गया है। वैदिक साहित्य के टीकाकारों ने अहल्या की कथा को रूपकमात्र माना है तथा उस रूपक की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। अहल्या भूमि, जिसमें हल नहीं चलाया जाता, तथा वर्षा के अधिष्ठाता देवता इन्द्र का सम्बन्ध स्वाभाविक ही प्रतीत होता है। परवर्ती साहित्य में अहल्या की कथा का पर्याप्त विकास हुआ तथा उसका सम्बन्ध राम से जोड़ा गया है। महाभारत में गौतम को अहल्या का पति माना गया है। वास्तव में वैदिक साहित्य में लिखा है कि इन्द्र अपने को गौतम कहलाते थे कौशिक ब्राह्मण गौतमब्रुवाणेति ( शत० ब्रा० ३।३।४।१८), जैमिनीयब्राह्मण (२।७९) तथा षड्विंशब्राह्मण (१।१।२४) में इसके विषय में निम्नोक्त कथा मिलती है। देवता तथा असुर युद्ध कर रहे थे। गौतम दोनों सेनाओं के बीच तपस्या कर रहे थे। इन्द्र ने उनके पास जाकर निवेदन किया कि वे देवताओं के गुप्तचर बन जायँ । गौतम ने उनका निवेदन अस्वीकार कर दिया, जिसपर इन्द्र ने गौतम का रूप धारण कर गुप्तचर बन जाने का प्रस्ताव रखा । गौतम ने इसे स्वीकार कर लिया। इस कथा के आधार पर इन्द्र के 'अहल्याजार' नाम को दृष्टि में रखकर यह माना जाने लगा होगा कि अहल्या के पति का नाम गौतम ही था। अहल्या की वंशावली के विषय में हरिवंशपुराण (१।३२।२८-३२) में माना गया है कि मुद्गल, मौद्गल, इन्द्रसेन तथा वध्यश्व में क्रमशः पिता-पुत्र का सम्बन्ध था । वध्यश्व तथा मेनका की दो सन्तानें थीं—दिवोदास तथा अहल्या । अहल्या ने गौतम की पत्नी बनकर शतानन्द को जन्म दिया था। अहल्या के पिता का नाम विष्णुपुराण (४।१९।६१) में बृहदश्व, मत्स्यपुराण (५०।६१) में विन्ध्याश्व तथा भागवत (९।२१।३४) में मुद्गल ही माना गया है। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड में पहलेपहल अहल्या की उत्पत्ति तथा गौतम-अहल्या के विवाह का वर्णन है। ब्रह्मा ने दूसरे प्राणियों के सर्वश्रेष्ठ अङ्गों को लेकर एक ऐसी स्त्री का निर्माण किया जिसमें हल (कुरूपता) का सर्वथा अभाव था। इन्द्र अहल्या की अभिलाषा करते थे, किन्तु ब्रह्मा ने उसे धरोहर के रूप में गौतम ऋषि के यहाँ रखा था। बहुत वर्षों के बाद गौतम ने उसे ब्रह्मा के पास लौटाया । ब्रह्मा ने तपस्वी गौतम की सिद्धि देखकर उन्हें अहल्या को पत्नीरूप में प्रदान किया। ब्रह्मपुराण (अ० ८७) में इस वृत्तान्त का विकसित रूप पाया जाता है। उसके अनुसार ब्रह्मा ने गौतम को अहल्या के पालन-पोषण का भार सौंपा था। अहल्या की यौवन-प्राप्ति पर समस्त देवता, मुनि, दानव, यक्ष तथा राक्षस उसे माँगने लगे; किन्तु इन्द्र ने विशेष आग्रह किया। यह देखकर ब्रह्मा ने कहा कि जो पृथ्वी की प्रदक्षिणा करके सर्वप्रथम मेरे पास आये, उसी को अहल्या दी जायगी । इसपर समस्त देवता पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने निकले, किन्तु गौतम ने अर्धप्रसूता सुरभि तथा शिवलिङ्ग की प्रदक्षिणा की और अहल्या को प्राप्त किया। आनन्दरामायण में इस कथा की ओर संकेत किया गया है— "ब्रह्मणा निर्मिताऽहल्या द्विमुखीगोः परिक्रमात् । दत्ता पुरा गौतमाय" ( आ० रा० १।३।१८ ) पउमचरियं ( पर्व १३) के अनुसार अहल्या ज्वलनसिंह तथा वेगवती की पुत्री है, जिसने अपने स्वयंवर के अवसर पर इन्द्र को ठुकरा कर नन्दिमाली ( अथवा आनन्दमालिवर) को चुन लिया था। बाद में नन्दिमाली को वैराग्य हुआ और उन्होंने दीक्षा ले ली। किसी दिन इन्द्र ने उस ध्यानस्थ नन्दिमाली को बाँधा था, जिसका परिणाम

३८४ रामायणमीमांसा त्रयोदश यह हुआ कि इन्द्र रावण से हार गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ में अहल्या को भूल से विश्वामित्र की पत्नी माना गया है। गौतमपत्नी अहल्या के साथ इन्द्र के दुराचर का वर्णन पहलेपहल महाभारत में मिलता है। जहाँ चिर- कारिता की प्रशंसा करते हुए गौतम के पुत्र चिरकारी का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। अपनी स्त्री के व्यभिचार से क्रुद्ध गौतम ने चिरकारी को अहल्या का वध करने का आदेश दिया तथा वन चले गये। अपने स्वभाव के अनुसार चिरकारी ने अपने पिता की इस आज्ञा पर बहुत समय तक विचार किया। इतने में गौतम वन में सोचने लगे कि मैंने अपनी निर्दोष पत्नी के वध का आदेश देकर अच्छा नहीं किया। इन्द्र ब्राह्मण के वेष में मेरे आश्रम में आये थे, मैंने उनका आतिथ्यसत्कार किया था। बाद में जो दुःखद घटना हुई उसमें मेरी स्त्री का कोई दोष नहीं था। "अत्र चानुशले जाते स्त्रिया नास्ति व्यतिक्रमः।" ( म० भा० १२।२५८।४६ ) । अतः वह घर लौटे तथा अपनी पत्नी को सकुशल पाकर अपने पुत्र की चिरकारिता की प्रशंसा करने लगे। महाभारत के कई स्थलों पर इन्द्र के प्रति गौतम के शाप का उल्लेख है, किन्तु अहल्या को महाभारत में सर्वत्र निर्दोष ही माना गया है। वाल्मीकिरामायण ( उत्तरकाण्ड सर्ग ३० ) के अनुसार भी अहल्या निर्दोष है किन्तु बालकाण्ड ( अध्याय ४८ ) में कहा गया है कि कुतूहल से प्रेरित होकर अहल्या ने इन्द्र को गौतम के वेष में पहचानते हुए भी उनका प्रस्ताव स्वीकार किया था। "मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन । मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात् ॥" ( वा० रा० १।४८।१९ ) परवर्ती कथाओं में इसपर बल दिया जाता है कि अहल्या ने इन्द्र को नहीं पहचाना था। ब्रह्मपुराण ( अध्याय ८७ ) के अनुसार गौतम अपनी पत्नी के साथ ब्रह्मगिरि पर तप करते थे। अहल्या के विवाह के पहले से इन्द्र उसपर आसक्त थे, अतः गौतम की अनुपस्थिति में इन्द्र गौतम का रूप धारण करके अहल्या के पास आया करते थे, किन्तु वह उन्हें गौतम समझती थी— "न बुबोध अहल्या तं जारं मेने तु गौतमम्" ।।४४।। किसी दिन संयोगवश आश्रम में दोनों ही गौतम दिखायी पड़े। आश्रमवासी यह आश्चर्य देखकर इसे तप का प्रभाव समझकर गौतम से कहने लगे— "भगवन् किमिदं चित्रं बहिरन्तश्च दृश्यसे । प्रिययाऽन्तः प्रविष्टोऽसि तथैव च बहिर्भवान् ।। अहो तपःप्रभावोऽयं नानारूपधरो भवान् ॥” (ब्र० पु० ८७।४८) यह सुनकर गौतम अपने घर गये तथा इन्द्र ने गौतम के आगमन पर बिडाल का रूप धारण कर लिया। वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार इन्द्र ने देवताओं के पास जाकर कहा था कि गौतम की तपस्या में विघ्न डालकर उनमें क्रोध उत्पन्न कर मैंने देवताओं का उपकार किया है ( वा० रा० १।४३।२ )। परवर्ती रचनाओं में इन्द्र के इस उद्देश्य को अधिक महत्व दिया गया है। असमिया बालकाण्ड ( अध्याय ३८ ) के अनुसार इन्द्र गौतम की घोर तपस्या देखकर डर गये थे। वह उस तपस्या में विघ्न डालने के विचार से उनके आश्रम में गये थे, किन्तु अहल्या को देखकर आसक्त हो गये । रङ्गनाथरामायण ( १।२९ ) के अनुसार गौतम की तपस्या में विघ्न डालने के उद्देश्य से इन्द्र ने अहल्या का सतीत्व नष्ट किया था। ब्रह्मवैवर्तपुराण ( कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४७ और ६१ ) दो स्थलों पर इन्द्र के दुराचार का वर्णन है। दोनों वृत्तान्तों में अहल्या को निर्दोष माना गया है। अध्याय ६१ के अनुसार इन्द्र कामशास्त्र में अपनी

पहुँच का उल्लेख करते हुए अहल्या को प्रलोभन देते हैं तथा शची को अहल्या की दासी बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं । अहल्या अविचलित रहकर घर आती है और गौतम को सब कुछ बतलाती है। बाद में इन्द्र गौतम का रूप धारण कर अहल्या के साथ रमण करते हैं। किन्तु सर्वज्ञ मुनि घर लौटकर उनको शाप देते हैं। कृत्तिवासरामायण ( १।५९ ) में इन्द्र को गौतम का प्रियतम शिष्य माना गया है; उन्होंने गौतम का वेष धारण कर अहल्या के साथ रमण किया । गौतम अहल्या के शरीर पर शृङ्गार के लक्षण देखकर इन्द्र का दुराचार जान गये । इन्द्र आश्रम में ही रहते थे । बुलाये जाने पर पुस्तकें काँख में दबाये गौतम के पास आये। रङ्गनाथरामायण ( १।२९ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( १।२५ ) के अनुसार इन्द्र ने मुर्गे का रूप धारण कर रात्रि में बांग दिया और गौतम को भ्रम में डाला कि पौ फटने पर है । अधिकांश रचनाओं के अनुसार गौतम अचानक घर पहुँच कर इन्द्र तथा अहल्या दोनों को शाप देते हैं । कुछ ही वृत्तान्तों में उनकी पुत्री भी उनकी कोपभाजन बन जाती है। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार गौतम शाप देकर आश्रम में निवास करते हैं, किन्तु बालकाण्ड के अनुसार उन्होंने अहल्या को छोड़कर हिमालय की ओर प्रस्थान किया । अध्यात्मरामायण ( १।५।३३ ) के अनुसार भी गौतम हिमालय जाते हैं। गौतम-शाप के कई रूप मिलते हैं। महाभारत के अनुसार इस शाप के कारण इन्द्र की दाढ़ी पीली पड़ गयी थी । "अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गौतमाद् हरिश्मश्रुतामिन्द्रः प्राप्तः" ( म० भा० १२।३२९।१४; ३४२।२३ ) । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार गौतम ने इन्द्र को पराजित होने का शाप दिया । फलस्वरूप इन्द्रजित् मेघनाद ने इन्द्र को हरा दिया था। इसके अतिरिक्त गौतम ने कहा था कि मनुष्यों के ऐसे पापों का आधा दोष इन्द्र का ही रहेगा और इन्द्र ( अथवा किसी भी भावी सुरेन्द्र ) का पद स्थिर नहीं हो पायेगा। ( वा० रा० ७।३०।३१-३६ ) । लिङ्गपुराण (अध्याय २९) में किसी शाप का उल्लेख नहीं है, किन्तु माना गया है कि गौतम ने इन्द्र का वृषण काटकर भूमि पर फेंक दिया था : "इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ छिन्नं तु वृषणं पुरा । ऋषिणा गौतमेनोर्व्यां क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥" २७॥ वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के वृत्तान्त में गौतम-शाप द्वारा इन्द्र को नपुंसक बना देते हैं । परवर्ती रचनाओं में बालकाण्ड के इस शाप का उल्लेख तो मिलता है, किन्तु गौतमशाप का सर्वाधिक रूप यह है कि इन्द्र के शरीर में सहस्र भग प्रकट हुए—ब्रह्मपुराण ( ८७।५९ ), स्कन्दपुराण ( नागरखण्ड अध्याय २०७ ), कथासरित्सागर ( ३।१७ ), पद्मपुराण ( ५।५१।२८ ), अध्यात्मरामायण ( १।५।२६ ) कम्बरामायण ( १।९ ), ब्रह्मवैवर्तपुराण ( कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४७ और ६१ ), आनन्दरामायण ( १।३।१९ ), बलरामदासरामायण, तत्त्वसंग्रहरामायण ( १।२५ ), तोरवेरामायण ( १।१२ ), कृत्तिवासरामायण ( १।५९ ) आदि । इन सब रचनाओं में प्रायः इसका उल्लेख मिलता है कि सहस्रभगवान् इन्द्र बाद में सहस्राक्ष बन गये । ब्रह्मपुराण के अनुसार गौतमी नदी में स्नान करने से इन्द्र में यह परिवर्तन हुआ । पद्मपुराण ( ५।५१।४८ ) के अनुसार देवी के वरदान से इन्द्र सहस्राक्ष हुए । माधवदेव के असमिया बालकाण्ड ( अध्याय ३८ ) के अनुसार इन्द्र भिक्षार्थी ब्राह्मणवेष से गौतम के आश्रम में गये थे । रास्ते में गौतम से भेंट होने पर इन्द्र काँपने लगे; गौतम को यह देखकर सन्देह हुआ और उन्होंने इन्द्र को पहचान कर नपुंसक और सहस्रभग हो जाने का शाप दिया। इन्द्र लज्जित होकर पद्मकोष में छिपे रहे । बृहस्पति ने दुर्गा से इन्द्र के छिपने का स्थान जानकर वहाँ जाकर उन्हें दुर्गापूजा करने का परामर्श दिया। इन्द्र की पूजा से सन्तुष्ट होकर दुर्गा ने कहा मैं शाप दूर करने में असमर्थ हूँ, किन्तु बदल सकती हूँ; इसपर दुर्गा ने इन्द्र को ४९

३८६ रामायणमीमांसा त्रयोदश सहस्रनयन बना दिया । घर पहुँच कर इन्द्र ने अश्वनीकुमारों को बुलाया और उन्होंने इन्द्र को अज का वृषण लगा दिया । इसी कारण अज पवित्र हो गया तथा पितृकार्य में उसका मांस उपयुक्त होता है । महाभारत के अनुसार अहल्या के प्रति कोई शाप नहीं दिया गया । किन्तु वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार गौतम ने अहल्या से कहा कि तुम्हारे सौन्दर्य के कारण यह अनर्थ हुआ है, अतः अब से तुम अकेली ही सुन्दरी नहीं होगी, अपितु सभी लोग तुम्हारे सौन्दर्य के भागी होंगे । "तस्माद्रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यति । रूपं च ते प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति न संशयः॥" (वा० रा० ७।३०।३७,३८) वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड (४८।२९,३०) के अनुसार गौतम अहल्या को आदेश देते हैं कि वह अदृश्य होकर राम के पहुँचने तक तपस्या करे । इसी आश्रम में बहुत वर्षों तक वातभक्ष निराहार होकर तप करती हुई भस्मशायिनी तथा सर्वभूतों से अदृश्य होकर रहेगी और यह भी उन्होंने कहा कि राम का आतिथ्य सत्कार करने के पश्चात् तुम पूर्ववत अपना रूप धारण कर मेरे पास आओगी । 'स्वं वपुर्धारयिष्यसि' (वा० रा० १।४८। ३२) । संभवतः इस वाक्यांश के कारण यह धारणा उत्पन्न हुई कि अहल्या शापवश शिला बन गयी थी । शाप का यह परिणाम पहले-पहल रघुवंश (११।३४) में पाया जाता है । आगे चलकर पाषाणभूता अहल्या का बहुत सी रचनाओं में उल्लेख मिलता है । नृसिंहपुराण (अध्याय ४७), स्कन्दपुराण (रेवाखण्ड अध्याय १३६, नागरखण्ड अध्याय २७८), कथासरित्सागर (३।१७), महानाटक (३।१७), वह्निपुराण (पृ० १८२), कम्बरामायण (१।९), रङ्गनाथरामायण (१।२९), सरलादासकृत महाभारत (मध्य पर्व पृ० २०३), कृत्तिवास रामायण (१।५९) ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अ० ४७ और ६१), गणेशपुराण, पद्मपुराण (उत्तरखण्ड अ० २६९ तथा पातालखण्ड अ० १६), आनन्दरामायण (१।३।२६), राघवोल्लास काव्य (सर्ग ६), तोरवेरामायण (१।१२), रामचरितमानस (१।२१०), गीतावली (१।५७), असमिया बालकाण्ड, सूरसागर (नवम स्कन्द पद ४६६), सत्योपाख्यान (१।५), मराठी भावार्थरामायण (१।१४), तत्त्वसंग्रहरामायण (१।२५), पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १० आदि । रामकियेन के अनुसार गौतम ने अहल्या को इसी उद्देश्य से पत्थर बनने का शाप दिया था कि रामावतार के समय वहाँ सेतु बनाने के काम में आये, इस प्रकार सदा के लिए सागर में दफनायी जाय (अ० ६) । गौतम-शाप का एक अन्य रूप कम प्रचलित है; उसके अनुसार अहल्या नदी बन गयी थी—ब्रह्मपुराण (८७।५९) में शाप इस प्रकार है—"शुष्कनदी भव" तथा आनन्दरामायण (१।३।२३) के अनुसार अहल्या जन- स्थान में नदी के रूप में प्रकट हुई । पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड ५।१३४) के अनुसार गौतम-शाप के कारण अहल्या का शरीर सूख गया था—"अस्थिचर्मसमाविष्टा निर्मांसा"योगवासिष्ठ के रचयिता ने पूर्वोक्त पौराणिक कथा के अनुसार एक अन्य अहल्या और इन्द्र को एक दूसरे के अनन्यप्रेमियों के रूप में चित्रित किया है—(दे० उत्पत्तिप्रकरण सर्ग ८९) । अहल्याकथा का एक अन्य रूप भी मिलता है । जिसमें अञ्जनी उसकी पुत्री मानी गयी है । इसका बीज कथासरित्सागर (३।१०) में है । गौतम ऋषि दिव्य ज्ञान से इन्द्र और अहल्या का दुराचार जानकर अकस्मात् घर पहुँचते हैं । इन्द्र ने मार्जार का रूप धारण कर लिया । गौतम के पूछने पर अहल्या ने प्राकृत में कहा एसो ठिओ खु मज्जारो (एष स्थितः खलु मार्जारः ) । इसके दोनों अर्थ हैं । यह मार्जार है अथवा मेरा जार है । यह सुनकर गौतम ने दोनों को शाप दिया; अहल्या को शिला बनने का और इन्द्र को सहस्रभग होने का । इस वृत्तान्त पर