रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाने जाते हैं। इस रचना में शान्ता भरत और शत्रुघ्न की सहोदरी है। माता का नाम बलियादारी है। सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार लक्ष्मण राम के सखा थे, भाई नहीं। राम स्वयं विष्णु के सेनापति के पुत्र हैं। एक अन्य विकृत वृत्तान्त के अनुसार राम परमेश्वरी के पुत्र माने जाते हैं। ज्ञातव्य है कि श्रीबुल्के भी उक्त वृत्तान्त को विकृत ही मानते हैं। इसी प्रकार कहा जाता है कि वाल्मीकिरामायण के पाठ-भेदों में भरत तथा लक्ष्मण में कौन ज्येष्ठ है इस संबन्ध में मतभेद है। दशरथजातक तथा वाल्मीकिरामायण के उदीच्य पाठ में भरत कनिष्ठ माने जाते हैं (वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ १।१९।१०। वा० रा० पश्चिमोत्तरीय पाठ १।१४।५) । लेकिन दाक्षिणात्य पाठ में लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न कनिष्ठ हैं। परन्तु दाक्षिणात्य पाठ में भी एक स्थल पर भरत कनिष्ठ प्रतीत होते हैं जैसे— “ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीञ्च परन्तपः । अथाभ्यवादयत्प्रीतो भरतो नाम चाब्रवीत् ॥” (वा० रा० ६।१२।७) अर्थात् राम से मिलने के बाद भरत ने लक्ष्मण और वैदेही से मिलकर भरत नाम लेकर अभिवादन किया। वस्तुतः उपर्युक्त श्लोक का अर्थ यह समझना चाहिये कि राम से मिलने के बाद परन्तप भरत ने लक्ष्मण से मिलकर अपना भरत नाम लेकर वैदेही का अभिवादन किया, अतएव भरतज्यैष्ठ्यनिर्णय ग्रन्थ द्वारा भरत का ही ज्येष्ठत्व निश्चित है (दे० मद्रास कैटलाग नं० ३४९२ सी) तथा प्रतिमानाटक में भरत को लक्ष्मण का अनुज कहा गया है। श्रीबुल्के के अनुसार भी प्राचीन काल में अधिकांश रामकथाओं में अग्निपुराण, कूर्मपुराण, रामायणमञ्जरी, रघुवंश आदि में भरत को ही ज्येष्ठ माना गया है। अतएव युद्ध के बाद लक्ष्मण ही भरत का अभिवादन करते हैं रघुवंश (१३।७३) । पाठभेद के आधार पर भरत के कनिष्ठ होने की कथा को कल्पान्तरीय मानना चाहिये। बहुत सी विदेशी कथाओं में दशरथ के केवल दो पुत्रों का उल्लेख है। तिब्बती रामायण में दशरथ की दो पत्नियों को एक-एक पुत्र हुआ था। खोतानी रामायण में भी राम और लक्ष्मण दो पुत्रों का ही उल्लेख है। किन्तु इस रचना में दोनों सहस्रबाहु के पुत्र तथा दशरथ के पौत्र माने जाते हैं। प्रधानता के कारण संभव है कि विदेशों में राम और लक्ष्मण की ही चर्चा पहुँची होगी, फिर भी प्रामाणिक रामायणों के अनुसार चार पुत्र और शान्ता कन्या की बात ही प्रामाणिक है। शान्ता दशरथ की औरसी तथा रोमपाद की दत्ता पुत्री अनु० ३४३ : वाल्मीकिरामायण के दक्षिणात्य पाठ में दशरथ तथा रोमपाद की घनिष्ठता का निर्देश है। “अङ्गराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति ।” (वा० रा० १।९।१३) “सख्यं सम्बन्धकञ्चैव तदा तं प्रत्यपूजयत् ।” (वा० रा० १।९।१८) यों शान्ता रोमपाद की पुत्री थी (वा० रा० १।९।१३ और १।११।१९)। यह भी स्पष्ट है कि शान्ता को रोमपाद ने ऋष्यशृङ्ग के लिए पत्नीरूप में प्रदान किया था। सुमन्त्र के परामर्शानुसार दशरथ रोमपाद के निकट जाकर निवेदन करते हैं कि ऋष्यशृङ्ग अयोध्या आकर अश्वमेध अनुष्ठान करें। तदनुसार ऋष्यशृङ्ग सपत्नीक दशरथ के साथ अयोध्या आते हैं। पुनश्च शान्ता अपने मायके वापस आयी इसका कोई संकेत नहीं मिलता¹ (वा० रा० १।११।३०) । दशरथ को अपत्य भी कहा गया है (वा० रा० १।११।५) । गौडीय पश्चिमोत्तरीय पाठों में शान्ता रोमपाद की पुत्री मानी जाती है। “शान्तां स्वकां दुहितरम्” (गौ० पा० वा० रा० १।८।२६; प० पा० १।८।२५ ।) “उवास तत्र सुखिता कञ्चित् कालं सहद्विजा ।” (वा० रा० १।११।३१) के अनुसार विदित होता है कि शान्ता अपने पति के साथ वहाँ कुछ ही काल रही थी। एतावता यज्ञसंपादन के अनन्तर वह अपने मायके गयी ही होगी।