भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 457

३८० रामायणमीमांसा त्रयोदश महाभारत में रोमपाद को 'सखा दशरथस्य' कहा है ( म०भा० ३।११०।१९ ) तथा इसका कई स्थलों पर उल्लेख है कि रोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता को ऋष्यशृङ्ग को प्रदान किया था । ( म० भा० ३।११०।५; १२।२२६।३५; १३।१३७।२५ ) । हरिवंश ( १।३१।४६ ), मत्स्यपुराण ( ४८।९९, ९९।१०३ ) तथा ब्रह्मपुराण ( १३।४० ) । इन सब में शान्ता को रोमपाद की पुत्री कहा गया है । फिर भी यह असंभव नहीं है कि दाक्षिणात्य पाठ के कुछ द्वयर्थक स्थलों के कारण शान्ता दशरथ की पुत्री मानी जाने लगी हो । सुमन्त्र दशरथ से कहते हैं, “ऋष्यशृङ्गस्तु जामाता पुत्रांस्तव विधास्यति” ( वा० रा० १।९।१९ ) । यहाँ पर सन्दर्भ के कारण ऋष्यशृङ्ग को रोमपाद का ही जामाता समझना चाहिये, किन्तु व्याकरण की दृष्टि से वह दशरथ के भी जामाता हो सकते हैं । इसी कारण टीकाकार गोविन्दराज लिखते हैं— “जामाता रोमपादस्य दशरथस्यापि दशरथस्यौरसी शान्ता दत्ता रोमपादस्य ।” १. यह कहना चिन्त्य है। १।११।३० श्लोकार्थ पर दृष्टि देने से संकेत स्पष्टतः प्रतीत होता है— विशालाक्षी शान्ता को पति के साथ आयी हुई देखकर राजा दशरथ का सारा अन्तःपुर शान्ताविषयक प्रेम से अत्यन्त आनन्दित हुआ । रामाभिरामीय टीका में नागेशजी लिखते हैं—बहुकालविश्लेषोत्तरं मिलितत्वाच्चा- नन्दाभिरन्तःपुरस्य । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि नागेशजी को भी शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री है यह इष्ट था । रोमपाद की वह दत्ता पुत्री थी । वस्तुतः शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री तथा रोमपाद की दत्ता पुत्री थी । यहाँ व्याकरण की कोई बात नहीं है, अतएव महावैयाकरण नागेश अपनी रामाभिरामीया टीका में यही समाधान करते हैं कि अङ्गराज रोमपाद दशरथ के मित्र हैं, अतः मित्र के जामाता होने से दशरथ के भी जामाता हैं । “मित्रजामाता स्वस्यापि जामातेवेत्यतो जामातेत्युक्तिः ।” इसी तरह “इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः । नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रवः ॥” ( वा० रा० १।११।२ ) तथा अङ्गराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति । कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति ।” ( वा० रा० १।११।३ ) यहाँ 'अस्य' शब्द स्पष्टरूप से रोमपाद से सम्बन्ध रखता है भले किसी संस्करण में तस्य पाठ भी मिलता हो तथापि मूल व्यापक पाठ 'अस्य' ही है । नागेश ने 'अस्य' का 'अङ्गराजस्य' अर्थ किया है । “अङ्गोराजोऽनपत्यस्तु लोमपादो भविष्यति । स राजानं दशरथं प्रार्थयिष्यति भूमिपः ॥ अनपत्याय मे कन्यां सखे दातुं त्वमर्हसि । शान्तां शान्तेन मनसा पुत्रार्थं वरवर्णिनीम् ॥” ( गो० पा० वा० रा० १।१०।४) ; प० पा० वा० रा० १।९।४,५ ) । उदीच्य पाठों के उसी सर्ग में लोमपाद ऋष्यशृङ्ग के पास जाकर दशरथ के विषय में कहते हैं— “अनेन मेऽनपत्याय दत्तेयं वरणिनी । याचते पुत्रकृत्यार्थं शान्ता प्रियतमात्मजा ॥”