रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ | रामायणमीमांसा | त्रयोदश नाम मन्दूदारी था। दशरथ तथा मन्दूदारी विवाहोत्सव में वलियारी नामक एक उपपत्नी टूटनेवाली पालकी को सँभालती है। इसपर दशरथ उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर उसके भावी पुत्र को राज्य देने की प्रतिज्ञा करते हैं। जावा के सेरतकाण्ड में दशरथ बाँस के समूह में वलियादारू नामक एक अप्सरा को देखकर उसके साथ विवाह करते हैं तथा बाद में उसी स्थान पर वांदोदरी को भी प्राप्त करते हैं। वांदोदरी अपना नाम देवीरागो में बदल देती है। पाश्चात्यवृत्तान्त नं ११ में भी दशरथ की केवल दो रानियों का वर्णन है। भुइंआ माधवदास के उड़िया विचित्र रामायण में २१ पटरानियों की चर्चा है, जिनमें तीन श्रेष्ठ कही गयी हैं। वाल्मीकि के अनुसार राम ने वनवास के समय ३५० माताओं से बिदा ली थी— त्रयः शतशतार्धा हि ददर्शवेक्ष्य मातरः। ताश्चापि तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मजः ॥ धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलिः। संवासात् परुषं किञ्चिदज्ञानादपि यत्कृतम् ॥ तन्मे समुपजानीत सर्वाश्चामन्त्रयामि वः। (वा० रा० २।३९।३६-३८) पउमचरियं (२८।७१) में दशरथ की ५०० उत्तम स्त्रियों का उल्लेख है। आनन्दरामायण में दशरथ की तीन महिषियों के अतिरिक्त ७०० रानियों का उल्लेख है। कृत्तिवास एवं सारलादास के महाभारत के अनुसार दशरथ की ७५० रानियाँ थीं। असमीया बालकाण्ड के अनुसार ७०० तथा दशरथजातक के अनुसार १६००० दशरथ की स्त्रियाँ थीं। बिहोर जाति की रामकथा में दशरथ की रानियों की संख्या ७ तथा जावा के सेरतकाण्ड में दो महिषियों के अतिरिक्त ६ अन्य पत्नियाँ दशरथ की थीं। कहना न होगा कि दशरथ के चरित्र के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा रघुवंश महाकाव्य की कथाएँ ही प्रामाणिक एवं मूल हैं। अन्य लोगों ने उन्हीं के आधार पर विविध कल्पनाएँ की हैं। या अनेक स्रोतों से उन तक पहुंचते-पहुंचते उनमें अनेक विकृतियां जुड़ गयी हैं। रघुवंश का प्रत्येक राजा राजर्षि जितेन्द्रिय, सदाचारी तथा वैदिकधर्म का परम पोषक तथा विशुद्ध अधिकारी होता था। अतः दशरथ भी महान् धर्मात्मा थे। महर्षि वसिष्ठ के नेतृत्व में धर्मनियन्त्रित जीवन व्यतीत करते थे, अतः उनके उपपत्नी आदि की कल्पना सर्वथा निराधार एवं विकृतिमात्र है। वाल्मीकिरामायण तथा आनन्दरामायण का मतभेद तो कल्पभेद से समाहित कर लेना ही उचित है। समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से अनूभूत वाल्मीकिरामायण रामकथा में निष्भ्रान्त प्रमाण है। व्यास आदि महर्षियों की उक्तियाँ भी श्रद्धेय है। परन्तु अन्यथा कथन तो सुनी सुनायी बातों के आधार पर ही निर्भर है। दशरथ की सन्तति वाल्मीकि के अनुसार राजा दशरथ के राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चार पुत्र और उदीच्य पाठ के अनुसार एक शान्ता पुत्री थी। लक्ष्मण और शत्रुघ्न यमल थे। पउमचरियं में भी भरत और शत्रुघ्न यमल माने गये हैं (२५।१४)। संघदास के वसुदेवहिण्डि, गुणभद्र के उत्तरपुराण, संथाली रामकथा तथा मराठी भावार्थरामायण में भरत और शत्रुघ्न सहोदर भाई माने गये हैं। जावा के सेरतकाण्ड में दशरथ की दो पत्नियों के दो-दो पुत्र हुए। ज्येष्ठा के राम और भरत तथा कनिष्ठा के लक्ष्मण और शत्रुघ्न । हिकायत महाराज रावण में राम और लक्ष्मण कनिष्ठा के पुत्र माने गये हैं एवं भरत तथा शत्रुघ्न ज्येष्ठा के पुत्र । सेरीराम में राम तथा लक्ष्मण मन्दूदारी के पुत्र