भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कृत्तिवास (१।२६) के अनुसार सिंहल के राजा सुमित्र ने अपनी पुत्री सुमित्रा के विवाह का निमन्त्रण दशरथ को भेजा। दशरथ ने कौशल्या तथा कैकेयी से मृगया का बहाना कर वहाँ जाकर उससे विवाह किया। विवाह की द्वितीय रात्रि को दशरथ ने नवविवाहिता पत्नी को लेकर अयोध्या को प्रस्थान किया। बंगाल में उस रात्रि को अशुभ मानकर कालरात्रि कहते हैं। वह अशुभ रात्रि दशरथ ने सुमित्रा के साथ बितायी, इसी कारण सुमित्रा दशरथ से उपेक्षित हुई। सुमित्रा को देखकर कौशल्या और कैकेयी को आशङ्का हुई। वे सोचने लगीं कि यह हमसे अधिक सुन्दरी है। दशरथ हमारी उपेक्षा करेंगे। अतः दोनों ने पार्वती तथा शङ्कर की उपासना की और उनसे वर माँगा कि सुमित्रा अभागिनी हो। बाद में सुमित्रा को प्रमाद हुआ; जिससे सब पत्नियों से सुन्दर होने पर भी दशरथ उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे तथा कैकेयी का अधिक आदर करने लगे। असमिया रामायण बालकाण्ड (अध्याय ११) के अनुसार सिंहल देश के राजा सुमित्र की पुत्री सुमित्रा थी। श्रीबुल्के की दृष्टि में कृत्तिवास की उक्त बात मौलिक है, परन्तु भारतीय प्राचीन विद्वानों की दृष्टि से मौलिक (निर्मूल) वस्तु प्रामाणिक नहीं होती है। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण तथा अध्यात्मरामायण आदि की दृष्टि से दशरथ की साढ़े तीन सौ रानियों में कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीन पट्टमहिषियाँ थीं। तीनों का अश्वमेध यज्ञ में भी विशेषोल्लेख है। दिव्य चरु के वितरण में भी सुमित्रा का ध्यान रखा गया है। दशरथ ने ही कौशल्या तथा कैकेयी दोनों के द्वारा सुमित्रा को दो भाग दिलाये जिसके परिणामस्वरूप सुमित्रा को लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो पुत्र हुए थे। कौशल्या और कैकेयी ज्येष्ठ थीं। उनकी अपेक्षा सुमित्रा कनिष्ठ थी। इस दृष्टि से उनका प्राधान्य होना भी युक्त ही है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार सुमित्रा स्वयं कौशल्या का अत्यधिक सम्मान करती थीं। वे ब्रह्मविदुषी थीं। अयोध्याकाण्ड में उन्होंने अपने तत्त्वज्ञान से कौशल्या को आश्वस्त किया था। उनके विचार में राम सूर्य के सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के प्रभु, श्री के श्री, कीर्त्ति के कीर्त्ति तथा क्षमा के भी क्षमा थे। जैसे श्रोत्र, मन आदि में शब्दादि-ग्रहण सामर्थ्यवाले श्रोत्रादि में वह सामर्थ्य आत्मा से प्राप्त होती है अतः वह श्रोत्रादि का श्रोत्रादि है— सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यः अग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्तेः कीर्त्तिः क्षमा-क्षमा ॥ (वा० रा० २।४४।१५) रामचरितमानस के अनुसार सुमित्रा के विचार से वही युवती पुत्रवती है जिसका पुत्र भगवद्भक्त होता है— “पुत्रवती युवती जग सोई, रघुवर भक्त जासु सुत होई।” (रा० मा० २।७४।१) वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण को उपदेश करती हुई कहती है कि तुम राम को दशरथ समझो, जानकी को मुझे समझो और वन को अवध समझकर जाओ राम की सेवा करो— “रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् । अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम् ॥” (वा० रा० २।४०।९) अतः सुमित्रा को अभागिनी बतलानेवाली कथा ही अभागिनी है। ३४० वाँ अनु० : जैन और बौद्धों के अनुसार अपराजिता (कौशल्या), सुमित्रा, कैकेयी तथा सुप्रभा दशरथ की चार रानियाँ थीं। अन्तिम शत्रुघ्न की माता थी। पद्मपुराण के (पाताल ख० अध्याय ११५) में चार पट्टरानियों के नाम मिलते हैं। उसके अनुसार भरत की माता सुरूपा है एवं शत्रुघ्न की माता सुवेषा है। दशरथजातक एवं तिब्बती तथा खेतानी रामायणों के अनुसार दशरथ की दो ही पटरानियाँ थीं। हिन्देशिया की रामायणों में भी दशरथ के दो ही विवाहों का उल्लेख है। सेरीराम तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार दशरथ ने अपनी नयी राजधानी का निर्माण करते समय बाँसों के समूह में सिंहासन पर बैठी हुई एक सुन्दर स्त्री को देखा जिसका ४८