भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३८६ रामायणमीमांसा त्रयोदश सहस्रनयन बना दिया । घर पहुँच कर इन्द्र ने अश्वनीकुमारों को बुलाया और उन्होंने इन्द्र को अज का वृषण लगा दिया । इसी कारण अज पवित्र हो गया तथा पितृकार्य में उसका मांस उपयुक्त होता है । महाभारत के अनुसार अहल्या के प्रति कोई शाप नहीं दिया गया । किन्तु वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार गौतम ने अहल्या से कहा कि तुम्हारे सौन्दर्य के कारण यह अनर्थ हुआ है, अतः अब से तुम अकेली ही सुन्दरी नहीं होगी, अपितु सभी लोग तुम्हारे सौन्दर्य के भागी होंगे । "तस्माद्रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यति । रूपं च ते प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति न संशयः॥" (वा० रा० ७।३०।३७,३८) वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड (४८।२९,३०) के अनुसार गौतम अहल्या को आदेश देते हैं कि वह अदृश्य होकर राम के पहुँचने तक तपस्या करे । इसी आश्रम में बहुत वर्षों तक वातभक्ष निराहार होकर तप करती हुई भस्मशायिनी तथा सर्वभूतों से अदृश्य होकर रहेगी और यह भी उन्होंने कहा कि राम का आतिथ्य सत्कार करने के पश्चात् तुम पूर्ववत अपना रूप धारण कर मेरे पास आओगी । 'स्वं वपुर्धारयिष्यसि' (वा० रा० १।४८। ३२) । संभवतः इस वाक्यांश के कारण यह धारणा उत्पन्न हुई कि अहल्या शापवश शिला बन गयी थी । शाप का यह परिणाम पहले-पहल रघुवंश (११।३४) में पाया जाता है । आगे चलकर पाषाणभूता अहल्या का बहुत सी रचनाओं में उल्लेख मिलता है । नृसिंहपुराण (अध्याय ४७), स्कन्दपुराण (रेवाखण्ड अध्याय १३६, नागरखण्ड अध्याय २७८), कथासरित्सागर (३।१७), महानाटक (३।१७), वह्निपुराण (पृ० १८२), कम्बरामायण (१।९), रङ्गनाथरामायण (१।२९), सरलादासकृत महाभारत (मध्य पर्व पृ० २०३), कृत्तिवास रामायण (१।५९) ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अ० ४७ और ६१), गणेशपुराण, पद्मपुराण (उत्तरखण्ड अ० २६९ तथा पातालखण्ड अ० १६), आनन्दरामायण (१।३।२६), राघवोल्लास काव्य (सर्ग ६), तोरवेरामायण (१।१२), रामचरितमानस (१।२१०), गीतावली (१।५७), असमिया बालकाण्ड, सूरसागर (नवम स्कन्द पद ४६६), सत्योपाख्यान (१।५), मराठी भावार्थरामायण (१।१४), तत्त्वसंग्रहरामायण (१।२५), पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १० आदि । रामकियेन के अनुसार गौतम ने अहल्या को इसी उद्देश्य से पत्थर बनने का शाप दिया था कि रामावतार के समय वहाँ सेतु बनाने के काम में आये, इस प्रकार सदा के लिए सागर में दफनायी जाय (अ० ६) । गौतम-शाप का एक अन्य रूप कम प्रचलित है; उसके अनुसार अहल्या नदी बन गयी थी—ब्रह्मपुराण (८७।५९) में शाप इस प्रकार है—"शुष्कनदी भव" तथा आनन्दरामायण (१।३।२३) के अनुसार अहल्या जन- स्थान में नदी के रूप में प्रकट हुई । पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड ५।१३४) के अनुसार गौतम-शाप के कारण अहल्या का शरीर सूख गया था—"अस्थिचर्मसमाविष्टा निर्मांसा"योगवासिष्ठ के रचयिता ने पूर्वोक्त पौराणिक कथा के अनुसार एक अन्य अहल्या और इन्द्र को एक दूसरे के अनन्यप्रेमियों के रूप में चित्रित किया है—(दे० उत्पत्तिप्रकरण सर्ग ८९) । अहल्याकथा का एक अन्य रूप भी मिलता है । जिसमें अञ्जनी उसकी पुत्री मानी गयी है । इसका बीज कथासरित्सागर (३।१०) में है । गौतम ऋषि दिव्य ज्ञान से इन्द्र और अहल्या का दुराचार जानकर अकस्मात् घर पहुँचते हैं । इन्द्र ने मार्जार का रूप धारण कर लिया । गौतम के पूछने पर अहल्या ने प्राकृत में कहा एसो ठिओ खु मज्जारो (एष स्थितः खलु मार्जारः ) । इसके दोनों अर्थ हैं । यह मार्जार है अथवा मेरा जार है । यह सुनकर गौतम ने दोनों को शाप दिया; अहल्या को शिला बनने का और इन्द्र को सहस्रभग होने का । इस वृत्तान्त पर