रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ३८७ आधारित अञ्जनी के विषय में पञ्जाब में निम्नोक्त कथा प्रचलित है कि—गौतम ने गङ्गास्नान से लौटकर अञ्जनी से पूछा कि घर में कौन है अञ्जनी ने उत्तर दिया कि माजार ( मार्जार अथवा माँ का जार )। धृष्टर्यता के कारण गौतम ने अपनी पुत्री को गर्भिणी हो जाने का शाप दिया, फलस्वरूप उसने हनुमान् को जन्म दिया। मैकॉलिफ, दि० सिक्ख रिलीजन ( भाग ६ पृ० ५२ )। इस कथा के विकसित रूप में गौतम-पत्नी अहल्या की तीन सन्तानें थीं। अञ्जनी और वाली तथा सुग्रीव, जिन्हें गौतम अपनी सन्तान समझते थे। किन्तु वास्तव में इन्द्र और सूर्य के पुत्र थे। महाभारत में अहल्या की कथा के प्रसंग में इसका उल्लेख नहीं है। श्रीराम के द्वारा अहल्योद्धार का प्राचीनतमरूप वाल्मीकिरामायण में सुरक्षित है। उत्तरकाण्ड में गौतम ने अहल्या को आश्वासन दिया था कि विष्णु-अवतार में राम के दर्शनमात्र से वह पवित्र हो जायगी— “तं द्रक्ष्यसि यदा भद्रे तदा पूता भविष्यसि ॥” (वा० रा० ७।३०।४३ ) पर बालकाण्ड के वृत्तान्त में राम के विष्णुत्व की ओर निर्देश नहीं किया गया है। गौतम ने अहल्या से कहा कि तपस्या करो तथा राम के आने पर उनका आतिथ्य-सत्कार करने के बाद मेरे पास लौटो। राम के आगमन तक वह शाप के कारण अदृश्य होकर तपस्या करती है। विश्वामित्र से यह कथा सुनकर राम तथा लक्ष्मण आश्रम में प्रवेश करते हैं। उसी समय शाप की अवधि समाप्त होती है। अतः वे अहल्या को देखने में समर्थ होते हैं और ऋषि- पत्नी का पैर छूते हैं— “शापस्यान्तमुपागम्य तेषां दर्शनमागता। राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ॥” ( वा० रा० १।४९।१७ ) राम-लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार करने के पश्चात् अहल्या अपने पति के पास लौट जाती है। अधिकांश परवर्ती रचनाओं के अनुसार वह वास्तव में शिला बन गयी थी और राम उसे अपने चरणस्पर्श से पुनर्जीवन प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ महानाटक ( ३।१७ ), आनन्दरामायण ( १।३।२० ), ब्रह्मवैवर्तपुराण ( कृष्णजन्मखण्ड अ० ४७ और ६१ ) आदि। कृत्तिवासरामायण के अनुसार राम ने अहल्या के मस्तक पर ही पैर रखकर उसे पाषाण से प्रकट किया था। स्कन्दपुराण में राम ने हाथ से शिला का स्पर्श कर अहल्या का उद्धार किया और उसे विभिन्न तीर्थों की यात्रा का आदेश दिया। अहल्या ने वैसा किया और अनेक तीर्थों में जाकर शिव- लिङ्ग की स्थापना की ( स्क० पु० नागरखण्ड अ० २०८ )। नदीरूप अहल्या का उद्धार दो प्रकार से वर्णित है। ब्रह्मपुराण मे राम का उल्लेख नहीं है। गौतमी नदी से मिलने पर अहल्या ने अपना पूर्व रूप धारण किया था— “तया तु सङ्गता देव्या (गौतम्या ) अहल्या गौतमप्रिया । पुनस्तद्रूपमभवत्” ( ब्र० पु० ८७।६६ ) । आनन्दरामायण के अनुसार राम ने मिथिला जाते समय पाषाणभूता अहल्या का उद्धार किया था। किन्तु उसी रचना में कल्पभेद का भी उल्लेख है जिसके अनुसार राम ने वनवास के समय नदीरूपा अहल्या का स्पर्श करके उसको शाप से मुक्त किया था— “रामेण भ्रमतारण्ये स्वाङ्घ्रिस्पर्शात् समुद्धृता । नदीरूपाऽहल्या” ( १।३।२१ ) ।