रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरामभक्ति से अनुप्राणित रचनाओं में उक्त वृत्तान्त का वातावरण नितान्त बदल गया । अध्यात्मरामायण के रचयिता पाषाणभूता अहल्या की कथा से अनभिज्ञ नहीं हैं (१।६।३) । फिर भी वे मानते हैं कि अहल्या शिला पर खड़ी होकर तपस्या करती रही— "तिष्ठ दुर्वृत्ते शिलायामाश्रमे मम" (अ० रा० १।५।२७) । राम ने उस आश्रम शिला को अपने चरण से स्पर्श किया और अपना विष्णुरूप दिखाया । अहल्या ने राम की विधिवत् पूजा की । अनन्तर एक विस्तृत स्तुति में राम के ब्रह्मस्वरूप का निरूपण किया और भक्ति का वरदान माँगा (अ० रा० १।५) । इस स्तुति को राघवोल्लास काव्य (सर्ग ७) में तथा रामचरितमानस में भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है । इस तरह अहल्योद्धार की प्रसिद्ध पौराणिक कथा ब्राह्मणग्रन्थों के अहल्याजार इन्द्र से आरम्भ होकर अनेक रूप धारण करके पश्चात् अहल्यातारक राम की भक्ति में पर्यवसित हो जाती है । अधिकांश रचनाओं में राम ने मिथिला की यात्रा में अहल्योद्धार किया था । फिर भी अनेक राम-कथाओं में राम के वनवास के समय इस घटना का वर्णन किया गया है । महानाटक में अगस्त्याश्रम से चले जाने के उपरान्त राम अहल्या का उद्धार करते हैं (अङ्क ३) । रामलिङ्गामृत में राम सीता की खोज करते समय अहल्या को शापमुक्त करते हैं । आनन्दरामायण में भी वनवास के समय इसका वर्णन है । रामायण मसीही के अरण्यकाण्ड में राम द्वारा पाषाणभूता अहल्या के उद्धार की कथा मिलती है । काश्मीरी रामायण में अरण्यकाण्ड के प्रारम्भ में राम सीता से अहल्या का परिचय कराते हैं । नाटककारों ने राम-कथा को बदलने में संकोच नहीं किया । जानकीपरिणय में अहल्योद्धार की कथा इस प्रकार हैं : सीता-स्वयंवर के पूर्व राक्षसों द्वारा निर्मित एक माया-सीता के प्राणों को संकट में देखकर राम आत्म- हत्या करने के उद्देश्य से एक चट्टान पर से कूदना चाहते हैं लेकिन राम-स्पर्श से प्रकट होकर अहल्या राम को राक्षसी माया का रहस्य बतलाती है । श्रीबुल्के की दृष्टि में रामकथा कभी सूक्ष्मरूपेण विद्यमान रही होगी । परन्तु उसका क्रमशः विकास, परिवर्तन और परिवर्धन होता रहा है । अतः वर्तमान रामकथा केवल काल्पनिक वस्तु है । उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है । नाटककार निःसंकोच रामकथा में परिवर्तन और परिवर्धन करते रहे हैं । राम विष्णु या परब्रह्म थे, राम विष्णु के अवतार थे, यह सब कल्पनामात्र है । भक्तों ने ही विविध कल्पनाओं से रामकथाओं का उपबृंहण किया है । उनकी दृष्टि में यही स्थिति अहल्या के सम्बन्ध में है, किन्तु श्रीबुल्के का उक्त विचार वास्तविकता के स्पर्श से विहीन तथा भ्रमात्मक है । वस्तुतः रूपककल्पना कभी किसी आधार पर ही होती है । सति कुड्ये चित्रोल्लेखः' भित्ति होने पर ही उसपर चित्र-कल्पना हो सकती है । शतपथ आदि ब्राह्मणग्रन्थों तथा ऋग्वेद आदि संहिताओं के मन्त्रों में इन्द्र की स्तुतियों में अहल्या का उल्लेख है । वस्तुतः बुल्के मैकडॉनल, कीथ, वैदिक इंडेक्स — अहल्या तथा धीरेन्द्र वर्मा अहल्योद्धार की कथा का विकास, विचारधारा (पृ० २९।३४) आदि के आधार पर अपनी कल्पनाओं के महल तैयार करते हैं । जो कि स्वतः प्रमाणसापेक्ष हैं । आपने कई जगह इन्द्र को अहल्या यार कहा है, परन्तु वह अशुद्ध है । वस्तुतः वेदमन्त्रों में इन्द्र को अहल्या-जार ही कहा गया है । यार नहीं, जार का अर्थ उपपति होता है । अतएव इन्द्र को अहल्या का उपपति कहा गया है । यार शब्द संस्कृत भाषा का न होकर हिन्दी या उर्दू भाषा का ही शब्द है । अर्थ उसका भी उपपति होता है । यद्यपि जार शब्द निन्दापरक हो सकता है, तथापि महामहिम देवता के सम्बन्ध में वही स्तुतिवाचक हो जाता है । तभी तो कृष्ण को 'चोरजार-शिखामणि' कहकर स्तुति की गयी है । ईश्वर, सर्वान्तरात्मा, सर्वेश्वर, सर्व- पति तथा सब प्राणियों का पर प्रेमास्पद हैं । जैसे कामिनी को जार परम प्रिय होता है वैसे ही भगवान् सर्वप्रिय हैं, अतः 'सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद' होते हैं । अविद्या तथा तत्कार्य कोषपञ्चक के जलानेवाला परमात्मा 'जरयति इति जारः' इस व्युत्पत्ति से जार कहा जाता है । कौषीतकि उपनिषद् में इन्द्र-प्रतर्दन की आख्यायिका निर्दिष्ट है । उसमें प्रतर्दन