रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्द्र पर विजयार्थ आक्रमण करते हैं, जिससे इन्द्र उनके साहस पर प्रसन्न होकर उन्हें वर प्रदान करते हैं । प्रतर्दन कहते हैं कि जिसे मनुष्यों के लिए आप हिततम समझते हैं वह वरप्रदान करें, तब इन्द्र कहते हैं 'मामेव विजानीहि, तुम मुझको ही जानो, और इसके साथ अपने बहुत से कर्मों का उल्लेख करते हैं। मैंने त्रिशीर्ष त्वाष्ट्र का वध किया और बहुत से अरुन्मुख यतियों को जिनके मुख में वेदान्तवाक्यरूपी रुत (शब्द) नहीं थे, उन अरुन्मुख यतियों को मारकर कुत्तों को खिला दिया, फिर भी मेरा बाल भी टेढ़ा नहीं हुआ । "त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनम् अरुन्मुखान् यतीन् हत्वा शालावृकेभ्यः प्रायच्छम्......तस्य मे तत्र लोम च न मीयते ।" (कौषी० उ० ३।१) । यहाँ शङ्का की जा सकती है कि क्या यहाँ इन्द्र अपने देवतास्वरूप या जीव स्वरूप की अथवा मुख्य प्राण की उपासना का विधान करते हैं या प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्रह्मस्वरूप की उपासना का विधान करते हैं। पूर्वपक्ष का निराकरण करके सिद्धान्त की दृष्टि से कहा गया है कि यहाँ मुख्यप्राण जीव या देवता की उपासना का विधान नहीं है, किन्तु 'तत्त्वमस्यादि' शास्त्रदृष्टि से सिद्ध प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म की ही उपासना या विज्ञान का विधान है। "शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्" (ब्र० सू० १।१।३०) अर्थात् इन्द्र ने अपने जीव या देवता रूप का उपदेश नहीं किया, किन्तु शास्त्रसिद्ध जीव का जो ब्रह्मरूप है उसी को जानने का निर्देश किया है। शास्त्र-दृष्टि से अखण्ड अनन्त आनन्द तथा बोध ही आत्मा का रूप है। उसमें अविद्या या अन्तः करणरूप उपाधि से जीवभाव का आरोप होता है। शास्त्र-दृष्टि से जीव का ब्रह्म ही रूप है, अतः इन्द्र के 'मामेव विजानीहि' (कौषी० उ० ३।१) इस वाक्य का अर्थ यह है कि मुझे अर्थात् 'अस्मद्' शब्द के लक्ष्यार्थभूत शुद्ध परमात्मा को ही जानो । कहा जा सकता है कि यदि ऐसा ही है तो अपने शरीर द्वारा किये गये कर्मों का कीर्तन करके आत्मप्रशंसा का उससे क्या सम्बन्ध है ? त्रिशीर्ष त्वाष्ट्र का हनन आदि कार्य तो ब्रह्म के नहीं हैं; फिर उन कर्मों का ब्रह्म-प्रसङ्ग में निरूपण का क्या अर्थ है ? इसका समाधान यह है कि वह सब ब्रह्म-ज्ञान की प्रशंसा है। उस ब्रह्मज्ञान के ही माहात्म्य से उक्त जघन्य दुष्कृत्य करने पर भी मेरा बाल भी बाँका नहीं हुआ, यह सब ब्रह्मज्ञान की महिमा है। किसी कर्म से ज्ञानवान् की महिमा न तो बढ़ती है और न किसी भी कर्म से उसकी महिमा घटती है । "न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्" । किसी कर्म से उसका लोक (स्वरूपभूत फल) नष्ट नहीं होता। "नास्य केनचन कर्मणा लोको मीयते" (कौषी० उ० ३।१) । गीता भी कहती है कि जिसमें अहङ्कार का भाव नहीं होता, जिसकी बुद्धि में कर्म का लेप नहीं होता वह इन सब लोकों का हनन करके भी हनन नहीं करता है और न निबद्ध होता है— "यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबद्ध्यते ॥" (गी० १८।१७) इसी दृष्टि से जारत्व (औपपत्य) यद्यपि निन्द्य है तथापि ब्रह्मज्ञान के लोकोत्तर माहात्म्य से इन्द्र उस कर्म से भी दूषित नहीं होते हैं। प्रत्युत स्तुत होते हैं। स्तुतिपक्ष में श्रुति का अर्थ यों लगाया जाता है कि इन्द्र सूर्य है अहल्या रात्रि है 'अहनि लीयते— इत्यहल्या' दिन में जो लीन रहती है वह अहल्या है अर्थात् रात्रि । सूर्य के द्वारा यही अहल्या का घर्षण है अथवा अहल्या कृषि की अधिष्ठात्री देवी है और इन्द्र वर्षा के अधिष्ठाता देव हैं। उनका सम्बन्ध स्वाभाविक है । मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदों की पुराण-इतिहासों द्वारा व्याख्या की जाती है । व्याख्या का अर्थ परिवर्तन और परिवर्धन नहीं है जैसा कि बुल्के आदि मान बैठे हैं। किन्तु वास्तविक अर्थ को व्यक्त करना ही है। इन्द्र को अहल्या का जार कहा गया है। परन्तु इन्द्र कब कैसे अहल्या-जार हुए । इसका वास्तविक अर्थ क्या है ? इसका स्पष्टीकरण पुराणों तथा इतिहासों द्वारा ही होता है। इसी लिए कहा गया है—