रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 467, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० रामायणमीमांसा त्रयोदश “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्” । अर्थात् इतिहास और पुराणों के द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण करना चाहिये । इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि अल्पश्रुत से वेद को भय होता है कि अल्पश्रुत, अल्पज्ञ होने के कारण, वेद के अर्थ का अनर्थ करके उसपर प्रहार ही करेगा— “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” इस तरह वेदों में इन्द्र को अहल्या का जार कहा गया है । उसका ऐतिहासिक, आध्यात्मिक तथा आधि- भौतिक दृष्टि से पुराणों द्वारा अर्थ अभिव्यक्त किया गया है । राम से अहल्या का सम्बन्ध जोड़ा नहीं गया जैसा कि बुल्के साहब मान बैठे हैं । किन्तु ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर सिद्ध सम्बन्ध की ही वाल्मीकिरामायण तथा पुराणेतिहासों द्वारा अभिव्यक्ति की गयी है । महाभारत में भी वस्तुस्थिति के अनुसार ही गौतम को अहल्या का पति माना गया है । इसी तरह कौशिक ब्राह्मण गौतमब्रुवाणेति, शतपथब्राह्मण, जैमिनीयब्राह्मण तथा षड्विंशब्राह्मण का यह अर्थ नहीं है कि इन्द्र अपने को गौतम कहलाते थे, क्योंकि इसका अर्थ यही है कि वे वास्तविक गौतम न होने पर भी नकली गौतम बनकर अपने को गौतम कहलाते थे । जो वास्तविक ब्राह्मण न होकर व्रात्य ब्राह्मण है वही ब्राह्मणब्रुव या ब्राह्मणब्रुवाण कहलाता है । सिद्धान्त में जो ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पन्न और उपनयनपूर्वक वेदाध्ययन, तप, विद्या आदि से युक्त होता है, वही मुख्य ब्राह्मण होता है । किन्तु जो—तादृशी विद्या एवं तप से रहित होता है वह वास्तविक ब्राह्मण न होकर जातिब्राह्मण या ब्राह्मणब्रुवाणमात्र होता है— “तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणकारणम् । तपःश्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ॥” ( महाभाष्य २।२।६ तथा ५।१।११५ ) अर्थात् विद्या, तप और योनि तीनों से ब्राह्मण्य होता है । जो विद्या और तप से हीन है वह जातिब्राह्मण ही होता है, मुख्य ब्राह्मण नहीं । अतः गौतमब्रुवाण से भी यह नहीं सिद्ध होता है कि गौतम अहल्या के पति नहीं थे । बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है कि ऋग्वेद ( १।१०।११ ) के समय से कौशिक इन्द्र का नाम रहा है । अतः षड्विंशब्राह्मण का वाक्यांश “कौशिको हि स्मैनां ब्राह्मण उपन्यैति” ( १।१।२२ ) का अर्थ यह नहीं है कि इन्द्र कौशिक का रूप धारण करके अहल्या से मिलने जाया करते थे । इस अर्थ के आधार पर सायण मानते हैं कि अहल्या के पति का नाम कौशिक था, क्योंकि बुल्के वेदार्थ-निर्धारण की पद्धति से अपरिचित हैं । “औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः” ( जै० सू० १।१।५ ) के अनुसार वैदिक शब्दों एवं उनके अर्थों का औत्पत्तिक ( स्वाभाविक या नित्य ) सम्बन्ध होता है, अतः ऋग्वेद के समय इन्द्र का कोशिक नाम रहा है, यह कथन सर्वथा असत्य है । वेदों के शब्दों के मुख्य और गौण दोनों प्रकार के अर्थ होते हैं और दोनों ही अर्थ नित्य हैं । अतएव इन्द्र शब्द का मुख्य अर्थ मघवा होते हुए भी ‘ऐन्द्रचा गार्हपत्यमुपतिष्ठते’ इस श्रुति के अनुसार ‘कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे’ अर्थात् हे इन्द्र तुम कभी भी घातक मत बनो, आहुति देनेवाले यजमान को सदा तृप्त करते रहो, इस श्रुति के अनुसार इन्द्र पद का गौण अर्थ गार्हपत्य अग्नि ही है । इसी प्रकार गौतम और कौशिक दोनों ही शब्द इन्द्र में प्रयुक्त होते हैं, परन्तु पूर्वापर के प्रबङ्गानुसार दोनों ही इन्द्र के मुख्य नाम नहीं हैं । किन्तु जैसे ब्राह्मणब्रुव में भी ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त होता है, वैसे ही गौतमब्रुव एवं कोशिकब्रुव में भी गौतम और कौशिक शब्द प्रयुक्त होते हैं और यह सब विकासवादियों के समान अमुक अमुक काल में नहीं, किन्तु सर्वदा ही । इसी लिए आज और प्राचीन काल तथा न्त काल तक जब भी वैदिक यज्ञ, यागादि चलते रहेंगे, तब तक इन्द्र के लिए ‘अहल्याजार’ शब्द का प्रयोग