भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

अध्याय बालकाण्ड ३९१ होता रहेगा । अतः सायण का ही अर्थ उचित है । कौशिक ब्राह्मण बनकर अहल्या के पास इन्द्र जाता था । यही उक्त वाक्य का अर्थ है । यदि कौशिक इन्द्र का ही नाम हो तो उसमें ब्राह्मण इस विशेषण की क्या गति होगी ? षड्विंशब्राह्मण की कथा के अनुसार देवासुरसंग्राम में इन्द्र का गौतम-रूप धारण कर गुप्तचर बन जाने के प्रस्ताव का गौतम द्वारा स्वीकार करना भी मूलमन्त्रसूचित अर्थ के विरुद्ध नहीं है । प्रत्युत इससे इन्द्र वास्तविक गौतम नहीं थे, किन्तु वे काल्पनिकरूप बनाये हुए गौतम थे । अतएव गौतमब्रुवाण ही थे । वही स्थिति कौशिकशब्द के सम्बन्ध में भी जाननी चाहिये । इसी लिए इन्द्र के स्वाभाविक नामों में ये दोनों नाम नहीं आये या आते हैं । श्रव्य तथा दृश्य काव्य, नाट्य आदि में चमत्कृतिविशेष लाने की दृष्टि से किन्हीं अंशों में नवीन कल्पना को भी प्रश्रय दिया जाता है । पर उसके द्वारा आर्ष विज्ञान से दृष्ट वाल्मीकिरामायण द्वारा वर्णित ऐतिहासिक तथ्य अपने स्थान पर अडिग ही रहते हैं । अतः सीता-स्वयंवर के पूर्व राक्षसों द्वारा मायानिर्मित सीता के प्राणों को संकट में देखकर प्राणत्याग की दृष्टि से राम चट्टान पर से कूदना चहते हैं । इस बीच उनके चरण-स्पर्श से चट्टान से प्रकट होकर अहल्या राक्षसी माया का रहस्य बताती है । जानकीपरिणय के इस वर्णन को वाल्मीकिरामायण-कथा के विरुद्ध नहीं समझना चाहिये । पद्मपुराण के अनुसार भी शुष्करूपा प्रतिमा के रूप में अहल्या को देखकर राम वसिष्ठ से उसके सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं और वसिष्ठ के द्वारा निर्दोष घोषित होकर वह दिव्य रूप धारण कर गौतम के पास जाती है । पूर्वापर के समन्वय से यही समझना चाहिये कि राम के स्पर्श से ही वह निर्दोष घोषित होती है । ब्रह्मपुराण के अनुसार अहल्या नदीरूप हो गयी थी और वह गौतमी नदी से संगत होकर पुनः गौतमपत्नी अहल्या हो गयी । आनन्दरामायण का यह कहना ठीक ही है कि नदी होने की कथा कल्पान्तरीय है। आनन्दरामायण के अनुसार भी नदीरूपा अहल्या का उद्धार भी वन में भ्रमण करते हुए राम ने अपने पादस्पर्श से किया था । ब्रह्मपुराण की कथा में राम का सम्बन्ध वर्णित न होने पर भी दूसरी कथाओं से समन्वय करने से आनन्दरामायण के साथ समन्वय कर राम का सम्बन्ध भी अवश्य जोड़ लेना चाहिये । ब्रह्मपुराण का तात्पर्य भी गौतमी-माहात्म्य के वर्णन में ही है । अहल्या के उद्धार में वचनबलात् गौतमी-सङ्गति को भी हेतु जान लेना चाहिये । श्री बुल्के का यह कहना निःसार है कि अध्यात्मरामायण का रचयिता पाषाणभूता अहल्या की कथा से परिचित होकर भी मानता है कि वह शिला पर खड़ी होकर तपस्या करती रही — “तिष्ठ दुर्वृत्ते शिलायामाश्रमे मम” । राम ने आश्रम-शिला का स्पर्श किया, क्योंकि उक्त संस्कृत पद्य का यह अर्थ नहीं है कि तुम शिला पर खड़ी रहो, किन्तु शिला के रूप में स्थित होकर रहो यही उसका अर्थ है । शाप के कारण अहल्या का अदृश रहने का अर्थ यही समझना चाहिये कि वह अपने अहल्या-रूप से तब तक अदृश्य थी जब तक राम नहीं आये । किन्तु अन्य कथाओं के अनुसार वह शिलारूप में दृश्य ही थी । अतएव शिला होने की अवस्था में उसे राम का चरण-स्पर्श प्राप्त हुआ । शाप का अन्त होने पर वह अपने अहल्यारूप में प्रकट हुई । उस समय राम और लक्ष्मण दोनों ने उसका पादस्पर्श किया । “शापस्यान्तमुपागम्य तेषां दर्शनमागता । राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ॥” (वा० रा० १।४९।१६,१७) शाप के अन्त में पहुँचकर अहल्या राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र के दृष्टिगोचर हुई, तब राम और लक्ष्मण दोनों ने उसका पाद-स्पर्श किया, इस तरह अदृश्यता और शिलारूपता दोनों का समन्वय हो जाता है ।