रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहुँच का उल्लेख करते हुए अहल्या को प्रलोभन देते हैं तथा शची को अहल्या की दासी बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं । अहल्या अविचलित रहकर घर आती है और गौतम को सब कुछ बतलाती है। बाद में इन्द्र गौतम का रूप धारण कर अहल्या के साथ रमण करते हैं। किन्तु सर्वज्ञ मुनि घर लौटकर उनको शाप देते हैं। कृत्तिवासरामायण ( १।५९ ) में इन्द्र को गौतम का प्रियतम शिष्य माना गया है; उन्होंने गौतम का वेष धारण कर अहल्या के साथ रमण किया । गौतम अहल्या के शरीर पर शृङ्गार के लक्षण देखकर इन्द्र का दुराचार जान गये । इन्द्र आश्रम में ही रहते थे । बुलाये जाने पर पुस्तकें काँख में दबाये गौतम के पास आये। रङ्गनाथरामायण ( १।२९ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( १।२५ ) के अनुसार इन्द्र ने मुर्गे का रूप धारण कर रात्रि में बांग दिया और गौतम को भ्रम में डाला कि पौ फटने पर है । अधिकांश रचनाओं के अनुसार गौतम अचानक घर पहुँच कर इन्द्र तथा अहल्या दोनों को शाप देते हैं । कुछ ही वृत्तान्तों में उनकी पुत्री भी उनकी कोपभाजन बन जाती है। वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार गौतम शाप देकर आश्रम में निवास करते हैं, किन्तु बालकाण्ड के अनुसार उन्होंने अहल्या को छोड़कर हिमालय की ओर प्रस्थान किया । अध्यात्मरामायण ( १।५।३३ ) के अनुसार भी गौतम हिमालय जाते हैं। गौतम-शाप के कई रूप मिलते हैं। महाभारत के अनुसार इस शाप के कारण इन्द्र की दाढ़ी पीली पड़ गयी थी । "अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गौतमाद् हरिश्मश्रुतामिन्द्रः प्राप्तः" ( म० भा० १२।३२९।१४; ३४२।२३ ) । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार गौतम ने इन्द्र को पराजित होने का शाप दिया । फलस्वरूप इन्द्रजित् मेघनाद ने इन्द्र को हरा दिया था। इसके अतिरिक्त गौतम ने कहा था कि मनुष्यों के ऐसे पापों का आधा दोष इन्द्र का ही रहेगा और इन्द्र ( अथवा किसी भी भावी सुरेन्द्र ) का पद स्थिर नहीं हो पायेगा। ( वा० रा० ७।३०।३१-३६ ) । लिङ्गपुराण (अध्याय २९) में किसी शाप का उल्लेख नहीं है, किन्तु माना गया है कि गौतम ने इन्द्र का वृषण काटकर भूमि पर फेंक दिया था : "इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ छिन्नं तु वृषणं पुरा । ऋषिणा गौतमेनोर्व्यां क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥" २७॥ वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के वृत्तान्त में गौतम-शाप द्वारा इन्द्र को नपुंसक बना देते हैं । परवर्ती रचनाओं में बालकाण्ड के इस शाप का उल्लेख तो मिलता है, किन्तु गौतमशाप का सर्वाधिक रूप यह है कि इन्द्र के शरीर में सहस्र भग प्रकट हुए—ब्रह्मपुराण ( ८७।५९ ), स्कन्दपुराण ( नागरखण्ड अध्याय २०७ ), कथासरित्सागर ( ३।१७ ), पद्मपुराण ( ५।५१।२८ ), अध्यात्मरामायण ( १।५।२६ ) कम्बरामायण ( १।९ ), ब्रह्मवैवर्तपुराण ( कृष्णजन्मखण्ड अध्याय ४७ और ६१ ), आनन्दरामायण ( १।३।१९ ), बलरामदासरामायण, तत्त्वसंग्रहरामायण ( १।२५ ), तोरवेरामायण ( १।१२ ), कृत्तिवासरामायण ( १।५९ ) आदि । इन सब रचनाओं में प्रायः इसका उल्लेख मिलता है कि सहस्रभगवान् इन्द्र बाद में सहस्राक्ष बन गये । ब्रह्मपुराण के अनुसार गौतमी नदी में स्नान करने से इन्द्र में यह परिवर्तन हुआ । पद्मपुराण ( ५।५१।४८ ) के अनुसार देवी के वरदान से इन्द्र सहस्राक्ष हुए । माधवदेव के असमिया बालकाण्ड ( अध्याय ३८ ) के अनुसार इन्द्र भिक्षार्थी ब्राह्मणवेष से गौतम के आश्रम में गये थे । रास्ते में गौतम से भेंट होने पर इन्द्र काँपने लगे; गौतम को यह देखकर सन्देह हुआ और उन्होंने इन्द्र को पहचान कर नपुंसक और सहस्रभग हो जाने का शाप दिया। इन्द्र लज्जित होकर पद्मकोष में छिपे रहे । बृहस्पति ने दुर्गा से इन्द्र के छिपने का स्थान जानकर वहाँ जाकर उन्हें दुर्गापूजा करने का परामर्श दिया। इन्द्र की पूजा से सन्तुष्ट होकर दुर्गा ने कहा मैं शाप दूर करने में असमर्थ हूँ, किन्तु बदल सकती हूँ; इसपर दुर्गा ने इन्द्र को ४९