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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 459

अनुसार इसका कारण अन्यत्र ढूँढ़ना चाहिये और हरिवंशपुराण आदि के अनुसार अङ्गराज चित्ररथ के पुत्र ही दशरथ और लोमपाद दो नाम थे, अतः लोमपाद की पुत्री ही दशरथ-पुत्री है, किन्तु अयोध्यानरेश दशरथ की प्रधानता के कारण उस दशरथ को भूलकर लोग भ्रान्तिवश अयोध्यानरेश की पुत्री शान्ता को समझने लगे । अतः परवर्ती विष्णुपुराण आदि प्रायः सभी ग्रन्थों में भ्रान्ति से ही अयोध्यानरेश दशरथ की पुत्री शान्ता मानी जाने लगी । वस्तुतः यह श्रीबुल्के का महान् दुःसाहस ही है, क्योंकि इसमें उदीच्य, पश्चिमीय सभी पाठों तथा विष्णु- पुराण आदि सभी ग्रन्थों को भ्रान्तिमूलक मानना पड़ेगा, जो सर्वथा असंगत है। वाल्मीकिरामायण के उदीच्य तथा पश्चिमीय पाठ भी प्रामाणिक ही हैं। यह ठीक है कि दाक्षिणात्य पाठ में शान्ता दशरथ की पुत्री नहीं मानी गयी । यद्यपि गोविन्दराज अन्य पाठों और पुराणों के समन्वय की दृष्टि से शान्ता को दशरथ की औरसी पुत्री मानकर दाक्षिणात्य पाठ को तदनुगुण ही लगाते हैं, तथापि रामवर्मा के नाम से रामाभिरामीय टीका रचनेवाले उनके गुरु नागेश भट्ट ने तत्र तत्र लोमपाद की ही पुत्री शान्ता है यही कहा है। “संख्यं सम्बन्धकञ्चैव” ( वा रा० १।११।१८ ) की टीका में भी उन्होंने यही कहा है कि स्वमैत्रीसम्बन्ध जानकर ऋष्यशृङ्ग ने दशरथ का आदर किया । यह सम्बन्ध वैसा है जिससे ऋष्यशृङ्ग दशरथ के भी जामातृत्व व्यवहार के योग्य सिद्ध होते हैं। इसी अभिप्राय से पीछे ऋष्यशृङ्ग को जामाता कहा गया है। 'संख्यं स्वमैत्रीसम्बन्धकं यौनादिसम्बन्धः ऋषिपुत्राय रोमपादेनाख्यातं कथितं तदा तच्छ्रवणसमनन्तरकाले तं दशरथं प्रत्यपूजयत् ऋष्यशृङ्ग इति शेषः। तेन सह रोमपादेन सम्बन्धश्चायं तादृशो येन दशरथस्यापि जामातृत्वव्यवहारयोग्यः ऋष्यशृङ्गः, एतदेवाभिप्रेत्योक्तं प्राक् तव जामातेति' इतना ही नहीं रामाभिरामीय तिलक व्याख्या में पाठान्तर का भी स्मरण किया है— क्वचिच्चैवं पठ्यतेऽपि “अनेन मेऽनपत्याय दत्तेयं वरवर्णिनी । याचते पुत्रतुल्यैषा शान्ता प्रियतरात्मजा ।” अर्थात् इन्होंने मेरी प्रार्थना पर मुझ अनपत्य को यह पुत्रतुल्य सुन्दर रूपवाली प्रियतरा पुत्री प्रदान की थी । अतः तिलक या रामाभिरामीयकार को भी पाठान्तर ज्ञात है । वह पाठान्तर-भ्रान्तिकृत नहीं है, किन्तु सम्प्रदाय- भेदकृत है और वह सम्प्रदायभेद कल्पभेद को लेकर उत्पन्न हो जाता है । रामाभिरामीय टीका की दृष्टि से यद्यपि दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार शान्ता दशरथ की पुत्री नहीं है। वह लोमपाद की ही पुत्री है। दशरथ के वे मित्र थे, अतः ऋष्यशृङ्ग मित्र के जामाता होने के कारण दशरथ के भी जामाता कहे गये हैं । तथापि गोविन्दराज विष्णुपुराण तथा दाक्षिणात्य पाठ को भी उसके अनुगुण लगाते हैं। इस पक्ष में कोई दोष न होने से कल्पभेद मानने की कोई आवश्यकता नहीं रहती है। गौडीय आदि वाल्मीकिरामायणपाठ तथा विष्णुपुराण आदि भ्रान्तिमूलक नहीं हैं। विष्णुपुराण भी आर्ष ग्रन्थ है। श्रीबुल्के की धारणा के अनुसार वह ७वीं श० ई० का नहीं है। हरिवंश के अनुसार चित्ररथ के पुत्र लोमपाद का दशरथ नाम भी इसीलिए था कि वे दशरथ के अभिन्नहृदय मित्र थे। इसीलिए लोग उन्हें दशरथ ही समझते थे । अन्य वचनों के साथ एकवाक्यता करने पर दशरथ की शान्ता औरसी पुत्री थी और लोमपाद की दत्ता पुत्री थी। इस तरह हरिवंश की भी संगति लग जाती है। दाक्षिणात्य, गौडीय, उदीच्य, पश्चिमीय पाठों तथा विष्णुपुराण आदि की संगति लग जाती है। किसी को भी भ्रान्तिमूलक मानने की आवश्यकता नहीं रहती । इसके अनुसार मित्र के जमाता होने के कारण ऋष्यशृङ्ग दशरथ के भी जामाता कहे जा सकते हैं । वैसे ही दत्तक पुत्री होने पर भी शान्ता रोमपाद की दुहिता कही ही जा सकती है। इसी दृष्टि से हरिवंशपुराण (१।३१।४६) की तथा विष्णुपुराण और ब्रह्मपुराण की भी संगति लग जाती है। जिनमें कि शान्ता को लोमपाद की पुत्री और उनके द्वारा ऋष्यशृङ्ग को उसका प्रदान करना कहा गया है, क्योंकि दत्तक पुत्री होने से भी शान्ता लोमपाद की पत्नी ही