रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश अध्याय बालकाण्ड रामकथा के १४ वें अध्याय ३३१ वें अनुच्छेद में श्रीबुल्के ने रामकथा के विकास का वर्णन किया है। उसमें उन्होंने बालकाण्ड के अधिकांश भाग को पीछे का विकास अर्थात् प्रक्षेप माना है। विशेषतः देवताओं द्वारा विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना तथा पायस प्राप्त कर दशरथ का उसे अपनी पत्नियों में बाँटना (सर्ग १५ और १६), देवताओं द्वारा अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों की उत्पत्ति का वर्णन (सर्ग १७), सिद्धाश्रम वामन की कथा (सर्ग २९), सगरपुत्रों का पाताल में भस्म होना (सर्ग ४०), समुद्रमन्थन (सर्ग ४५), विश्वामित्र के वंश की कथा (सर्ग ३२-३४) जनक द्वारा धनुष तथा सीता के अलौकिक जन्म की कथा तथा उनकी सीता-विवाह- विषयक प्रतिज्ञा (सर्ग ६६, ६७), उनकी दृष्टि में ये सब विकास ही हैं। परशुरामकथा (सर्ग ५१-६५), उनकी दृष्टि में प्रक्षेप ही है। दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय तीनों पाठों की विभिन्नता के आधार पर वे बहुत सी कथाओं को प्रक्षेप कहते हैं। परन्तु स्वयं भी वे निर्णय नहीं कर पाते हैं कि वस्तुतः कौन पाठ ठीक ओर सही है। अतएव वे इस पाठभेद का दुरुपयोग करते हुए बहुत से अंशों को प्रक्षेप सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं। इतना ही नहीं जो राम के परब्रह्म तथा विष्णु के अवतार होने की बात तीनों ही पाठों में मिलती है उसे भी प्रक्षेप कहने में उन्हें हिचक नहीं होती है। यह पीछे कहा जा चुका है कि जैसे वेदों में विभिन्न शाखाओं में पुरुषसूक्त भिन्न-भिन्न हैं। उनमें पर्याप्त पाठभेद है, परन्तु वे सभी प्रामाणिक हैं। जिस प्रकार उनको प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता उसी प्रकार प्रकृत में दाक्षिणात्य पाठ, गौडीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ तीनों ही पाठ ठीक हैं। शतकोटि-प्रविस्तर रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपने विभिन्न शिष्यों में कुछ विभिन्न पाठभेदों और कथाभेदों का उपदेश किया हो तो असम्भव नहीं है। आधुनिक विद्वान् भी अपनी विभिन्न रचनाओं में कुछ परिवर्तन, संशोधन और परिष्कार करते ही हैं। इसी तरह दुर्गासप्तशती में जिसके कोटि-कोटि पाठ होते रहते हैं, दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा मैथिली पाठों में भेद हैं और वे सभी प्रामाणिक माने जाते हैं। जब तीनों पाठों में प्राप्त होनेवाली अवतार-सामग्री को श्रीबुल्के प्रक्षेप मानते हैं तो पाठभेद का नाम लेकर उसी अंश को प्रक्षेप कहने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। ३३३ वें अनुच्छेद में उन्होंने सम्पूर्ण बालकाण्ड को प्रक्षेप बना दिया है। उक्त प्रसङ्ग में दिये गये उनके कारणों का पूर्व में पूर्णरूप से निराकरण कर दिया गया है। महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पुरुषों के चरित्र का वर्णन करते समय उनके जन्म, बाल्यकाल, विवाह आदि का वर्णन किया ही जाता है। फलतः वाल्मीकि द्वारा भी बालकाण्ड में उनके जन्मादि का वर्णन किया जाना उचित ही था। इस सम्बन्ध में वे अनुमान करते हैं कि वाल्मीकिकृत रचना में अयोध्या, दशरथ और उनके पुत्रों के परिचय के बाद अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का वर्णन प्रारम्भ हुआ होगा। इस अनुमान में वे महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश तथा विष्णुपुराण का सहारा लेते हैं। जिनमें वनवास से लेकर रावणवध तक की ही घटनाएँ वर्णित हैं। परन्तु वे उन ग्रन्थों को भी सर्वांश में प्रमाण मानने को प्रस्तुत नहीं होते, अन्यथा उन्हीं ग्रन्थों में श्रीराम को स्पष्टरूप से विष्णु का अवतार कहा गया है, पर उसे वे नहीं मानते हैं। वस्तुतः महाभारत और विष्णुपुराण आदि की रामकथा का मुख्य स्रोत वाल्मीकिरामायण को ही मानते हैं, अतः उसी का संक्षिप्त वर्णन करते हैं। संक्षिप्त करने में कुछ अंशों का छूट जाना स्वाभाविक ही है। परन्तु यदि राम के सम्पूर्ण वृत्तान्त के मूल ग्रन्थ में भी सम्पूर्ण वृत्तान्तों