रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७४ रामायणमीमांसा त्रयोदश का वर्णन न किया जाय तो ऐसी स्थिति में उनकी जानकारी का कोई साधन ही नहीं रहेगा । उनके अन्य सभी तर्कों का खण्डन पीछे किया जा चुका है । दशरथवंशावली दशरथ की वंशावली के सम्बन्ध में ३३६ वें अनुच्छेद में श्रीबुल्के कहते हैं कि पौराणिक साहित्य और वाल्मीकिरामायण में प्रधान अन्तर यह है कि पौराणिक साहित्य में इक्ष्वाकु से राम तक ६३ राजाओं के नाम दिये गये हैं, किन्तु रामायण में उनकी संख्या केवल ३६ है । रामायण के ३६ नामों में केवल १८ ही नाम दोनों वंशावलियों में विद्यमान हैं । सम्भव है कि रामायण में केवल उन राजाओं के नामों का उल्लेख हो जिनका राज्याभिषेक हुआ हो । रामसाहित्य की दो अत्यन्त महत्वपूर्ण रचनाओं में वंशावली के विषय में एकरूपता नहीं है । वाल्मीकिरामायण की सूची के अनुसार २३ वाँ नाम दिलीप का है, ३६ वाँ रघु का, ३८ वाँ अज का तथा ३९ वाँ दशरथ का है (दे० बालकाण्ड सर्ग ७०) । कालिदास के रघुवंश तथा हरिवंशपुराण (१।१५।२५-२६) के अनुसार दिलीप, रघु, अज और दशरथ में क्रमशः पिता और पुत्र का सम्बन्ध है । धीरायकृष्णदास के अनुसार इसका समन्वय यह है कि इस वंश में दिलीप तथा रघु नाम के दो-दो राजा हुए हैं। द्वितीय दिलीप का नाम खट्वाङ्ग तथा द्वितीय रघु का नाम दीर्घबाहु था । परन्तु वस्तुस्थिति इससे भी पृथक् ही है, क्योंकि युगों की कल्पव्यवस्था के अनुसार पुराणों तथा रामायण की कोई भी सूची सम्पूर्ण राजाओं की सूची नहीं मानी जा सकती है । भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार ब्रह्मसंवत् सबसे प्राचीन काल-गणना है जो ब्रह्मा की उत्पत्ति से आरम्भ होकर ब्रह्मा की समाप्ति पर समाप्त होती है । २४००००० मानव वर्ष ब्रह्मा का एक पल होता है । इसी तरह घटी, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा वर्ष के अनुसार ब्रह्मा की द्विपरार्ध आयु होती है । एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, महापद्म, शङ्कु, समुद्र, अल्पपरार्ध, द्विपरार्ध सङ्ख्या होती हैं । ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं । ब्रह्मा का एक दिन चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्षों का होता है । उसमें सन्धि सहित १४ मन्वन्तर होते हैं । उनमें से ६ मन्वन्तर बीत चुके हैं । एक मन्वन्तर में ७१ महायुग (चतुर्युग) होते हैं । उनमें से २७ महायुग बीत चुके हैं । २८ वें महायुग के सत्य, त्रेता और द्वापर बीत कर २८ वां कलियुग बीत रहा है । युधिष्ठिर संवत्सर ३०४४, विक्रमी २०२७-२८ या ईसवीय १९७१-७२ में ५०७२ वर्ष कलि के बीत गये; ४२६९२६ वर्ष अवशिष्ट हैं । युगों का—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि का—दिव्य मान क्रम से ४०००, ३०००, २००० और १००० वर्ष का है । परन्तु मानव वर्ष के अनुसार कृतयुग का मान १७२८०००, त्रेता का १२९६०००, द्वापर का ८६४००० और कलि का ४३२००० वर्ष है । ऐसी स्थिति में यदि पौराणिक सूर्यवंशी ६३ राजाओं का सौ सौ वर्ष का भी राज्य-काल माना जाय तो भी दशरथ तक ६३ सौ ही वर्ष व्यतीत होते हैं । अतः यह मानना होगा कि सूर्यवंश के प्रधान प्रधान राजाओं के नामों की ही रामायण और पुराणों में सूचियाँ हैं । साथ ही उनकी आयु भी सामान्य मनुष्यों की आयु से विशिष्ट मानना उचित है, जैसे श्रीराम ने ११ हजार वर्ष तक राज्य किया था, उनके पूर्वजों ने उनसे भी अधिक काल तक राज्य किया है । नारायण, ब्रह्मा, मरीचि, कश्यप, सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि क्रम से दशरथ ६३वें ठहरते हैं । राम ६४वें ठहरते हैं । रामायण में और भी प्रधान प्रधानों का ही सङ्कलन कर संख्या घटायी गयी है । प्रतिमानाटक, अग्नि- पुराण, लिङ्गपुराण, ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, भविष्यपुराण आदि की संख्याओं का समन्वय इसी आधार पर किया जा सकता है ।