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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पाषाण-चित्रों, रामायण, महाभारत और हरिवंश की कथाओं से विदित होता है कि वहाँ अति प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति फैली थी और रामकथा का व्यापक प्रचार था। ३२४ अनु० : ख्मेर-साहित्य की सब से कलात्मक रचना रामकेर्ति है जिसका रचयिता तथा रचना-काल अज्ञात है। (रामकेर्ति का उच्चारण—रे आमकेर अथवा रियामके होता है।) इसकी प्राचीनतम हस्तलिपियाँ १७ वीं शताब्दी की हैं, किन्तु वे अपूर्ण हैं। विश्वामित्र के यज्ञ के वर्णन से प्रारम्भ होकर इन्द्रजित्-वध पर उसकी कथा रुक जाती है (सर्ग १-१०)। किन्तु रामकियेन (श्याम के रामायण) से तुलना करने पर अनुमान किया जा सकता है कि सर्ग ८० रामकेर्ति का अन्तिम सर्ग नहीं है। रामकेर्ति के फ्रेंच अनुवाद से इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ निर्धारित की जा सकती हैं। (१) लेखक कोई धार्मिक बौद्ध है जो नारायण का अवतार मानते हुए भी उनको बोधित्त्व की भी उपाधि देता है तथा कई स्थलों पर बौद्ध शब्दावली का प्रयोग करता है। (२) यद्यपि रामकेर्ति पर सेरीराम की गहरी छाप है, फिर भी लेखक ने वाल्मीकिरामायण तथा सेरीराम की कथाओं का समन्वय करने का प्रयत्न किया है। फलस्वरूप सेरीराम की अपेक्षा रामकेर्ति वाल्मीकीय रामायण के अधिक निकट है। सेरीराम में दशरथ की केवल दो रानियों का उल्लेख है, रामकेर्ति में तीनों के नाम वाल्मीकि के अनुसार ही दिये गये हैं। रामकेर्ति में रावण की सीता-स्वयंवर में उपस्थिति की ओर संकेत नहीं मिलता, सेरीराम के अनुसार रावण भी इसमें आया था। सेरीराम में राम स्वेच्छा से वन के लिए प्रस्थान करते हैं जब कि रामकेर्ति में कैकसी (कैकेयी) के अनुरोध से राम को निर्वासित किया जाता है। सेरीराम में लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र के वध का वृत्तान्त मिलता है, जिसका उल्लेख रामकेर्ति में नहीं है। ख्मेररचना में सीता जनक की दत्तक पुत्री मानी जाती हैं तथा राम द्वारा परित्यक्त होने पर वाल्मीकि के आश्रम में निवास करती हैं। सेरीराम में सीता महारेसि कली की दत्तक पुत्री हैं तथा त्याग के बाद उनके यहाँ रहती हैं। सेरीराम में हनुमान् राम के पुत्र माने जाते हैं, किन्तु रामकेर्ति के अनुसार वह वायु और अञ्जना की सन्तान हैं। (३) मलयन सेरीराम में भी निम्नलिखित सामग्री मिलती है जिससे स्पष्ट है कि ख्मेररामायण तथा सेरीराम का गहरा सम्बन्ध है। —एक असुर, काकरूप धारण कर विश्वामित्र यज्ञभङ्ग करने का प्रयत्न करता है और विश्वामित्र उसे मारने के लिए राम तथा लक्ष्मण को धनुष-बाण देते हैं। —जटायु-रावण-युद्ध में सीता की अंगूठी का उल्लेख। —लक्ष्मण द्वारा १४ वर्ष तक नींद तथा भोजन का त्याग। —लक्ष्मण और हनुमान् का युद्ध। —सुग्रीव को अपनी सामर्थ्य का विश्वास दिलाने के लिए राम सात तालों का एक ही बाण से भेदन करते हैं। ये सात ताल महाराज नाग की पीठ पर स्थित हैं। —सम्बूरान का वृत्तान्त जिसे हनुमान् राम के पास ले आते हैं। —सेतु बाँधने के समय मछलियों का उत्पात। —रावण के चित्र के कारण सीता-त्याग। वाल्मीकि द्वारा सीता के एक पुत्र की सृष्टि। राम-सेना से सीता के पुत्रों का युद्ध। (४) कथा निर्वहण मौलिक है।

३४० रामायणमीमांसा द्वादश 'अप्रतिषिद्धमनुमतं भवति' न्याय के अनुसार प्रमाणभूत मूल ग्रन्थ से जो विरुद्ध नहीं है वह अनुमत समझा जाता है, अतः रामकेर्ति तथा अन्यान्य रामायणों की अविरुद्ध विशेषताएँ मान्य ही समझी जाती हैं। यह कहा ही जा चुका है कि महाभारत, पुराण और संहिताएँ भी आर्ष हैं। ऋषियों को विप्रकृष्ट देशकाल की वस्तुओं का भी ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा ज्ञान हो सकता है, अतः वे वाल्मीकिरामायण के पूरक समझे जाते हैं। श्याम ३२५ अनु० : श्यामदेश में राम-कथा रामकियेन (अर्थात् रामकीर्ति) के नाम से प्रसिद्ध है। अपेक्षाकृत प्राचीनकाल से वहाँ के नाटकों में राम-कथा का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। प्रारम्भिक नाटकों के दो वर्ग (कोन और रखम) का एकमात्र विषय राम-कथा ही था और एक तीसरा वर्ग (नंग अर्थात् छाया-नाटक) प्रधानतया राम-कथा के दृश्य प्रस्तुत करता था। १८वीं शताब्दी में नाटकों के एक नवीन रूप का प्रचलन हुआ (वेणुक रोंग) जिसकी कथावस्तु रामकियेन पर आधारित थी। १८वीं तथा १९वीं शताब्दी की हैं। इस रामायण के दो भिन्न संस्करण १८ वीं शताब्दी उत्तरार्द्ध में निकाले गये थे तथा इसका एक तीसरा संस्करण नाटक के रूप में १९वीं शती पूर्वार्द्ध में प्रकाशित हुआ था। बांकाक के बिरला ओरियण्टल सीरीज में रामकियेन का अंग्रेजी संक्षेप रामकीर्ति के नाम से प्रकाशित किया गया है। अगले अनुच्छेद में जो रामकियेन के कथानक का विश्लेषण किया गया है, वह उस रामकीर्ति के दूसरे संस्करण (सन् १९४१) पर निर्भर है। १७वीं शताब्दी की अनेक छोटी रचनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनकी कथावस्तु रामायण की किसी घटना से सम्बन्ध रखती है, उदाहरणार्थ वाली का सुग्रीव को उपदेश देना कि किस प्रकार राम के दरबार में व्यवहार करना चाहिए तथा दशरथ का राम को राजनीति तथा धर्म के विषय में शिक्षा देना। १८वीं तथा १९वीं शती में कई कवियों ने रामकियेन नामक महाकाव्यों की रचना की है। उदाहरणार्थ थोनबुरी, फुत्तायोत्फा (इनका रामकियेन सर्वाधिक विस्तृत है) तथा फुत्तालेउतला। ३२६ अनु० : रामकियेन का संक्षिप्त अंग्रेजी रूपान्तर ४५ अध्यायों में विभक्त किया गया है। प्रथम अध्याय में अयोध्या के राजवंश का परिचय मिलता है तथा द्वितीय अध्याय में राम तथा उनके भाइयों के जन्म का वर्णन दिया गया है। अनन्तर लङ्का का निर्माण, रावण के कृत्य तथा राम-कथा के अनेक पात्रों अर्थात् वाली, सुग्रीव, हनुमान्, अङ्गद और सीता की जन्मकथा मिलती है (अध्याय ३-११)। इसके बाद विश्वामित्र के यज्ञ से लेकर सीता-त्याग के पश्चात् राम-सीता सम्मिलन की समस्त कथा प्रस्तुत की गयी है (अध्याय १२-४५) रामकियेन के कथानक की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं— (१) रामकियेन के पात्र सबके सब श्याम देश के निवासी हैं तथा रामायण का घटनास्थल श्याम में ही माना गया है। (२) इसका मुख्य आधार खमेर भाषा का रामकेर्ति है। दोनों में कथा का निर्वहण सदृश है। रामकेर्ति की भाँति रामकियेन भी सेरीराम की अपेक्षा वाल्मीकीय कथा के अधिक निकट है। रामकेर्ति तथा वाल्मीकिरामायण की तुलना करते हुए रामकेर्ति की जितनी विशेषताओं का उल्लेख हुआ है, वे प्रायः सब रामकियेन में भी विद्यमान हैं। अन्तर यह है कि रामकियेन में हनुमान् को अञ्जना तथा शिव का पुत्र माना गया है तथा लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र का वध वर्णित है। रामकियेन का एक अन्य प्रसङ्ग राम-सीता का पूर्वानुराग, न वाल्मीकिरामायण में मिलता है और न रामकेर्ति में, किन्तु कुछ बातों में रामकियेन रामकेर्ति की अपेक्षा वाल्मीकीय कथा के अधिक निकट है। अयोमुखी का वृत्तान्त रामकेर्ति में नहीं है, किन्तु वह रामकियेन में विद्यमान है। रामकियेन के अनुसार सीता-स्वयंवर

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४१ का धनुष ईश्वर ( शिव ) का है जब कि रामकेर्ति में जनक स्वयं इन्द्रजाल से बनाते हैं। रामकियेन में वाल्मीकीय कथा के अनुसार अगस्त्य राम को दिव्य अस्त्र प्रदान करते हैं, किन्तु इसका उल्लेख रामकेर्ति में नहीं हुआ है। उपर्युक्त विश्लेषण का निष्कर्ष यह है कि रामकेर्ति के अतिरिक्त रामकियेन पर वाल्मीकिरामायण का भी सीधा प्रभाव पड़ा है। ( ३ ) रामकेर्ति की भांति रामकियेन भी बहुत से अर्वाचीन वृत्तान्तों के लिए मलयन सेरीराम पर निर्भर है। वाल्मीकि से भिन्न जो सामग्री सामान्यरूप से रामकेर्ति तथा सेरीराम में मिलती है वह प्रायः सब रामकियेन में भी पायी जाती है। अन्तर यह है कि रामकियेन में सुग्रीव से मैत्री करने के पूर्व राम की किसी परीक्षा का उल्लेख नहीं है और लक्ष्मण के संयम का भी निर्देश नहीं मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामकियेन पर सेरीराम का सीधा प्रभाव भी पड़ा है, क्योंकि निम्नलिखित सामग्री रामकेर्ति में नहीं हैं किन्तु वह रामकियेन तथा सेरीराम दोनों में विद्यमान हैं। महिरावण का राम को पाताल ले जाना। भस्मलोचन की कथा। वाली, सुग्रीव तथा अञ्जना का अहल्या की सन्तान के रूप में उल्लेख। अङ्गद की जन्मकथा जिसके अनुसार वह वाली तथा मन्दोदरी का पुत्र हैं। सीता का लङ्का में जन्म। हनुमान् तथा नल का कलह। रामकेर्ति, वाल्मीकिरामायण तथा सेरीराम के अतिरिक्त रामकियेन का और कोई आधार ग्रन्थ रहा होगा कि नहीं इस प्रश्न का निश्चयात्मक उत्तर तभी संभव होगा जब रामकेर्ति की कोई पूरी हस्तलिपि मिल जायगी। रामकियेन में विभीषण मन्दोदरी के विवाह का उल्लेख मिलता है। यह प्रसङ्ग सेरीराम अथवा रामकेर्ति में नहीं आया है, किन्तु वह अनेक भारतीय राम-कथाओं में उल्लिखित है। निम्नलिखित सामग्री श्याम देश को छोड़ कर अबतक और कहीं नहीं मिली है। सेतुबन्ध के पूर्व रावण का तपस्वी के रूप में राम के पास पहुँचना और युद्ध छोड़ देने के लिए उनसे अनुरोध करना। रावण के इस निष्फल प्रयत्न के अनन्तर बेंजकाया ( विभीषण की पुत्री ) का सीता का रूप धारण कर मृतवत् राम के शिविर के पास की नदी के ऊपर बह जाना। रावण का ब्रह्मा को बुला भेजना; लङ्का में ब्रह्मा का आगमन, रावण द्वारा राम पर अभियोग। ब्रह्मा का राम को बुलाना और बाद में सीता को भी। अन्त में ब्रह्मा का सीता को लौटाने की आज्ञा देना तथा रावण के अस्वीकार करने पर ब्रह्मा का रावण को शाप देना। रावण-वध तथा राम के अयोध्या में प्रत्यागमन के बाद रावण के एक पुत्र का विभीषण के विरुद्ध विद्रोह करना। भरत तथा शत्रुघ्न का रामसेना के साथ लङ्का की ओर प्रस्थान करना और रावण के 'पुत्र को पराजित कर विभीषण को पुनः राज्य दिलाना। इस युद्ध का विस्तृत वर्णन प्रथम युद्ध की पुनरावृत्तिमात्र है। यह प्रसङ्ग रामकेर्ति में तो नहीं मिलता, किन्तु सर्ग ७६ में इसकी ओर संकेत किया गया है। इसका आधार भारतीय है। समस्त युद्ध की इस पुनरावृत्ति के अतिरिक्त और बहुत से वृत्तान्त दुहराये गये हैं। इन्द्रजित् के यज्ञ-भङ्ग के अतिरिक्त रामकियेन में ऐसा वर्णन कुम्भकर्ण ( अध्याय २८ ), रावण ( अध्याय ३१ ) तथा मन्दोदरी ( अध्याय- ३४ ) के विषय में भी मिलता है।

३४२ रामायणमीमांसा द्वादश (५) रामकियेन की एक अन्तिम विशेषता यह भी है कि उसमें हनुमान् की बहुत सी प्रेमलीलाओं का वर्णन किया गया है। स्वयंप्रभा (अध्याय २३), बेंनजकाया (अध्याय २५), नागकन्या सुवर्णमच्छा (अध्याय २६), अप्सरा वानरी (अ० ३१) के अतिरिक्त मन्दोदरी के साथ भी वह क्रीड़ा करते हैं । मन्दोदरी के संजीवनयज्ञ को भङ्ग करने के लिए वह दशकण्ठ के रूप में मन्दोदरी के पास पहुँच कर उसका आलिङ्गन करते हैं (अध्याय ३४) । एक अन्य अवसर पर वह रावण के पास पहुँच कर राम की भर्त्सना करते हैं तथा रावण की ओर से युद्ध करने का प्रस्ताव करते हैं । वास्तव में वह एक दिन तक ऐसा करते हैं और पुरस्कारस्वरूप इन्द्रजित् की समस्त सम्पत्ति के अतिरिक्त मन्दोदरी को भी रावण से प्राप्त कर रातभर उसके साथ क्रीड़ा करते हैं (अध्याय ३५)। रामकियेन का अनुवाद हिन्दी में रामकीर्ति नाम से प्रकाशित है। यह स्वामी सत्यानन्द पुरी के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर सस्ता-साहित्यमण्डल नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। स्वामी सत्यानन्द पुरी के अनुसार जिन काव्य-रचनाओं ने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है उनमें रामायण महाकाव्य का स्थान सर्वोपरि है। धर्म और कथा के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किसी ने किया तो वह मानवता के आदि कवि संस्कृतकाव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। दूर-दूर देश के कवियों ने उनकी अनुकृति के असीम भण्डार से रत्न चुन-चुन कर अपने साहित्य को समृद्ध किया है। कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृति को अमर बनाया है। खेतों में काम करनेवाले किसान अथवा नाव चलानेवाले नाविक लोग भी उनसे अप्रभावित न रह सके—उनके गीतों को गुनगुनाते हुए अपनी थकावट भूल जाते हैं। उनकी लेखनी ने जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा और किसी ने नहीं डाला। स्वामी सत्यानन्दपुरी के अनुसार थाई देश के छठे राम राजा को ही यह श्रेय है कि उन्होंने रामकीर्ति के मूलरूप रामायण का पता लगाकर उसके रचयिता वाल्मीकि के बारे में जानकारी दी है। कोई लोकप्रिय गीत जब लोगों को अपने माधुर्य से मोह लेता है जब लोग उसके सम्मोहन में फँस जाते हैं तो धीरे-धीरे इस बात को भूल जाते हैं कि इसका रचयिता कौन है। वाल्मीकि के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ । थाई देश में रामायण का प्रभाव १३ वीं शती से ही है। फिर भी इस रामकीर्ति के सुन्दर काव्य का १७८१ ई० के प्रारम्भ में निर्माण हुआ। राम की महिमा का जैसा बखान थाई देश में पाया जाता है, उसपर रामायण का सीधा प्रभाव नहीं पड़ा' । रामकीर्ति में ऐसी कहानियों का समावेश है जो उत्तर भारत से लेकर मलाया तक अनेक देशों में लोकप्रिय हैं, अतः रामकथा अनेक देशों से होती हुई थाई देश में पहुँचती है। रामकीर्ति के अनुसार देवताओं में सबसे बड़े ईश्वर (शिव) हैं। राम उनके अनुग्राह्य हैं। इसमें राम, हनुमान् आदि कुछ नाम रामायण से बिलकुल मिलते हैं, परन्तु कुछ नये नाम हैं। उनमें मन्थरा का नाम कुच्ची लिखा गया है जो कुब्जा का बिगड़ा हुआ रूप है। शत्रुघ्न को शत्रुत, कुवेर को कुवेरन, लक्ष्मण को लक्षण तथा भरत को वरत कहा गया है। इसमें हिरण्याक्ष को हिरन्तयक्ष कहा गया है। ईश्वर से अपराजित होने का वरदान पाने के कारण वह अत्यन्त उद्धत होकर भूमि को जम्बूद्वीप, उत्तरकुरु अमर गोपाल की भूमि से काटकर चटायी की तरह बगल में दबा कर पाताल चला जाता है। उसकी उद्दण्डता से देवताओं का भी हृदय कम्पित हो जाता है। वे सब कैलास पर्वत पर ईश्वर की शरण लेते हैं। ईश्वर द्रवित होकर नारायण को बुलाकर कहते हैं तुरन्त जाकर संसार को हिरन्त के अत्याचार से मुक्त करो । फलतः नारायण ने सूकररूप से हिरन्त का वध किया। नारायण अपने स्थान क्षीरसमुद्र में वेद-ध्वनि में लवलीन हो गये। समुद्र के तल से एक कमल निकला जिसकी सुन्दर सुगन्धित पत्तियों से एक बच्चा निकला। उसे गोद में लेकर नारायण कैलास में ईश्वर के पास गये। ईश्वर की आज्ञा हुई इस बालक को संसार का सबसे पहला सम्राट् नियुक्त किया जाय। उसने संसार की रक्षा करने के लिए नारायण-वंश की नींव डाली। उसकी राजधानी द्वारावती या अयुध्या हुई । बालक का नाम अनोमान था। उसको नारायण का अवतार मानते थे। उसके अजपाल

नाम का पुत्र हुआ। उसके शासन से सब संतुष्ट थे। इसी समय असुर ब्रह्मनामक राक्षस हुआ जिसको ईश्वर ने वरदानरूप गदा दी। उसके प्रभाव से वह अत्याचारी हो गया। अजपाल ने मालीवग नामक अन्य देव की सहायता से उसको मारा उसके बाद दशरथ ने उस वंश-परम्परा को जारी रखा। अजपाल के बाद दशरथ गद्दी पर बैठा। उसकी कोसुरिया, समुद्रा और कौयकेशी तीन रानियाँ थीं। वह पुत्र न होने के कारण दुःखी था। वसिष्ठ, स्वमित्र, वज्जवग्ग और भारद्वाज के परामर्श से सिंगमुनि के पुत्र कलैकटी जो हरिणी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था, उसका शरीर मनुष्य जैसा था पर मुँह हरिण का सा था। उसका घोर तप था। उसके तेज से रोमवचन नामक देश में अकाल पड़ गया। उस देश के राजा ने अपनी कन्या को भेजा कि वह ऋषिपुत्र के तप को भङ्गकर ऋषि को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराये। उसके लावण्य से मोहित होकर ऋषि ने तप छोड़ दिया। जिससे विपुल वृष्टि हुई। ऋषि-पुत्र जामाता के रूप में राजमहलों में रहने लगा। राजा दशरथ के निमन्त्रण से ऋषिपुत्र अयोध्या आया और पुत्रेष्टियज्ञ की तैयारी में लग गया। पूर्वोक्त चार ऋषियों को लेकर वह कैलास पर गया। उसी समय देवों के प्रताप से राक्षसों को विशेष वरदान मिले थे। उससे वे बड़े अन्याय करते थे। ऋषि कलैकटी ने ईश्वर से प्रार्थना की, आप नारायण को मृत्युलोक में भेजिये। वे दशरथ के पुत्र के रूप में अवतार लें और पृथ्वी को विपत्ति से मुक्त करायें। ईश्वर की प्रेरणा से नारायण राजी हो गये, परन्तु उनकी शर्त थी कि लक्ष्मी, अनन्त नाग, गदा, चक्र और शङ्ख भी अवतार लें। ईश्वर ने सब शर्त मान लीं। ईश्वर ने ऋषियों से कहा आप चल कर यज्ञ आरम्भ करें। यज्ञाग्नि से एक देवता का प्रादुर्भाव होगा। उनके सिर पर एक पात्र होगा। उसमें चार रोटियाँ होंगी। उसी समय एक कौवा उस पात्र पर झपट्टा मारेगा और आधी रोटी लेकर दक्षिण में भाग जायगा। शेष रोटियों को दशरथ की रानियों में बांट दिया जाय। रानियों को चार पुत्र होंगे। ईश्वर की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया गया। नारायण ने कोसुरिया के पुत्र के रूप में अवतार लिया। वह हरे वर्ण के थे। चक्र कौयकेशी के पेट से भरतरूप में उत्पन्न हुए। वह रक्त वर्ण के थे। नाग और शङ्ख दोनों ने संयुक्त रूप से जन्म लिया। समुद्रा के पेट से लक्ष्मण हुए वे पीत वर्ण के थे। गदा ने समुद्रा से जन्म लिया उनका नाम शत्रुद था। वे बेगनी वर्ण के थे। भविष्यवाणी के अनुसार कौआ भी प्रकट हुआ। उसके द्वारा अपहृत रोटी से सीता के रूप में लक्ष्मी की उत्पत्ति लङ्का में हुई। कौए को दशकण्ठ ने भेजा था। उस आधी रोटी को मण्डो ने खाया। उससे सीता का जन्म हुआ। पहले लङ्का का नाम रङ्गका था। नीलकाल पर्वत पर कौए का बहुत बड़ा घोंसला था। इसी लिए इसका नाम रङ्गका था। श्यामी भाषा में का का अर्थ कौआ और रङ्ग का अर्थ घोंसला है। ब्रह्मा ने इसको अपने एक भक्त सहमलिबन के लिए बसाया था। वही लङ्का का पहला राजा था, परन्तु नारायण के डर से वह राजधानी छोड़ कर पाताल चला गया। ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा ने नीलकाय पर्वत पर एक नया घोंसला बनाया और ब्रह्मा ने उसे अपने भक्त चतुर्वक्र को दे दिया। उसकी रानी मालिका थी। उसका पुत्र लस्तियन गद्दी पर बैठा। यह शक्तिशाली राक्षस था। उसकी पाँच रानियाँ थीं। सुनन्दा कुबेरन की माँ थी, चित्रमाली देवनासुर की, स्वर्णमाले अंशधन्वा की, वरप्रभा भारन की माँ थी। पाचवीं रानी का नाम रजटा था। उसके ६ पुत्र और एक पुत्री थी। उनके नाम दशकण्ठ, कुम्भकर्ण, विभेक, दुःखन, खर, त्रिशिरा और सुमनकवा था। लस्तियन की सहायता से पाताल के राजा कालनाग ने सहमलिबन पर चढ़ायी कर दी। उस समय सहमलिबन की लङ्का के राजा से मैत्री हो गयी थी। उसने लङ्काधिपति चतुर्वक्र की अधीनता भी स्वीकार कर ली थी। अतः इस समय उसने लस्तियन से सहायता माँगी। उनकी सहायता से कालनाग पराजित हो गया। उसके बाद कालनाग ने अपनी लड़की काल अग्गी लस्तियन को दे दी। लस्तियन ने उक्त लड़की का विवाह अपने लड़के दशकण्ठ से कर दिया। वृद्धावस्था में लस्तियन ने अपने राज्य को बाँट दिया। दशकण्ठ लङ्का का राजा हुआ। कुबेरन कालचक्र का अधिपति हुआ, पुष्पक भी उसी को मिला। देवनासुर के भाग में

३४४ रामायणमीमांसा द्वादश चक्रकाल का राज्य आया। अंशधन्वा वादकन का राजा हुआ। भारन सीलाश का, दवन रोमगल का, दुखन चारिक का ओर त्रिशिरा मक्षवारी का राजा हुआ। संुमनक्खा का विवाह राजा जिह्वा से कर दिया गया। दशकण्ठ सबसे अधिक प्रतापी हुआ। कैलास में एक नन्दक देव रहता था। वह ईश्वरदर्शनार्थ कैलास जानेवालों का पैर धोता था। सब उसे छेड़ते थे। उसके सिर पर चपत मारते थे। परिणामस्वरूप वह गंजा हो गया। उसने पीड़ित होकर ईश्वर की शरण ली और यह वरदान माँगा कि मैं जिसकी ओर संकेत कर दूँ वह वहीं गिरकर मृत्यु का ग्रास बन जाय। ईश्वर ने उसे वैसा ही वरदान दे दिया। फलस्वरूप बहुत से देवता मारे गये। इन्द्र ने ईश्वर से प्रार्थना की कि उससे वरदान वापस लिया जाय। ईश्वर ने नारायण को आदेश दिया कि वे नन्दक को पराजित करें। नारायण ने अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को मोह में फाँस लिया। उसने अप्सरा को प्राप्त करना चाहा। उसने कहा तुम पहले मेरे साथ नाचो, उसके बाद मैं विवाह करूँगी। उसने स्वीकार कर लिया; अप्सरा ने अपनी अंगुली अपने पैरों की ओर दिखायी नाच की धुन में नन्दक वरदान भूल गया, अतः उसने भी अपनी अंगुली अपने पैरों की ओर दिखायी, फलतः उसकी टांग टूट गयी। अप्सरा ने अपना असली रूप धारण किया और नन्दक को मारने दौड़े। नन्दक ने नारायण से कहा कि यह तो धोखा है, वीरोचित न्याय नहीं है। नारायण ने कहा आगे तुम दशकण्ठ २० भुजावाले होओगे। मैं एक सिर दो भुजा से ही तुम्हें मारूँगा। नन्दक दशकण्ठ और नारायण राम हुए। विभेक के पास एक चमत्कृत सीसा था जिससे वह भविष्य जान लेता था। इसलिए उसको दशकण्ठ के षड्यन्त्रों का पता लग जाता था। विभेक ने उसी के बल से रावण-नाश में राम की सहायता की। दशकंठ-मंडो-विवाह हिमालय में चार ऋषि तप करते थे। वे गायों का दूध पीते थे। गायें स्वयं आकर शीशे के पात्र में दूध डाल जाती थीं। ऋषि लोग बचे हुए दूध को निकट की एक मेढकी को दे देते थे। पाताललोक की एक नागकन्या बहुत कामुकी थी, वह अतृप्त हो मृत्युलोक में आकर एक साँप से रमण कर रही थी। ऋषियों ने उस कुकृत्य को देख कर उसकी पूँछ पर कुछ मार दिया वह लज्जित हो पाताल चली गयी। वह पुनः मृत्युलोक में आयी और ऋषियों के दुग्धपात्र में विष मिला दिया। मेढकी देख रही थी, वह ऋषियों की भक्त थी। ऋषियों को मृत्यु से बचाने के लिए वह दूध में कूद पड़ी और मर गयी। ऋषियों ने सोचा मेढकी दूध की लालच में फँस कर मर गयी। उन्होंने मन्त्रों से उसे जीवित कर दिया। उसने ऋषियों से सारा हाल बताया। ऋषियों ने उसपर प्रसन्न होकर उसे सुन्दरी कन्या बना दिया। वह मण्डो थी। ऋषियों ने उसे ईश्वर को सौंप दिया। वह उमा की सेवा करती थी। इधर किसी प्रसङ्ग से कैलास पर्वत का कोना धँस गया था। ईश्वर ने कहा जो उसे ठीक करेगा, उसे मुंह माँगा वरदान मिलेगा। बहुत से देवताओं ने प्रयत्न किया, पर वह टस से मस नहीं हुआ। दशकण्ठ ने उस पहाड़ को ठीक कर दिया और पुरस्कारस्वरूप में उसने उमा की माँग की। ईश्वर ने उमा को दे दिया। दशकण्ठ ने उमा को पकड़ लिया, परन्तु उसे अनुभव हुआ कि वह अग्नि के समान तप्त हो रही है। वह उमा को सिर पर लेकर लङ्कापुरी चला। देवता बड़े चिन्तित हुए। तब नारायण एक बूढ़े माली का रूप धारण कर बाग में एक वृक्ष को इस प्रकार लगाने लगे कि जिसका मूल ऊपर की ओर रहे। दशकण्ठ ने देखकर कहा मूर्ख क्या कर रहा है। मालीरूप नारायण ने कहा तू मुझसे भी मूर्ख है जो एक सन्तप्त स्त्री को, जिसका शरीर जल रहा है, कन्धे पर उठाये फिरता है। वह तेरे वंश का विध्वंस कर डालेगी। तुझे तो इससे अच्छी स्त्री माँगनी चाहिये थी। जैसी मण्डो है। यह सुनकर दशकण्ठ ने उमा को लौटा दिया और मण्डो को माँग लिया। इसी बीच खिदखिन (किष्किन्धा) के वाली ने उससे युद्ध कर मण्डो को छीन कर अपनी स्त्री बना लिया। अन्त में उसके गुरु अङ्गद के समझाने पर मण्डो दशकण्ठ को लौटा दी गयी।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४५ वाली-सुग्रीव की उत्पत्ति साकेत का राजा गौतम सन्तानहीन होने के कारण तप कर रहा था । उसकी जटा और दाढ़ी इतनी बढ़ी कि उसमें दो बया पक्षियों ने घोंसला बना लिया । एक दिन पक्षी किसी कमल-वन में रात भर कमल में बन्द रहा । सबेरे आया तो उसकी पत्नी ने उसकी देह सूंघ कर सोचा कि यह रात भर किसी दूसरी स्त्री के सम्पर्क में रहा है । पक्षी ने कसम खाते हुए कहा कि यदि मैंने ऐसा किया हो तो इस साधु का सारा पाप मुझे लगे । गौतम को बड़ा दुःख हुआ, क्योंकि वह समझता था कि उसमें कोई पाप नहीं है । पूछने पर चिड़िया ने कहा सन्तानहीन होना ही उसका पाप है । उसने तप छोड़कर यज्ञ किया । उससे एक सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई । उसका नाम काल अचना हुआ । गौतम ने उससे विवाह कर लिया । इससे एक लड़की हुई । उसका नाम स्वाहा रखा गया । इधर इन्द्र आदि देवता सोच रहे थे कि हम अपने कर्मों का बँटवारा कैसे करें जिससे कि मृत्युलोक में सैनिकों के रूप में जन्म लेकर लड़ाई में परस्पर सहायता कर सकें । उनकी दृष्टि अचना पर पड़ी । इन्द्र नीचे आया और अपनी दैवी शक्ति से उसको गर्भवती बनाया । उसको पुत्र हुआ, उसका नाम काकाश (वाली) हुआ । आदित्य भी ऊपर से निकले । उन्होंने भी उससे पुत्र उत्पन्न किया । उसका नाम सुग्रीव हुआ । गौतम ने दोनों को अपने पुत्र समझा । स्वाहा को अपनी माता के दुष्कृत्यों की जानकारी थी । एक दिन गौतम नहाने जा रहे थे, सुग्रीव गोद में था, काकाश कन्धे पर था और स्वाहा अंगुली पकड़े जा रही थी । स्वाहा के मन में डाह हुआ । गौतम को इस बात पर आश्चर्य हुआ। पूछने पर उसने पिता को सब बात बता दी । गौतम को यह विश्वास नहीं हुआ कि मेरी स्त्री अचरित्रा है । उसने सबको नदी में फेंक दिया और कहा जो मेरी सन्तान होगी मेरे पास लौट आयेगी जो दूसरे की होगी वह बन्दर बनकर जङ्गल में चली जायेगी । परिणामतः काकाश और सुग्रीव बन्दर बनकर बन में चले गये । घर लौटकर गौतम ने पत्नी को शाप दिया तू पत्थर बन जा । जब नारायण राक्षसों का संहार करने के लिए लङ्का पर चढ़ायी करेंगे तब तू सेतु बाँधने के काम में आयेगी और सदा समुद्र में डूबी रहेगी । अचना को लड़की पर बड़ा गुस्सा आया । उसने लड़की को शाप दिया तू एक टाँग पर खड़ी रहेगी, एक हाथ में वृक्ष की शाखा पकड़े रहेगी । जब तू एक अतुल बलधारी वानर को जन्म देगी तब शापमुक्त होगी । इन्द्र ने किष्किन्धा बना कर काकाश और सुग्रीव को दी और संसार के सभी बन्दरों को बुला कर आदेश दिया तुम लोग काकाश को राजा बना लो । देवता वसन्तोत्सव मना रहे थे । समुद्र की देवी मणिमेखला आनेवाली थी । उसके पास एक दैवी मणि थी । उसकी ख्याति विश्व में फैली थी । एक रामसुर नामक असुर उसके पीछे पड़ा । वह बहुत बली था । अपने पीछे बली असुर को दौड़ते देखकर मणिमेखला प्रसन्न होकर उसे चिढ़ा रही थी । वह बहुत दौड़ा परन्तु देवी और मणि उसके हाथ न आयी । वह असुर अपना क्रोध उतारने के लिए अर्जुन नामक देव से युद्ध कर ठण्डा हो गया । इधर ईश्वर ने देखा सुमेरु का कोना टेढ़ा हो गया है । उसे ठीक करने के लिए देवता बुलाये । उन्होंने सुमेरु को साँप से बाँध कर खोंचा पर सफलता न मिली । सुग्रीव ने साँप की नाभि को दबाया, साँप को गुदगुदी लगी । उसने अपने शरीर से सुमेरु को जकड़ लिया । काकाश ने एक ओर कन्धा दिया सुमेरु ठीक हो गया । ईश्वर दोनों पर प्रसन्न हुए । काकाश को त्रिशूल देकर वाली नाम रखा । सुग्रीव उपस्थित न था । उसके लिए रूपवती स्त्री उसके भाई को दे दी । वाली ने उसे हाँडी में रख दिया । नारायण को यह बुरा लगा; उन्होंने कहा किसी युवती का किसी युवक को देना वैसा है जैसे किसी भौंरे को कोई फूल देना । वाली ने आश्वासन दिया कि मैं अपने वचन का पालन करूँगा । यदि न करूँ तो राम के बाण से मारा जाऊँ । वाली आया तो तारा पर मुग्ध हो गया । अपने वचन को भूल गया । सुग्रीव को न देकर उसे अपने ही घर में रख लिया । ४४

३४६ रामायणमीमांसा द्वादश इधर स्वाहा की दशा देखकर ईश्वर को दया आयी, अतः राम की सहायता के लिए उन्होंने सब दैवी शस्त्रों की शक्ति को अलग कर दिया और वायु को आदेश दिया कि वह इन सब शक्तियों को उसके मुख में भर दे जिससे एक ऐसा पुत्र बन सके जिसमें सब शस्त्रों की शक्ति एकत्र हो जाय । गदा को उसकी रीढ़ की हड्डी बना दो जिससे वह आकाश में यात्रा कर सके । त्रिशूल से उसका शरीर तथा हाथ पैर बन जायँ । वह शस्त्र सदा उसकी छाती में चिपका रहे । चक्र से उसका सिर बने और वायु उसका पिता बने । वायु ने ईश्वर की आज्ञा का पालन किया । स्वाहा गर्भवती हो गयी । तीस मास के बाद एक सफेद बन्दर उत्पन्न हुआ जो सोलह साल के लड़के के समान था । परन्तु उसका जन्म माता के मुख से हुआ । वायु ने उसका नाम हनुमान् रखा । माता ने कहा तुम्हारे कानों में दो बालियाँ हैं, दो चमकदार दाँत हैं और एक श्वेत घुंघराला बाल है । इनको नारायण ही देख सकते हैं । जिसको ये चिह्न दिखायी दें उसको नारायण का अवतार समझ उसकी सेवा करना । इस पुत्र के जन्म से स्वाहा का शाप छूट गया । उमा के बाग में यह हनुमान् तोड़फोड़ कर रहे थे । उमा ने आधी शक्ति हो जाने का शाप दिया, परन्तु हनुमान् की प्रार्थना से वे प्रसन्न हो गयीं और वरदान दिया कि जिस दिन नारायण राम के रूप में स्पर्श करेंगे तुम्हारी पुरानी शक्ति ज्यों की त्यों फिर प्राप्त हो जायगी । वायु के साथ हनुमान् ईश्वर का दर्शन करने गया । ईश्वर ने उसे अन्तर्धान होने की विद्या दी ! अमर होने का वरदान भी दिया । हनुमान् वाली और सुग्रीव का भानजा था । ईश्वर ने ही वाली और सुग्रीव से उसका परिचय कराया । ईश्वर ने अपने चमड़े से वाली की सहायता के लिए एक बन्दर उत्पन्न किया । उसका नाम जम्बुवान था, जो बहुत अच्छा चिकित्सक भी था । जब वाली के पास से मण्डो दशकण्ठ के पास आयी तब वह गर्भवती थी । दशकण्ठ के गुरु अङ्गद ने उसके गर्भ को लेकर बकरी के गर्भाशय में रख दिया । जन्म के समय उस गर्भ को निकाल कर उसे अपना ही नाम देकर वाली को लौटा दिया । रावण अङ्गद के स्नान के समय केकड़े का रूप धारण कर उसे जल में डुबा देना चाहता था । सब बन्दर बचाने में असमर्थ रहे तब वाली आया उसको देखकर लङ्केश ने युद्ध किया और हार कर वाली का बन्दी हो गया । बन्दर उसकी हँसी उड़ाते थे । सात दिन बाद बाली ने उसे छोड़ दिया । दशकण्ठ का वरदान अपने गुरु अङ्गद की राय से रावण ने एक यज्ञ किया जिससे उसे ऐसी शक्ति मिल गयी कि वह अपनी आत्मा को शरीर से निकाल कर अन्यत्र सुरक्षित स्थान पर रख सकता था । इससे युद्ध में आहत होने पर भी मरता नहीं था । इस तरह अमरत्व के समान उसे चमत्कारिणी शक्ति मिल गयी । इससे उसका अत्याचार और बढ़ गया । उसने कुबेर पर चढ़ायी कर पुष्पक विमान छीन लिया । ईश्वर से उसकी शिकायत की गयी । ईश्वर ने उसकी छाती पर हाथी के दाँत से आक्रमण किया । रावण आहत होकर लङ्का को भागा और विश्वकर्मा को हाथी दाँत काटने का आदेश दिया । स्वस्थ होने पर उसने मछली का रूप धारण कर मछली से सहवास किया । उससे मत्स्यपरी उत्पन्न हुई । उसका नाम सुवर्णमच्छा हुआ । उसने हाथी बनकर हथिनियों से भी दो पुत्र उत्पन्न किये । उनका शरीर मनुष्य जैसा किन्तु मुख हाथी जैसा था । उनका नाम किरीधर और किरीवन हुआ । सीता-जन्म जब रावण के आदेशानुसार राक्षसी काकना कौए का वेश धारण कर दशरथयज्ञ से उत्पन्न दैवी भोजन का थोड़ा अंश चुराकर लायी तो उसके खाने से मण्डो गर्भवती हुई । उससे कन्या उत्पन्न हुई । उत्पन्न होते ही लड़की चिल्ला उठी "दशकण्ठ को मारो, मारो, मारो" परन्तु उसकी यह आवाज माँ बाप को नहीं सुनायी पड़ी । ज्योतिषियों ने, जिनमें विभेक (विभीषण) भी था, भविष्यवाणी की कि इस लड़की के द्वारा दशकण्ठ के सारे परिवार का नाश

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४७ होगा । डर कर रावण ने लड़की विभेक को देकर कहा इसको ले जाओ, जो चाहो करो । विभेक ने उसे एक हाँडी में बन्द कर नदी में बहा दिया । दैवी-शक्ति से नदी के तल पर एक कमल दिखायी पड़ा । हाँडी बहती हुई उसपर टिक गयी । समुद्र की देवी मणिमेखला ने अन्य देवियों के सहयोग से उस बच्ची की रक्षा की । लक्ष्मी की दैवी शक्ति से हाँडी एक ऋषि के स्नान करने के घाट से जा लगी । दैवयोग से वह जनक थे । राजा ने उसका पालन किया । ईश्वर की प्रार्थना से राजा जनक की अंगुली में दूध हो गया । राजा ने वन में एक गड्ढा खोद कर कहा यदि इस कन्या को नारायण के अवतार की पत्नी बनना हो तो इसमें एक कमल उत्पन्न हो जाय । वैसा ही हुआ । जनक ने उसी कमल पर लड़की की हाँडी रख दी और पत्रों से छिपा कर गड्ढे को पाट दिया । जनक तपस्या छोड़कर घर लौटना चाहते थे, परन्तु उनको उससे मोह हुआ कि उस स्थान को छोड़कर जाने की उन्हें इच्छा नहीं हुई । सेवकों ने जमीन खोद कर हाँडी निकालना चाहा पर वह हाँडी हाथ न लगी । जनक ने सैनिकों और हलवाहों को भी बुलाया पर फिर भी वह हाँडी हाथ न आयी । तब राजा ने स्वयं हल हाथ में पकड़ा तुरन्त हाँडी प्रकट हो गयी । उसपर एक कमल था । कमल से एक सुन्दर कन्या निकली । हल की लकीर के साथ निकलने के कारण लड़की का नाम सीता रखा गया । उसको लेकर राजा अपने राज्य में लौट आये । महारानी रत्नमणि निःसन्तान थी । सीता उस रानी की आँखों का तारा थी । इधर राम और उनके भाई बड़े हुए एवं गुरु वसिष्ठ और स्वमित्र के पास शिक्षित हुए । उनकी विद्या से प्रसन्न होकर गुरुओं ने एक यज्ञ रचा कि उससे ऐसे शस्त्रास्त्र प्रकट हों जिनसे राक्षसों का संहार हो । हवन की अग्नि प्रज्वलित होने पर ईश्वर ने अग्नि में १२ बाण छोड़े । उस यज्ञ से प्रत्येक भाई के लिए तीन-तीन धनुष-बाण निकले । उनपर हरएक भाई के नाम अङ्कित थे । राम के शस्त्र सर्वोत्कृष्ट थे । उनके नाम थे ब्रह्मास्त्र, अग्निवत और प्लैवत । इस तरह विद्या और बल से युक्त पुत्रों को देखकर दशरथ और गुरुजन बहुत प्रसन्न हुए । कैकेयी के पिता ने शस्त्रनिपुणता सुनकर राक्षसों को मारने के लिए भरत और शत्रुघ्न को अपने यहाँ बुला लिया । रावण ने भयभीत होकर ऋषियों की तपस्या भङ्ग करने के लिए काकनासुरी राक्षसी को भेजा । वह सहेलियों के साथ कौआ बनकर ऋषियों के यज्ञों में विघ्न डालने लगी । ऋषि लोग तंग आकर वसिष्ठ और स्वमित्र के पास गये । दोनों ऋषि दशरथ से माँगकर राम और लक्ष्मण को ले आये । काकनासुरी रामबाण से मारी गयी । सुबाहु और मारीच अपनी माता का बदला लेने के लिए युद्ध करने लगे । सुबाहु मारा गया और मारीच लङ्का भाग गया । राम-सीता का परिणय जनक के पास ईश्वर का धनुष था । ईश्वर ने इससे त्रिपुर को मारा था । राजा ने घोषित कर दिया जो कोई इस कोदण्ड को उठा सकेगा सीता उसके साथ ब्याही जायगी । स्वमित्र राम और लक्ष्मण को जनक-दरबार में ले गये । राजमहल में सीता ने राम को देखा, राम ने भी सीता को देखा । दोनों परस्पर मुग्ध हो गये । राम- लक्ष्मण के पास धनुष लाया गया । लक्ष्मण ने परीक्षा ली । धनुष उठाना उनके लिए कठिन न था, परन्तु वे ताड़ गये कि राम के हृदय में सीता के लिए प्रेम उत्पन्न हो गया है, अतः उन्होंने नहीं उठाया । राम की बारी आयी तो उन्होंने अनायास ही पक्षी के पंख के समान धनुष उठा लिया । अयोध्या से दशरथ आये । धूम-धाम से सीता और राम का विवाह हुआ । राम-रामासुर युद्ध बारात जङ्गल से होकर गुजर रही थी । एक देवता रामासुर ने उसे रोका । उसका अस्त्र परशु था ।

२४८ रामायणमीमांसा द्वादश रामासुर ने राम के बल की परीक्षा लेनी चाही । वहाँ युद्ध हुआ । अन्त में रामासुर ने अपनी पराजय मान ली । इसके बाद रामासुर ने उन्हें त्रिमंध नामक अस्त्र दिया । राम-वनवास दशरथ वृद्ध थे । वे अपना उत्तराधिकारी राम को बनाना चाहते थे । कैकेयी की बाँदी कुब्जी के कान में यह सूचना पड़ी । कुब्जी को राम से बैर था, इसलिए उसकी पीठ में एक कूब था । राम ने तीर मारा तो बाहर आ गया । इसपर बड़ी हँसी हुई थी । राजा ने कैकेयी को वर दिया था । एक बार युद्ध में दैत्य ने बाण से दशरथ के रथ का धुरा तोड़ दिया था । कैकेयी ने अपना हाथ पहिये में डाल कर ईश्वर से प्रार्थना की कि वह राजा की रक्षा करे । रानी की सहायता से राजा विजयी हुए । इसपर राजा ने रानी को वर दिया । कुब्जी ने कैकेयी को यह वर माँगने को तैयार कर लिया कि राम को १४ वर्ष का वनवास और भरत को राज मिले । राजा ने बहुत समझाया पर रानी हठकर गयी । उन्होंने दुःखी हृदय से कैकेयी की बात मान ली । राम वन चले गये । वे मनुष्यों की भलाई में सदा तत्पर रहते थे । उन्होंने भूमि को राक्षसों से मुक्त करने का निश्चय किया । दशरथ को राम के वियोग से बड़ा दुःख हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । राम चलते-चलते सतोंग नदी के तीर पहुँचे वहाँ अहेरियों का राजा खुनन रहता था । उसने कहा कि आप यहाँ जङ्गल का राज करें । राम ने धन्यवादपूर्वक इस भेंट को अस्वीकार कर दिया । राम भरद्वाज के आश्रम में पहुंचे । ऋषि ने उनका बड़ा सत्कार किया । ऋषि ने शरभङ्ग आश्रम जाने को कहा । वह आश्रम भी अयोध्या के निकट था । तब ऋषि ने शतकूट पर्वत पर रहने को कहा । राम वहाँ जाकर रहने लगे । भरत और शत्रुघ्न राम का सिंहासनारोहण सुनकर बड़े प्रसन्न हुए । अयोध्या पहुंचे तो वहाँ उत्सव के बजाय रोना पीटना हो रहा था । तुरन्त ही वे वस्तुस्थिति को समझ गये । वे राम के परम भक्त थे । वे राम का राज्य कैसे ले लेते ? पिता की अन्त्येष्टि करके वे माताओं को साथ लेकर पैदल यात्रा करके राम के पास पहुँचे और उनसे अयोध्या का राज्य करने का आग्रह किया । राम ने पितृभक्ति के कारण वैसा स्वीकार नहीं किया और जो इस विपत्ति का मूल कैकेयी थी, उससे भी द्वेष नहीं माना । पर भरत भी राज करने को तैयार नहीं हुए । तब राम की पादुकाओं को गद्दी पर बैठा कर राम के प्रतिनिधि होकर भरत राज संभालने को तैयार हुए । भरत ने प्रार्थना की कि यदि आप १४ वर्ष के बाद अयोध्या न लौटे तो हम अग्नि में प्रवेश कर जायेंगे । दुःखी मन से भरत अयोध्या लौट आये । गोदावरी-तट पर राम उसके बाद और घने जंगलों में चले गये । वहाँ उनको एक राजा, जिसका नाम सुदर्शन था, मिला । वह अपनी रानी के साथ तप करता था । उसने राम से अपने साथ रहने का आग्रह किया, पर राम ने वहाँ रहना स्वीकार नहीं किया । अब वे बीख राक्षस के उपवन में आये । उसको ईश्वर के वरदान से समुद्र एवं अग्निदेव का बल प्राप्त था । राक्षस के कर्मचारियों ने उन्हें रोका । लक्ष्मण ने सबको मार डाला । बीख ने बदला लेने का निश्चय किया, पर वह बली होने पर भी राम-लक्ष्मण का मुकाबला न कर सका । अन्त में मारा गया । आगे उन्हें एक अप्सरा मिली जिसका नाम सोबरी था । ईश्वर की आराधना में त्रुटि होने से उसे जलते हुए जङ्गल में रहने का शाप मिला था । शाप छूटने की शर्त यह थी कि जब राम उस वन में आकर आग बुझायेंगे तब उसकी मुक्ति होगी । राम ने उस दुःखिया की टेर सुनी । आग बुझा दी और अप्सरा को दिव्य रूप प्राप्त करा दिया । आगे राम ऋषि अगत्त से आश्रम में पहुँचे । ईश्वर ने अपना वह अस्त्र जिससे उन्होंने त्रिपुर को मारा था, इन्हीं अगत्त के संरक्षण में रख दिया था कि जब राम आयें तो वह उनको दिया जाय । ऋषि से अस्त्र लेकर राम गोदावरी-तट आये । वहाँ इन्द्र ने पहले ही उनके लिए तीन पर्णकुटियाँ बना रखी थीं ।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४९ संमनखा संमनखा और जिह्वा के पुत्र राक्षस कुम्भकस से राम-लक्ष्मण का सामना हो गया। तपस्या से विपुल शक्ति प्राप्त करना उसका उद्देश्य था। ब्रह्मा ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसके लिए एक तलवार फेंक दी। उसने इसे अपना अपमान समझा, अतः उसने तलवार स्वीकार नहीं की। उसी समय लक्ष्मण फल-फूल लेने जङ्गल में गये थे। तलवार पड़ी देखकर उन्होंने उठा ली और यों ही हिलाने लगे। पास ही कुम्भकस भी समाधि में बैठा था। उसकी आँखें खुली थीं। उसे क्रोध आया, दोनों में युद्ध हुआ। लक्ष्मण के हाथ राक्षस मारा गया। उसका पिता जिह्वा भी उसी समय मारा गया। दशकण्ठ वनयात्रा की तैयारी कर रहा था। लङ्का का रक्षण जिह्वा के अधीन था। उसने साहस और बुद्धिमत्ता से सप्ताह तक बिना नींद के लङ्का की रक्षा की थी। प्रकृतिवश नींद आयी, परन्तु सोने से पहले उसने अपना शरीर इतना बढ़ाया कि उसकी जिह्वा ने लङ्का को चारों ओर से घेर लिया जिससे कि उसके सोते समय कोई लङ्का पर चढ़ाई न कर सके। दशकण्ठ वन से लौटा। उस समय आधी रात थी। चारों ओर अन्धकार था। नगरी में घुसने का कोई मार्ग नहीं था। उसने सोचा किसी शत्रु ने नगरी को घेरा है। उसने मार्ग बनाने के लिए चक्र फेंका जो उसकी जिह्वा पर लगा और वह मर गया। पीछे मालूम होने पर उसे बड़ा दुःख हुआ। उसकी बहन संमनखा विलासिनी थी। वैधव्य जीवन उसके लिए असह्य था। वह कुम्भकस को देखने गयी। नये पति की तलाश में थी। सुन्दर स्त्री का वेश बनाकर वह राम के पास पहुँची। उनपर मोहित हो गयी। राम ने उसपर ध्यान नहीं दिया। उसकी आँख सीता पर पड़ी। तो उसने सोचा सीता को समाप्त करने पर राम को उसके आगे झुकना ही पड़ेगा। वह राक्षसी वेष से सीता से लड़ने लगी। राम ने उसे मार भगाया। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट लिये। वह रोमगन नगर गयी। खर से झूठी शिकायत की। खर लड़ने गया। राम ने रामासुर के बाण से मार दिया। दूषक और तिसिर भी मारे गये। सीता-हरण वह झूठ बोलने में दक्ष थी। उसने दशकण्ठ से कहा मैंने जङ्गल में एक सुन्दरी रमणी देखी है। मैं तुम्हारे लिए उसे ला रही थी, लक्ष्मण ने मेरा जङ्ग-भङ्ग कर दिया। सीता के रूप का हाल सुनकर दशकण्ठ मोहित हो गया। मण्डो से राय ली तो उसने बहुत समझाया, पर वह सीता के लिए विह्वल था। उसने मारीच को आदेश दिया कि तुम हरिण का रूप बना कर जाओ और राम तथा लक्ष्मण को सीता से पृथक् कर दो। मारीच ने आज्ञा का पालन किया। सीता ने सुनहला चुलबुला हरिण देखकर राम से उसे पकड़ने को कहा। राम ने समझाया, पर उन्होंने हठ किया। राम ने उसका पीछा किया, वह थक गया एवं राक्षसरूप में प्रकट हो गया। राम ने तीर मारा, वह घायल हो गया। लक्ष्मण बचाओ कह कर वह चिल्लाया। आवाज सीता के कानों में आयी। उसने लक्ष्मण को जाने को कहा। लक्ष्मण समझ गये कि ये राम के शब्द नहीं हैं, पर सीता ताने मारने लगी। अन्त में लक्ष्मण देवों से सीता-की रक्षा की प्रार्थना करते हुए राम की तलाश में चल दिये। दशकण्ठ को अवसर मिला। वह साधु का रूप बनाकर सीता के पास आया। सीता आतिथ्य करने लगी। उसने कहा 'सीते ! तुम मेरी रानी बन जाओ। मैं दशकण्ठ हूँ।' सीता ने उसे कुटी से निकाल दिया। रावण जबरदस्ती सीता को रथ पर बैठा कर चल पड़ा। एक बलिष्ठ पक्षी शतायु ने, जो राम का मित्र था, कहा सीता को छोड़ दो। रावण नहीं माना, उसने युद्ध किया। उसकी सब सेना मार डाली। रावण ने बड़े प्रबल अस्त्रों को छोड़ा, पर वह हँस रहा था, उसपर कुछ असर नहीं होता था। उसने कहा सिवाय उस अंगूठी के जो सीता के हाथ में है मुझपर किसी का प्रभाव नहीं हो सकता। दशकण्ठ ने यह सुनकर सीता के हाथ से अंगूडी छीन ली और पक्षी पर दे मारी जिससे वह गिर गया, परन्तु वह अपनी चोंच में अंगूठी को पकड़े रहा। उसकी आत्मा राम की प्रतीक्षा कर रही थी। दशकण्ठ लङ्का पहुँच गया। उसने सीता को अपने सहस्र पुत्रों के संरक्षण में रख दिया।

३५० रामायणमीमांसा द्वादश मारीच को मार कर राम लौट रहे थे। मार्ग में लक्ष्मण मिले । राम को भय हुआ । उन्होंने समझ लिया कि किसी ने चालाकी से लक्ष्मण को अलग किया है । सीता अकेली छूट गयी होगी । दोनों भाई जल्दी कुटिया की ओर दौड़े । देखा तो आशङ्का ठीक निकली । आनन्दवर्धिनी सीता वहाँ नहीं थी । दोनों बहुत दुःखी हुए । भाग्यवशात् उसी समय इन्द्र आ गये । उन्होंने बताया कि सीता को इस मार्ग से ले जाया गया है । उसी रास्ते राम और लक्ष्मण चल पड़े । आगे घायल शतायु (जटायू) राम की प्रतीक्षा करता हुआ मिला । पक्षी ने राम को सीता की अंगूठी देकर 'दशकण्ठ सीता को ले गया' कह कर प्राण छोड़ दिये । कृतज्ञ राम ने एक बाण छोड़ा जो अर्थी बन गया, दूसरा बाण छोड़ा जिसने आग प्रज्वलित कर पक्षी के शरीर को जला दिया । तीसरा बाण छोड़कर जलती हुई अग्नि को शान्त कर दिया । आगे चल कर राम को राक्षस मिला, जिसका नाम कुम्बल ( कबन्ध ) था । उसको ईश्वर ने शाप दिया था जिससे उसका केवल ऊपरी शरीर ही बन पाया था। शाप मिटने की शर्त यह थी कि जब राम वन में आयेंगे तो इस दोष से मुक्त करेंगे। उसने राम और लक्ष्मण को अपने हाथों में पकड़ कर चबा डालना चाहा, परन्तु उसकः शरीर विचित्र भय से कम्पित हो गया। उसने समझ लिया कि मैंने जिन मनुष्यों को पकड़ा है वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। उसने झट उनको छोड़ दिया । जब उसने राम की विपत्ति का हाल सुना तो उनको परामर्श दिया कि वे किष्किन्धा में राजा वाली से सहायता लें। खिदखिन और जम्बू की सेनाएँ लङ्कापर चढ़ाई कर सीता को छुड़ा लायें । राम ने उसकी बात सुनकर उसको उस योनि से छुड़ाने के लिए तीर छोड़ा और वह मर गया । आगे एक राक्षसी मिली जिसका नाम अशमुखी (अयोमुखी) था। वह भी दोनों भाइयों पर मोहित हो गयी। अपनी माया से चारों ओर अन्धकार फैला कर लक्ष्मण को गोद में लेकर आकाश में उड़ गयी । राम भाई की सहायता के लिए दौड़ न सके, परन्तु राम के बाणों से अन्धकार छिन्न-भिन्न हो गया । लक्ष्मण सावधान हो गये । उन्होंने कुछ मन्त्र पढ़े जिनके प्रभाव से लक्ष्मण सहित वह भूमि पर जा पड़ी। लक्ष्मण ने उसकी भुजाएँ काट डालीं। इसपर वह भाग गयी । वे एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठे । दैवयोग से उसपर हनुमान् बैठे थे । उन्होंने जानना चाहा कि ये दोनों कौन हैं ? हनुमान् ने ध्यान आकर्षित करने के लिए एक शाखा हिलायी । राम थक कर सो गये थे । लक्ष्मण ने बन्दर को भगाना चाहा, क्योंकि वे पहरे पर थे। परन्तु बन्दर नहीं टला, आग्रहपूर्वक शाखा हिलाता रहा। लक्ष्मण ने धनुष उठाया । हनुमान् ने धनुष छीन लिया । इस धृष्टता को देखकर राम को जगाना पड़ा । राम ने ऊपर देखा तो बन्दर के शरीर पर पूर्वोक्त कुण्डल आदि चिह्न दिखाई पड़े। हनुमान् ने देखा कि उसके चिह्नों को राम ने पहचान लिया। यह अवश्य नारायण के अवतार राम हैं। हनुमान् वृक्ष से उतर आये और अपनी सेवाएँ राम को अर्पित कर दीं । राम-सुग्रीव भेंट राम की विपत्ति का हाल सुनकर हनुमान् ने अपने मित्र सुग्रीव से भेंट कराना उचित समझा । कैलास पर्वत का द्वारपाल एक राक्षस नन्दकाल था । ईश्वर की कुछ भक्त अप्सराएँ एक उद्यान में फूल चुनने गयीं । वह राक्षस एक पर मोहित हो गया। अतः उसपर एक पुष्प फेंक दिया। उसकी शिकायत पर ईश्वर ने उसे दरवनामक भैंसा हो जाने का शाप दे दिया और कहा कि तेरा पुत्र तुझे मारेगा तब तेरी मुक्ति होगी । वह भैंसों का सरदार हो गया। वह बहुत सी भैंसों में रहता था। जब कोई नर भैंसा उत्पन्न होता था तो वह उसे मार देता था। एक भैंस गर्भिणी होकर किसी खोह में जा छिपी और वहाँ नर बच्चा पैदा हुआ। उसका नाम दरवी हुआ । उसकी मां ने उसे बाप की स्थिति बता दी । देवों की रक्षा में वह बड़ा हुआ। उसने बाप से युद्ध कर उसे मार दिया । विजय के घमण्ड से वह उद्दण्ड होकर देवताओं से लड़ने के लिए उत्सुक हुआ। देवताओं ने समुद्र देव को बड़ा कहा पर वे लड़ने को तैयार न हुए। उन्होंने उसे ईश्वर के पास भेज दिया । ईश्वर ने कहा तुम वाली के पास जाओ उसके हाथ से मर कर खर के पुत्र मङ्कुरकण्ठ होकर राम के तीर से मारे जाओगे । दरवी

युद्ध के लिए वाली के पास गया, खुले मैदान में दोनों बराबर रहे। दूसरे दिन खोह में लड़ाई होने का निश्चय हुआ। वाली ने सुग्रीव को खोह के द्वार पर नियुक्त करके कहा बहता हुआ रुधिर देखना, रुधिर काला हो तो दरवी का रुधिर होगा। रुधिर का रङ्ग हल्का हो तो समझना वाली मारा गया। उस समय खोह का द्वार बन्द कर तुम चले जाना। सात दिन तक युद्ध होता रहा। अन्त में वाली ने पूछा तुममें इतनी शक्ति कैसे आयी। शक्ति के नशे में कृतज्ञता भूल कर वह बोल उठा मेरी शक्ति मेरे सींगों में है। वाली ने देवताओं से कहा यह कृतघ्न है। इसका साथ छोड़ दो। देवों की सहायता से वञ्चित होते ही वाली के घूंसे से वह मर गया। वर्षा के कारण उसके रक्त का काला रंग फीका हो गया। सुग्रीव को वाली के मरने की भ्रान्ति हो गयी। वह खोह का द्वार पाषाण से बन्द कर चला गया। वाली ने दरवी का सिर काट लिया द्वार पर आया तो द्वार को बन्द पाकर सोचा सुग्रीव मेरी गद्दी लेना चाहता है। क्रोध में दरवी का सिर द्वार के पत्थर पर दे मारा जिससे खोह का द्वार खुल गया। महल में आकर उसने सुग्रीव को निकाल दिया। सुग्रीव जङ्गल में भटक रहा था। हनुमान् से भेंट हो गयी। दोनों साथ- साथ रहने लगे। सुग्रीव ने अपनी गाथा राम को सुनायी। दोनों में यह निश्चय हुआ कि सुग्रीव राम की सहायता से वाली से लड़े और सुग्रीव की सहायता से दशकण्ठ को पराजित कर सीता को वापस लाया जाय।

वाली-वध सुग्रीव ने बताया कि वाली ने प्रतिज्ञा-भङ्ग कर मेरी तारा को धर्मभ्रष्ट किया और ईश्वर का शाप है कि नारायण के अवतार के हाथ उसका वध होगा। वाली को ईश्वर ने एक वर दिया था कि जिस किसी के साथ तुम लड़ोगे उसका आधा बल तुममें आ जायेगा। सुग्रीव को बचाने के लिए राम ने अपने तीरों को जल में भिगोया और जल को सुग्रीव के सिर पर छोड़ दिया। अब किष्किन्धा जाकर सुग्रीव ने वाली को युद्ध करने के लिए ललकारा। राम ने सुग्रीव को वचन दिया था कि लड़ते समय वे वाली को तीर मारेंगे। परन्तु दोनों की कुश्ती होते समय दोनों की तेजी से राम को पहचानना कठिन हुआ। वाली ने शीघ्र ही सुग्रीव को पछाड़ दिया और चक्रवाल पहाड़ पर दे मारा। परन्तु तीर के पवित्र जल ने सुग्रीव की रक्षा की। सुग्रीव ने राम के द्वारा बाण न छोड़ने की शिकायत की। राम ने कहा कि वे वाली को पहचान न सके। सुग्रीव के हाथ में चिह्न बाँध दिया। दूसरे दिन कुश्ती के समय राम ने बाण छोड़ा। बाली ने बाण पकड़ लिया। वाली ने राम को धिक्कारा तब राम ने नारायण रूप धारण कर उसको अपनी प्रतिज्ञा-भङ्ग की याद दिलायी। वाली डर गया, उसने सुग्रीव और अङ्गद को राम की शरण में सौंपा और अपना अन्त करने को तैयार हो गया। राम ने उसकी शर्त को समझा और चाहा कि उसका प्राणान्त न हो। राम ने कहा केवल एक रक्त-बिन्दु दे दो जिससे ब्रह्मास्त्र का प्रभाव बना रहे। तुम्हारे शरीर के बाल के सातवें भाग से अधिक घाव न होगा। परन्तु वाली ने अपमान सूचक घाव को अङ्गीकार नहीं किया और मृत्यु को ही अपनाना उचित समझा, क्योंकि वह यश का पुजारी था। उसने सुग्रीव को रामभक्ति करने का उपदेश दिया और तीर अपने हृदय में वेध कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं।

युद्ध की तैयारी वाली की अन्त्येष्टि और सुग्रीव को गद्दी हुई। राम नगर में नहीं गये। सुग्रीव ने राम से गन्धामास पर्वत पर रहने की प्रार्थना की और स्वयं खिदखिन में सेना एकत्रित करने के लिए गया। राम को गन्धामास में एक मोर मिला, जिसने सीता की सूचना दी। एक बन्दर मिला, जिसकी ओर सीता ने वस्त्र फेंक दिया था कि राम को दे देना। राम ने सात दिन प्रतीक्षा की, लेकिन सुग्रीव के लौटने के कोई लक्षण नहीं दीख पड़े। लक्ष्मण उसकी तलाश में निकले। सुग्रीव ने कहा कि देश में कुछ गड़बड़ मची है। सेना एकत्रित करने में समय लगेगा। प्रातः सुग्रीव और हनुमान् राम से मिले। सुग्रीव ने बताया कि वाली का मित्र जम्बू, मित्र की मृत्यु का बदला लेने के लिए,

३५२ रामायणमीमांसा द्वादश खिदखिन के लोगों को एकत्रित कर रहा है। राम ने पत्र लिख कर उसको बुलाया। जम्बू को पत्र तो मिला, पर उसे विश्वास नहीं हुआ कि राम का ही पत्र है। फिर भी उसने अपनी भक्ति का आश्वासन दिया। हनुमान् इससे सन्तुष्ट नहीं हुए, अतः उन्होंने माया से महल के सब लोगों को सुला दिया और पलंग सहित जम्बू को राम के समक्ष उपस्थित कर दिया। वह जागा तो देखा कि वह नारायण के समक्ष है। उसने निःसंकोच नारायण के प्रति भक्ति प्रकट की। इस तरह जम्बू और सुग्रीव दोनों की सेना इकट्ठी हो गयी। हनुमान् की लङ्का-यात्रा जब सेना की तैयारी हो गयी तब निश्चय हुआ कि हनुमान्, जम्बू, नल तथा नीलवद् की अध्यक्षता में एक परीक्षक दल भेजा जाय । वह सीता के निवास-स्थान का पता लगाये। राम ने हनुमान् को अँगूठी दी और सीता का चीर दिया जिससे सीता जान सके कि यह राम का ही दूत है। हनुमान् को भय था कि शायद वे मुझे शत्रु ही समझें, क्योंकि राक्षस भी इन चिह्नों को कपट से प्राप्त कर सकते हैं। इसपर राम ने मिथिला के महलों की खिड़की में से विवाह के पहले उन दोनों ने एक दूसरे को देखा था और जिस प्रकार दोनों के हृदयों में प्रेम का बीज उगा था इत्यादि ऐसी बातों को बताया जिन्हें वे दोनों ही जानते थे और कोई नहीं। ये लोग उड़ते हुए यमन नगर में आये । वहाँ एक अप्सरा पुष्पमाली दिन काट रही थी। राम के सैनिकों से भेंट होने पर उसकी शाप-मुक्ति होनी थी। हनुमान् ने उससे कहा मैं राम का दूत हूँ; उसे इसमें शङ्का हुई । इसपर हनुमान् ने चतुर्मुखी विराट् रूप दिखाया । उनके चारों मुखों से अनेक सूर्य, चन्द्र तथा तारागण चमकने लगे। पुष्पमाली मान गयी और उसने हनुमान् को लङ्का का रास्ता बता दिया। हनुमान् को उस अप्सरा से प्रेम हो गया। उन्होंने उसे स्वर्ग भेज दिया। वह शाप-मुक्त हो गयी। आगे चलने पर एक अत्यन्त वेगवती नदी मिली, जिसको पार करना कठिन था। हनुमान् ने अपनी पूँछ फैला दी उसी पर चढ़कर सब बन्दर पार हो गये। आगे समुद्र मिला। वह पारावारविहीन था। हनुमान् बोले कि शतायु के समान यशस्वी मृत्यु मुझे प्रिय है, परन्तु यह स्वीकार नहीं कि समुद्र से हार मान लूँ । शतायु का नाम आते ही एक जादू हो गया। निकटस्थ पहाड़ की खोह से समवादी नाम का एक पक्षी निकला जो शतायु का बड़ा भाई था। उसके पर कटे हुए थे। जब शतायु अनजान बालक था तब उसने उषःकाल में खिड़की से सूर्य को देखा तो उसने उसे कोई सुन्दर फल समझा और उसे लेने के लिए उड़ा । भाई को विपत्ति से बचाने के लिए समवादी ने उसको अपने परों में छिपा लिया, अतः सूर्य भगवान् का समस्त क्रोध अपने ही ऊपर ले लिया। उसके समस्त पङ्ख जल गये। सूर्य- नारायण ने कहा कि उसके नये पङ्ख तभी उगेंगे जब राम का दल तीन बार स्वागत-ध्वनि करेगा। अन्त में आज वह अवसर आ ही गया। वह समय हर्ष का भी था, शतायु की मृत्यु का दुःखद समाचार सुना, परन्तु स्वागत-ध्वनि ने नये पर उपजा दिये जिससे नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार हुआ। वह आकाश में उड़ने लगा। कृतज्ञ पक्षी ने कहा कि मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं तुम सबको गन्धशिखर पर ले चलता हूँ, जो हेमतीरन और लङ्का के बीच में है। जब वे वहाँ पहुँचे तो समवादी ने हनुमान् को नीलाचल पर्वत दिखलाया जिसकी ऊँची चोटी आसमान से बात करती थी । हनुमान् ने एक छलाँग मारी और वहाँ से निर्दिष्ट स्थान की ओर उड़े। मार्ग में एक भयानक राक्षसी मिली, जिसको दशकण्ठ ने समुद्र को सुरक्षित रखने के लिए नियुक्त किया था। हनुमान् उसके मुँह में घुस गये और उसकी आँते बाहर निकाल लीं। वह मर गयी । उनकी छलाँग इतनी बड़ी थी कि वे नीलकाल पर्वत के भी आगे बढ़ गये और मौलाह पर्वत पर पहुँच गये, जहाँ नारद ऋषि रहते थे। हनुमान् ने एक रात रहने की अनुमति माँगी, नारद ने एक झोपड़ी बता दी। हनुमान् ने नारद की महत्ता देखने के लिए अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि वह झोपड़ी में न समाये। पर नारदजी की शक्ति से झोपड़ी बढ़ती गयी। नारद ने ऐसी वर्षा बरसायी कि हनुमान् का शरीर ठिठुर कर पहला जैसा ही हो गया। ऋषि हनुमान् को जाड़ा खाते छोड़ कर तालाब में घुस गये। एक लकड़ी

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३५३ को जोंक बना दिया। हनुमान् प्रातः स्नानार्थ घुसे तो वह हनुमान् की दाढ़ी में चिपक गयी। हनुमान् ऋषि की शरण गये, तब वह छूट गयी। लङ्का-दहन हनुमान् लङ्का पहुँच गये। उसके संरक्षक चतुर्भुजी और अष्टभुजी थे। उन्हें मार कर हनुमान् राक्षस के रूप में लङ्का में प्रविष्ट हुए। अँधेरी रात थी। सहस्रपति ब्रह्मा की सृष्टि का सौन्दर्य नहीं दिखता था। हनुमान् ने माया के जोर से सब को सुला दिया। दशकण्ठ के महलों में घुस गये। पर सीता को न पाया। नारद के पास जाकर परामर्श किया। उनके परामर्श से छोटे बन्दर के रूप में वाटिका में घुसे। वहाँ सीता इस प्रकार छिपी थी जिस प्रकार बादलों में चन्द्रमा। फिर रात का समय हुआ तो दशकण्ठ नारायण-पत्नी सीता को मनाने लगा। अनुनय- विनय की, परन्तु सीता के भक्तिपूर्ण शुद्ध हृदय में बुरी भावना नहीं उठ सकती थी। वह निराश होकर लौट गया। सीता ने संतप्त होकर फाँसी लगानी चाही। यह देख हनुमान् चौंक पड़े। वह वृक्ष पर चढ़ गये रस्सी की गाँठ खोल दी। सीता को जीवित जानकर उन्हें प्रसन्नता हुई। उन्होंने सीता को अपना परिचय दिया। सीता को हनुमान् की सत्यता पर विश्वास हुआ तो मुख पर हर्ष के आँसू बहने लगे। हनुमान् ने चाहा कि सीता को अपनी हथेली पर बैठा कर राम के पास ले जायें, परन्तु सीता इसके लिए राजी नहीं हुई। दशकण्ठ द्वारा अपहरण किये जाने से उसका बहुत बड़ा अपमान हो चुका था। वह नहीं चाहती थी कि दूसरी बार वह किसी पुरुष के द्वारा भाग निकले। वह राम के लिए जीवित रहने को तैयार हो गयी। हनुमान् ने दशकण्ठ के बाग के बहुत से पेड़ उखाड़ दिये। बहुत से राक्षस उनपर झपटे पर सब मारे गये। दशकण्ठ के सहस्र कुमार भी कुछ न कर सके। इन्द्रजित् आगे बढ़ा, राक्षस की शक्ति की परीक्षा के लिए इन्द्रजित् की रस्सी से बँध गये। दशकण्ठ के सामने लाये गये। दशकण्ठ ने उनकी वीरता की प्रशंसा की और अपनी सेना में सम्मिलित होने को कहा। हनुमान् ने स्वीकार नहीं किया। राक्षसों ने उनकी पूँछ में रुई लपेट कर आग लगा दी। समस्त शरीर जल उठा। हनुमान् पर्वताकार हो गये। एक झटके से उन्होंने बन्धन तोड़ दिये। एक छत से दूसरी छत पर कूद कूद कर सारी लङ्का जला डाली। रावण का महल जल कर राख हो गया। समुद्र में कूद कर उन्होंने आग बुझायी, परन्तु पूँछ जलती ही रही। नारद से पूछा तो उन्होंने कहा तुझे अपने छोटे से कुएँ का पता नहीं है। हनुमान् समझ गये। पूँछ मुख में रख ली आग बुझ गयी। बाद में अपने साथियों के पास पहुँच कर राम के पास पहुँच गये। राम को सब समाचार सुनाया। राम की सेना लङ्का पर चढ़ायी करने चल पड़ी। समुद्रदेव लङ्का घेरे हुए हलरें मार रहे थे। विसेक (विभीषण) की रामभक्ति लङ्का-दहन से हानि अवश्य हुई थी पर दशकण्ठ निश्चिन्त था, क्योंकि सब देवता उसके वश में थे। उसने स्वप्न में देखा काली चील पश्चिम से आयी और सफेद दक्षिण से आयी, दोनों लड़ पड़ीं। काली मर गयी। उसके शरीर से एक राक्षस उत्पन्न हुआ। उसने यह भी देखा कि नारियल में तेल डाल कर बत्ती रख कर अपने हाथ में लिये एक स्त्री आयी। उसने बत्ती जलायी। बत्ती ने समस्त दीपक को जला दिया। आग हथेली तक पहुँच गयी। उसके शरीर में जलन होने लगी। उसकी आँखें खुल गयीं। वह भय से काँप उठा। सुबह उसने विसेक को बुलाया और स्वप्न का अर्थ पूछा। विसेक ने बताया काली चील दशकण्ठ हैं और सफेद चील राम हैं। नारियल लङ्का है, तेल दशकण्ठ-वंश है, बत्ती दशकण्ठ है, स्त्री समनखा है और ज्वाला सीता है। नक्षत्रों द्वारा दशकण्ठ पर आनेवाली विपत्ति के सूचनार्थ ही स्वप्न है। इसका एक ही उपाय है कि सीता को लौटा कर क्षमा माँग ली जाय। पर रावण ४५

को यह सब नहीं सुहाया। वह विभेक पर क्रुद्ध हुआ। विभेक को लङ्का से निकाल दिया। त्रिजटा को सीता पर पहरा देने को नियुक्त कर दिया। विभेक बन्दरों की छावनी में आया। सेना देख कर उसे आश्चर्य हुआ। सुग्रीव ने बन्दरों को आज्ञा दी। वे अपनी शक्ति प्रदर्शन करें। किसी ने पहाड़ हथेली पर रख लिये, किसी ने सूर्य को छिपाकर संसार को अन्धकारमय बना दिया, किसी ने समुद्र को सुखा डाला और किसी ने प्रलय का तूफान उठा दिया। इसकी खबर दशकण्ठ तक पहुँची। बीसों कान खड़े हो गये। कोलाहल मच गया। दशकण्ठ ने राक्षस शुक्रसर को शक्ति जांचने के लिए भेजा, क्योंकि उन सबको रामसेना की शक्ति पर विश्वास न था। राक्षस चील बन कर गया। वहाँ जाकर बन्दर बन गया। विभेक ने उसे जान लिया एवं हनुमान् को सूचित कर दिया। हनुमान् ने तुरन्त हथेली इतनी बड़ी बना ली मानो वह कोई बड़ा तम्बू हो। उससे सेना को ढंक लिया। सारे बन्दर एक एक करके उसकी अङ्गुलियों की सन्धियों से निकलने लगे। अन्त में शुक्रसर निकला। उससे और बन्दरों से भिन्नता थी। उसकी छाया नहीं पड़ती थी। उसकी आँखों की पलकों में कम्पन नहीं था। वह पहचान लिया गया। उसपर मार पड़ी। उसने जाकर अपने राजा को सब हाल बताया। दशकण्ठ स्वयं साधु बन कर आया। राम ने आतिथ्य सत्कार किया। विभेक ने पहिचान लिया। फिर भी दशकण्ठ ने अपनी माया से उसे गूँगा कर दिया, जिससे वह बोल न सका। दशकण्ठ राम को लङ्का पर चढ़ाई करने से रोकना चाहता था, परन्तु उसका प्रयत्न व्यर्थ हुआ, क्योंकि राम पीछे हटना जानते ही न थे। दशकण्ठ ने विभेक की लड़की बेंजकाया को आज्ञा दी कि तू सीता का रूप धारण कर शत्रुदल के निकट जलधारा में ऐसे तैरने लग जिससे सब समझें कि सीता मर गयी। राम प्रातः स्नान को गये तो वैसे दृश्य देखकर वे बड़े दुःखी हुए। लक्ष्मण भी मृत सीता को देख कर रोने लगे। विभेक, हनुमान् आदि भी वहाँ गये। राम को लगा कि हनुमान् की धृष्टता का ही रावण ने यह बदला चुकाया होगा। हनुमान् सीता की उस लाश को देखते रहे। उन्होंने सोचा यह बहाव के ऊपर की ओर तैर रही है और सड़ी भी नहीं है। हनुमान् की सूचना पर उसे चिता पर रखा गया तब बेंजकाया चीख पड़ी। पवनसुत ने लपक कर उसे पकड़ लिया। सुग्रीव की मार से उसका भेद खुल गया। विभेक की लड़की जान कर राम ने कहा इसका न्याय विभीषण ही करेंगे। विभेक ने निष्पक्ष हो उसे मृत्युदण्ड सुनाया। इससे प्रसन्न होकर राम ने उसे क्षमा प्रदान किया। हनुमान् का उससे प्रेम हो गया। उससे एक पुत्र हुआ जिसका नाम असुरपाद था। सेतुबन्ध सेना पार करने के लिए समुद्र में पुल बाँधने का निर्णय हुआ। काम करने में नीलवद् का हनुमान् से झगड़ा हो गया। राम ने नीलवद् से कहा तुम सुग्रीव के स्थान में राज करो और रसद पहुँचाओ। हनुमान् को सात दिन में पुल तैयार करने की आज्ञा हुई। हनुमान् ने बड़े जोर से काम लगा दिया। दशकण्ठ को पुल बनने का शोर सुनायी पड़ा। उसकी नींद उड़ गयी। उसने अपनी पुत्री स्वर्णमच्छा को पुल में विघ्न डालने को कहा। वह अपनी सहेलियों के साथ समुद्र में डाले गये पत्थरों को समुद्र की तह में लुप्त करने लगी। हनुमान् ने गोता लगा कर सब कुछ जान लिया और उनको वैसा करने से विरत होने को बाध्य कर दिया। हनुमान् का स्वर्णमच्छा से प्रेम हो गया। उससे भी हनुमान् का पुत्र मच्छानु हुआ। पुल तैयार हो गया। इन्द्र ने अपना रथ दिया जिसको मातलि हाँक रहा था। राम पुल से लङ्का पहुँचे। एक हरे भरे स्थान पर जहाँ मखमल के समान घास उगी थी, सेना ने पड़ाव डाला। परन्तु वह एक मायावन था, वहाँ न कोई पक्षी गीत गाता था, न फल खाता था। दशकण्ठ की आज्ञा से भानुराज वानरसेना सहित जंगल को जमीन में धंसा देना चाहता था। हनुमान् यह चाल समझ गये। उन्होंने भूमि के भीतर प्रविष्ट होकर उस भानुराज को एक ही घूंसे से खत्म कर दिया।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३५५ राम ने शान्ति की कामना से अङ्गद को दूत बनाकर भेजा। अनेक राक्षसों को मार कर वे दरबार में पहुँचे। अङ्गद ने रावण के दरबार में दूत के बैठने का स्थान न देख कर अपनी पूंछ बढ़ा कर कुण्डली बना कर दशकण्ठ के मंच से भी ऊँचा स्थान बना लिया। उस गद्दी पर बैठकर राम का संदेश बड़ी तीव्र भाषा में कहना उसने आरम्भ किया। दशकण्ठ को क्रोध आया। उसने अपने चार वीरों को अङ्गद को मारने के लिए नियुक्त किया। अङ्गद ने सबको मार गिराया और अपने पड़ाव पर आ गये। दशकण्ठ ने राम की सेना को मारने के लिए माया रचने का स्वयं भी यत्न किया। ब्रह्मा ने उसको एक छत्र दिया था। उसके खुलने से सूर्य छिप जाता था। जगत्भर में अँधेरा छा जाता था। उसने वह छत्र खोल दिया। चारों ओर अँधेरा छा गया। राम-सेना को लङ्का दिखायी नहीं पड़ती थी, परन्तु सुग्रीव ने आक्रमण करके उस छत्र को तोड़ डाला। सूर्य किरणें फिर निकल आयीं। आकाश से लौटते हुए सुग्रीव ने दशकण्ठ के मुकुटों को छीन कर राम के चरणों पर लाकर रखा। अब रावण चिन्तित होने लगा। राम का हरण दशकण्ठ ने मारीच-पुत्र वैयविक को पाताल भेजा। सहमालिवन के पुत्र मैयराव को लङ्का बुलाया। उससे सभी डरते थे। उसने अपने गुरु सुमेध मुनि से युद्धविद्या के रहस्य सीखे थे। सुमेध मैयराव से बहुत खुश था। उसने मैयराव की आत्मा को उसके शरीर से निकाल कर भौंरे के रूप में त्रिकूट पर्वत पर छिपा दिया था, इससे वह अमर सा हो गया था। उसको मृत्यु का भय न था। उसके पास एक मायावी राख थी जिससे वह नींद बुला सकता था। वह इस राख को लेकर बन्दरों के पड़ाव पर आया। बहुत सावधानी से आने पर भी वह विभीषण की आँख से न बच सका। विपत्ति से बचने का उपाय सोच लिया गया। हनुमान् ने ब्रह्मा के बराबर मुख बनाकर उसमें राम को रख लिया। फिर भी मैयराव की माया के सामने उसकी कुछ न चल सकी। मैयराव बन्दर बन कर बन्दरों में मिल गया। वहाँ उसे मालूम हुआ कि विभेक पहले ही सचेत कर रहा था कि यह माया प्रातःकाल के पूर्व ही समाप्त हो जावेगी। मैयराव के पास एक बाँसुरी थी। वह सेनादल को छोड़कर पहाड़ पर चढ़ गया और वहाँ उसने अपनी बाँसुरी उठायी। माया के बल से आकाश एक स्थिर समुद्र जैसा दिखाई पड़ने लगा। प्रातःकाल के तारे चमकने लगे, बन्दरों ने हर्ष मनाते हुए सोचा कि वह रात बीत गयी। निश्चिन्त होकर पहरे ढीले कर दिये। मैयराव अपनी माया की राख लेकर आया और बाँसुरी बजाने लगा। धीरे-धीरे सब बन्दरों को नींद आ गयी। सुग्रीव सोया पड़ा था। हनुमान् निर्जीव से दिखायी पड़ते थे। सीता के प्राणप्रिय राम भी बेहोश थे। सबको बेहोश देख मैयराव धीरे-धीरे आया। राम को उठाकर पाताल ले गया। बन्दर जागे तो विपत्ति का पता लगा, पर विभेक तो अपने दिव्य चक्षु से अदृश्य को भी देख रहा था। विभेक के बताये मार्ग से हनुमान् दौड़े। एक तालाब पर पहुँचे। उसमें कमल खिले थे। उन्होंने एक कमल का पत्ता तोड़ा, उसके डंठल में एक खोखला मार्ग दिखायी दिया। हनुमान् उसमें होकर एक दीवार के पास पहुँचे, जहाँ एक राक्षस पहरा दे रहा था। उसे हनुमान् ने लात से मारा, वह मर गया और दीवार टूट गयी। हनुमान् आगे बढ़े। वहाँ एक मदमत्त हाथी मिला। हनुमान् ने उसको पछाड़ दिया। पुनश्च आगे बढ़े, एक पर्वत मिला, जिसपर आग की ज्वाला धधक रही थी। उन्होंने लात मार कर पर्वत की आग बुझा दी। फिर आगे बढ़े, मच्छर मिले जो मुर्गों के बराबर थे। हनुमान् थके नहीं बढ़ते गये। एक अन्य तालाब मिला। उसमें कमल खिले थे। वहाँ एक ऐसे व्यक्ति का मुकाबला करना पड़ा जो उनके जोड़ का था। इसपर हनुमान् के पुत्र मच्छानु का पहरा था। सुवर्णम छा उसे तट पर छोड़कर चली गयी थी। मैयराव ने उसे पाला था। पिता और पुत्र का भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध होता रहा पर किसी की विजय नहीं हुई। दोनों एक दूसरे की वीरता से चकित रह गये। पूछने पर दोनों पिता-पुत्र निकले। दोनों में युद्ध के बदले प्रेम हो गया। हनुमान् ने पाताल आने का प्रयोजन बताया। मच्छानु

कृतघ्न न था। वह अपने पालक पिता का भेद बताने को तैयार न था पर वह अपने पिता को भी निराश नहीं कर सकता था। अजी, मार्ग तो दीखता है उसी पर क्यों नहीं चलते। हनुमान् समझ गये, उन्होंने एक कमल तोड़ा उसमें एक खोखला मार्ग दिखायी पड़ा। उसी मार्ग से वे पाताल पहुँच गये। उन्हें एक रोती हुई स्त्री के विलाप की ध्वनि सुनायी पड़ी जो समस्त पाताल में गूँज रही थी। वह मैयराव की बहन बीरबक्कन थी, जो पुत्र के लिए शोक कर रही थी। उसको आज्ञा हुई थी कि वह एक कड़ाही चढ़ाये उसमें अपने पुत्र वैयविक को राम के साथ भून डाले, परन्तु कोई माता अपने ही पुत्र को कैसे भूनती ? वह रोती पीटती कड़ाही चढ़ा कर पानी डाल रही थी। चुपके से हनुमान् आ गये। उन्होंने ढाढस दिया और कहा कि यदि तुम मुझे वहाँ ले चलो जहाँ राम को रखा गया है तो मैं तुम्हारे पुत्र की जान बचा दूंगा। यह काम कठिन था, क्योंकि बड़े-बड़े बलवान् राक्षस पहरा दे रहे थे यहाँ से गुजरने पर सबको एक तराजू पर तुलना पड़ता था। वह इतना बारीक था कि उसपर बाल बराबर भेद भी मालूम हो जाता था। तिल भर भी बोझ बढ़ने पर मौत निश्चित थी। फिर भी हनुमान् ने फाटक पर ले चलने का आग्रह किया। हनुमान् ने एक बारीक कमलतन्तु का रूप धारण कर लिया। उसके वस्त्र में लग गये, परन्तु जब वह राक्षसी तराजू पर रखी गयी तो तराजू टूट गया, राक्षसों ने उसे मारने को तलवार उठायी। वह चिल्लायी कि मेरा कोई दोष नहीं है, मेरे पास कुछ नहीं है। तलाशी में कमलतन्तु के सिवा और कुछ भी न निकला, अतः उन्होंने उसे जाने दिया। हनुमान् वहाँ पहुँचे, ताड़ वृक्षों में लोहे का पिंजड़ा रखा था उसमें राम पड़े सो रहे थे। उन्हें कुछ पता नहीं था। रामभक्त हनुमान् ने उन्हें धीरे से उठाया और सुरक्षित स्थान पर रख दिया। वे स्वयं मैयराव की खोज में चले। वह मिल गया। दोनों में इतना घोर युद्ध हुआ कि पाताल हिल गया। हनुमान् ताड़ वृक्षों से उसे मारते थे पर उसपर असर नहीं होता था। उस समय बीरबक्कन ने स्मरण दिलाया कि उसकी आत्मा त्रिकूट में भौंरे के रूप में छिपी है। हनुमान् ने अपना शरीर बढ़ाया, अपना हाथ त्रिकूट तक फैलाया। भौंरे के रूप में छिपी उसकी आत्मा को मसल डाला। भौंरे के मरते ही मैयराव प्राणहीन हो गया। हनुमान् ने वैयविक को पाताल की गद्दी दी, मच्छानु को युवराज बनाया और राम को लेकर बन्दरों की छावनी में आ गये। सबको बड़ी खुशी हुई, पर राक्षसों को इससे अवर्णनीय दुःख हुआ।

कुम्भकर्ण

दशकण्ठ मैयराव के मरने से काँप उठा। उसने कुम्भकर्ण से मैयराव का बदला चुकाने के लिए कहा। उसको न्याय में श्रद्धा थी, वह सीता को लौटाने के पक्ष में था। दशकण्ठ ने कहा तू राम से डरता है। वह अस्त्र उठाकर भाई की सहायता के लिए तैयार हो गया। विभेक हाथ जोड़ कर आगे बढ़ा, पर कुम्भकर्ण न्यायप्रिय होने पर भी राजा और देश से मुंह नहीं मोड़ सकता था। उसने विभेक से कहा तुम्हारे पास यही बहाना है कि राम नारायण के अवतार हैं, पर मैं तब यह मानूंगा जब मेरे प्रश्न का समाधान करें। मूर्ख साधु कौन ? सीधे दाँत का हाथी कौन ? चालाक स्त्री कौन ? दुष्ट मनुष्य कौन ? पर इसका उत्तर किसी को नहीं सूझा। अङ्गद कुम्भकर्ण के पास भेजा गया कि वह उससे ही उत्तर लाये। अङ्गद ने कहा राम उत्तर जानते हैं, पर सही उत्तर से मिलाना चाहते हैं। कुम्भकर्ण ने राम की खिल्ली उड़ा कर अभिमान से कहा मूर्ख साधु आदमी तो स्वयं राम हैं, जो सीता को जंगल में छोड़कर चले गये। सीधे दाँतवाला हाथी दशकण्ठ है जो अपनी स्त्री से सन्तुष्ट न होकर अन्य पर दृष्टि डालता है। चालाक स्त्री सम्मनखा है। दुष्ट मनुष्य विभेक है जो अपने देश और नरेश का विरोधी है। सुग्रीव कुम्भकर्ण का युद्ध हुआ। सुग्रीव अत्यधिक बलवान् थे। वह पर्वत से विशाल वृक्ष उखाड़ कर लड़ने लगे। सुग्रीव थक गये उन्हें बगल में दबाकर कुम्भकर्ण लङ्का को चल पड़ा। हनुमान् सहायता के लिए दौड़ पड़े। कुम्भकर्ण हनुमान् का मुकाबला न कर सका। सुग्रीव को वहीं छोड़कर लङ्का भाग गया। हनुमान्

ने उसके नाक-कान नोच लिये । अन्त में यश की रक्षा के लिए अपनी मोक्खशक्ति महान् अस्त्र छोड़ने को तैयार हुआ, पर उसके पहले देवों की आराधना आवश्यक थी । इसलिए वह शुभ मुहूर्त में नदी किनारे अनुष्ठान करने लगा । हवन की सुगन्ध फैल गयी, फूल खिल गये, अस्त्र सामने था एवं वह समाधि लगाये बैठा था । कुम्भकर्ण की आँख खुल गयी । दुर्गन्ध से वह घबड़ा गया । देखा तो एक मृत कुत्ता नदी में बहा आ रहा है । कौए नोचकर माँस खा रहे हैं, पर यह विभेक की माया थी । विभेक ने अपने शीशे से कुम्भकर्ण का अभिप्राय जान लिया था । हनुमान् मृत कुत्ता बन गये एवं अङ्गद कौआ । कुम्भकर्ण की समाधि टूट गयी, अतः अस्त्र के महत्त्व का लाभ नहीं मिला । फिर भी वह निराश नहीं हुआ । मोक्खशक्ति लेकर शत्रुदल पर टूट पड़ा । लक्ष्मण ने सामना किया । मोक्खशक्ति लक्ष्मण के शरीर में घुस गयी । पर विभेक ने उपाय निकाल लिया । हनुमान् को स्वयं पर्वत भेजकर अमरबूटी मँगवायी और साथ ही यह कहा कि सूर्य निकलते ही उसका प्रभाव नष्ट हो जायगा । हनुमान् उड़ पड़े । उनके श्वेत अङ्ग पर लाली आ गयी । पता चला सूर्योदय होना ही चाहता है । वैसा होने पर आशाओं पर पानी फिर जाता । वह सूर्य का रथ रोकने के लिए आगे बढ़े, पर सूर्य के ताप से झुलस गये । सूर्य को भेद मालूम हुआ । उनको पश्चात्ताप हुआ कि रामदूत को भ्रम से क्षति पहुँची । सूर्य ने हनुमान् के शरीर को स्वस्थ कर दिया । हनुमान् ने गति मन्द करने की सूर्य से प्रार्थना की । मानवी घृणा या दुःख सृष्टि के नियम को रोक नहीं सकते; परन्तु सूर्य ने कहा मैं चलता तो रहूँगा पर बादलों की ओट में रहूँगा । हनुमान् आगे बढ़े, अमर बूटी को आवाज दी । उसने कहा मैं यहाँ हूँ । वहाँ गये, तो कहा मैं इधर हूँ । हनुमान् हैरान हो गये । हनुमान् ने शरीर बढ़ाकर सारा पर्वत पूँछ से लपेट 'लिया जिधर से आवाज आई वहीं से उन्होंने बूटी उखाड़ ली । बूटी तो मिल गयी, पर पाँच नदियों का जल भी चाहिये था । अयोध्या भरत के अधिकार में थी । हनुमान् डरना तो जानते ही न थे । तुरन्त अयोध्या दौड़ गये । जल लाये, बूटी आयी । लक्ष्मण स्वस्थ हो गये । लक्ष्मण के स्वस्थ होने पर राम की सेना में हर्ष फैल गया । कुम्भकर्ण ने ब्रह्मा जैसा शरीर बढ़ाकर पहाड़ की उस नदी को रोक दिया जिससे सेना पानी लेती थी । वह सात दिनों तक नदी रोके रहा । बन्दर प्यास से मरने लगे । विभेक जान गया कि कुम्भकर्ण का काम है । परन्तु उसे पता नहीं था कि वह कहाँ है । उसकी फूलदासियों को ही पता था । विभेक की सूचना पर हनुमान् चील बनकर उड़ गये । एक फूलदासी को मार डाला और उसका रूप धारण कर अन्य फूलदासियों के साथ वहाँ पहुँचे जहाँ वह पानी रोके पड़ा था । वहाँ पहुँच कर हनुमान् ने अपने रूप में प्रकट होकर कुम्भकर्ण को ऐसी लात मारी कि वह खड़ा हो गया । पानी बहने लगा । प्यासे बन्दरों की मृत्यु टल गयी । कुम्भकर्ण हनुमान् का सामना न कर सका । दूसरे दिन राम ने उसका सामना किया और वह नारायण के ब्रह्मास्त्र से मर गया । मरते समय उसने देखा साक्षात् नारायण चारों हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और त्रिशूल लिये हैं । उन्होंने पश्चात्तापशील रामभक्त के लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया ।

लक्ष्मण-इन्द्रजित् का युद्ध

इन्द्रजित् मण्डो का पुत्र था । ईश्वर से ब्रह्मपाश, ब्रह्मा से नागपाश तथा विष्णु से विष्णुयन उसे प्राप्त थे । इन्हीं अस्त्रों के बल पर उसने इन्द्र को जीता था । लक्ष्मण ने उसका सामना किया । भयंकर युद्ध हुआ । यह पहला अवसर था । जब वह विजय के बिना रणक्षेत्र से लौटा था । उसने कुम्भनीय यज्ञ से अस्त्र-शक्तियों को जगाना चाहा । वह आकाशगिरि में जाकर यज्ञ करने लगा । लड़का की रक्षा में मङ्कुकण्ठ खरपुत्र, जो पिछले जन्म में दरवी था, नियुक्त हुआ । उसने खूब युद्ध किया और राम के हाथ मारा गया । विभेक ने इन्द्रजित् के यज्ञ में बाधा डालने के लिए सब उपाय बना दिये । जिस वृक्ष के नीचे वह यज्ञ करता है, यदि कोई रीछ उसे तोड़ दे तो यज्ञभङ्ग हो जायगा । जम्बूवान ने यह काम अपने ऊपर लिया । रीछ का रूप धारण कर वह वहाँ पहुँचा । इन्द्रजित् ध्यानमग्न था । मन्त्रों के प्रभाव से संसार भर के सर्प नागपाश को घोर विषैला बनाने हेतु अपना विष प्रदान कर रहे थे । इतने में वृक्ष टूट

गया। सर्पों ने समझा गरुड़ आ गये, वे सब भूमि में समा गये। जाम्बवान आकाश में उड़ कर राम-सेना में पहुँच गये। विघ्न के कारण इन्द्रजित् प्रसुप्तशक्ति बाणों को ही लेकर युद्ध के लिए चल पड़ा। उसने बड़ी शक्ति से राम-सेना पर आक्रमण किया, परन्तु लक्ष्मण के सामने राक्षस मरने लगे। घोर युद्ध हुआ। किसी की जीत निश्चित नहीं थी। इन्द्रजित् ने विरूपमुख को परामर्श दिया कि वह इन्द्रजित् का रूप धारण कर उसकी सेना को लेकर लड़ाई करता रहे और आकाश में जाकर नागपाश को छोड़ दे। लक्ष्मण को इसका पता लगने न पाये। शीघ्र वैसा ही हुआ। असली इन्द्रजित् को अवसर मिल गया, नागपाश से सैकड़ों साँप निकल पड़े और विष छोड़ने लगे। सेना के वानर तथा लक्ष्मण सब साँपों की लपेट में आकर बेहोश हो गये। इन्द्रजित् विजय-दुन्दुभि बजाता हुआ घर लौट गया। वानर और लक्ष्मण सब रणक्षेत्र में पड़े रहे। राम रणस्थल पर पहुँचे तो विभेष की प्रेरणा से राम ने अपना क्षैब्रत तीर आकाश में छोड़ा। फलस्वरूप गरुड़ आ गये और सर्पों का सफाया करने लगे। लक्ष्मण और उनके साथी बन्दर ऐसे उठे मानो वे सो कर उठे हों। इन्द्रजित् को आश्चर्य हुआ। फिर भी इन सबको मौत के जबड़ों में रखने के लिए वह समुद्रतट पर जाकर अस्त्रशक्ति जाग्रत् करने के लिए ईश्वर की आराधना करने लगा। हनुमान् ने इसी बीच कम्पन को मारा। दशकण्ठ ने उसकी सूचना इन्द्रजित् को दी। इस अशुभ समाचार से इन्द्रजित् का यज्ञ खण्डित हो गया। अब एक ही उपाय था कि कृष्ण गोवलि से पाशशक्ति जाग्रत् करे। वैसा करके उसने पाशशक्ति जाग्रत् कर ली। अजेय ब्रह्मास्त्र को लेकर उसने आक्रमण किया। माया के बल से इन्द्रजित् इन्द्र बन गया। देवगणों से आवृत इन्द्र के द्वारा रणक्षेत्र में स्वर्ग का-सा दृश्य आ गया। लक्ष्मण तथा वानर जो कार्य कर रहे थे क्षण भर के लिए वह भूल गये कि हम स्वर्ग में हैं या रणक्षेत्र में। उसने ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण पर छोड़ दिया। समस्त सेना धराशायी हो गयी पर हनुमान् जीवित थे। उन्होंने देख लिया अस्त्र किसने छोड़ा। उन्होंने आकाश में छलाँग मार कर नकली इन्द्र के ऐरावत की गर्दन तोड़ दी। पर इन्द्रजित् ने ऐसा घूंसा मारा कि हनुमान् भूमि पर गिर पड़े। वह विजय का डंका पीटकर घर चला गया। राम घटना स्थल पर पहुँच कर लक्ष्मण तथा सेना का हाल देखकर मूच्छित हो गये। सारा रणक्षेत्र श्मशान हो गया। रावण ने प्रसन्न होकर सीता को समाचार भेजा कि तुम्हारे पति का अन्त हो गया है तथा वानर-सेना नष्ट हो गयी है, तुम चाहो तो देख लो। त्रिजटा के साथ सीता पुष्पक पर चढ़ कर घटना-स्थल पर पहुँचीं। वहाँ का भयानक दृश्य देखकर अयोध्या-नरेश राम की लाश पड़ी है, लक्ष्मण पड़े हैं —सीता का हृदय व्याकुल होकर फटने लगा, पर त्रिजटा ने कहा ध्यान से देखो। राम मूच्छित हैं, मरे नहीं हैं। पुष्पक विमान विधवा को लेकर उड़ नहीं सकता। मण्डो ने इस बात की परीक्षा ली थी। सीता विमान पर बैठ गयी। विमान उड़ गया सीता अशोकवाटिका में आ गयीं। सीता को विश्वास हो गया कि राम मरे नहीं हैं। एक न एक दिन मेरा दुःख दूर करेंगे। विभेष कहीं काम से गये थे। लौटने पर उन्होंने सेना की यह दुर्गति देखी, पर वे निराश नहीं हुए। वह जानते थे कि हनुमान् को ईश्वर की ओर से अमरत्व का वरदान मिला है। उन्होंने एक मन्त्र पढ़कर हनुमान् की ओर फूँक मारी। हनुमान् ने आँखें खोल दीं। उन्हें परिस्थिति का ज्ञान हो गया। वे उठ खड़े हुए। रात का समय था। पड़ी हुई लाशों पर ओस की बूंदों का अमृततुल्य प्रभाव पड़ रहा था। एक एक करके सैनिक उठने लगे, पर लक्ष्मण और ब्रह्मपाश से आहत सैनिक अभी पड़े ही थे। ब्रह्मास्त्र के व्रणों का इलाज विदेह देश के आबुद्ध पर्वत की बूटियाँ ही थीं। उनका ज्ञान जाम्बवान को ही था, क्योंकि ईश्वर सेवा के समय उसे उनका परिचय हुआ था। बूटी के ऊपर एक चक्र घूमता रहता था। बूटी लेनेवाले को वह मार देता था। हनुमान् ही उसे ला सकते थे। हनुमान् दौड़कर उस पर्वत पर पहुँचे। वे जब वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि चाँद छिप गया। आकाश में अन्धकार हो गया। उन्होंने पूरा पहाड़ उठा लिया, पर पहाड़ रखा कहाँ जाय? लङ्का तो जङ्गम द्वीप था, उस पर पर्वत का टिकना संभव नहीं था। उसे उत्तर दिशा में रखा गया। उन बूटियों की सुगन्ध लगने से ब्रह्मास्त्र द्वारा मूच्छित सैनिक जागने लगे। लक्ष्मण एवं उनके साथी सब जी उठे। इन्द्रजित् चिन्तित हुआ, पर उसने सोचा