रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 440, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाहते हैं। पर शायद दशकण्ठ हमको स्वीकार न करें, क्योंकि हमने उनके भाइयों और पुत्रों का वध किया है। गुरुजी ! आप कृपा कर हमें साथ ले चलें। हमको उनसे मिला दें। यह कहकर हनुमान् फिर रोने लगे। आँसुओं की धारा उनके मुख पर बह चली। यह देख गोपुत्र राजी हो गया और वे सब दशकण्ठ के महल की ओर चल पड़े। हनुमान् ने कहा गुरुजी आत्मा के पिंजड़े को घर पर न छोड़िये। राम उसकी ताक में हैं। अवसर मिलते ही उड़ा ले जायगा, अतः इसको साथ ही रखना चाहिये। वह हनुमान् की बातों में आ गया और पिंजड़ा ले लिया। लङ्का के राक्षस हनुमान् को देखकर डर गये। हनुमान् की उपस्थिति से लङ्का में तूफान आ गया। पर आगे चलने पर विचार हुआ कि दशकण्ठ के पास पिंजड़ा कैसे ले जाया जाय। जैसे पक्षी अपने घोंसले को देखकर उसमें भाग जाता है इसी प्रकार दशकण्ठ की आत्मा उसकी देह में घुस जायगी। हनुमान् ने सुझाया कि आत्मा का पिंजड़ा अङ्गद के हाथ में छोड़ दिया जाय। आप और हम नगर के अन्दर चलें। लौट कर फिर इसे ले लेंगे। इस तरह पिंजड़ा अङ्गद के हाथ में देकर दोनों चल पड़े। चलते-चलते अचानक हनुमान् बोले गुरुजी आप चलिये, मैं अङ्गद को एक बात बता आऊँ कि उसे सावधान रहना चाहिये। कहीं अकेला पाकर शत्रु समझ कर राक्षस उसे मार न डालें। इस बहाने से अङ्गद के पास जाकर नकली पिंजड़ा बनाकर अङ्गद को दिया और बोले असली पिंजड़े को ले जाकर समुद्र के तट पर गाड़ दो। यहाँ आकर नकली पिंजड़ा गुरुजी को दे देना। यह कहकर गुरुजी के साथ दशकण्ठ के पास पहुँच गये। उसके सामने भी राम के दुर्व्यवहार की कहानी सुनायी। वह बोला, क्या लङ्का जलाने का यही पुरस्कार है ? स्नान करने का अंगोछा पकड़ा दिया। दशकण्ठ उछल पड़ा तालियाँ बजाता हुआ खुश होकर बोला आज से तू मेरा धर्मपुत्र हुआ। वह भी हनुमान् का छद्म नहीं जान सका। हनुमान् खुश थे। दूसरे दिन हनुमान् ने कहा आज मैं अकेला ही राम और उनकी सेना से लड़ूँगा। दोनों को पकड़ लेना कोई कठिन काम नहीं है। हनुमान् को रावण की ओर से लड़ता देखकर बन्दर डरकर भागने लगे। लक्ष्मण अकेले रह गये उनको भी इस षड्यन्त्र का पता नहीं था। लक्ष्मण साश्चर्य हनुमान् से लड़ने लगे। हनुमान् झूठमूठ का युद्ध करते रहे। संध्या को युद्ध रुक गया। हनुमान् लङ्कापति के पास पहुँचे और अपनी बड़ाई की डींग मारने लगे। महाराज, सब बन्दर भाग गये। संध्या न होती तो आज ही राम और लक्ष्मण को पकड़ लाता। आप के चरणों में उपस्थित कर देता। दश- कण्ठ हर्ष से फूल गया। पुरस्कार के रूप में इन्द्रजित् की सब सम्पत्ति दे दी। उसकी असली स्त्री को भी हनुमान् के हवाले कर दिया। प्रातः पुनः रणभेरी बजी। इस बार दशकण्ठ भी हनुमान् के साथ हो लिये। निश्चित हुआ कि हनुमान् आकाश में अँधेरा उत्पन्न कर राम और लक्ष्मण को ले जाय। दशकण्ठ पीछे से समस्त दल को नष्ट कर दे। पर जैसे ही हनुमान् आकाश में पहुँचे एक जँभाई ली, उनके मुख में चाँद और सूर्य चमकने लगे। अङ्गद खड़ा समुद्र तट पर देख रहा था। वह कूदा और आत्मा का पिंजरा हनुमान् के हाथ में दिया। हनुमान् ने पिंजरा लाकर राम के हवाले कर दिया। राम हर्ष और कृतज्ञता से फूले न समाये। लक्ष्मण बोल उठे आकाश के तारे गिने जा सकते हैं, समुद्र की थाह लेना भी आसान है, पर हनुमान् की बुद्धि की प्रशंसा करना कठिन है। राम ने कहा हनुमान् रत्नों का रत्न है। तीनों लोकों में हनुमान् जैसा कोई नहीं मिल सकता। यह तय हुआ कि राम ब्रह्मास्त्र छोड़ें और हनुमान् आत्मा पिजड़े को तोड़ दें। दशकण्ठ हनुमान् की गतिविधि देखकर दंग रह गया और कृतघ्न तथा विश्वासघाती कह कर हनुमान् को धिक्कारने लगा। हनुमान् ने कहा पिंजरा तब दूँगा जब तुम सीता को लौटा दोगे। दशकण्ठ ने यह स्वीकार नहीं किया और मण्डो से मिलने के लिए लौट पड़ा। महलों में जाकर मण्डो से मिला और प्रातः उससे विदा लेना चाहा। मण्डो ने सीता को लौटा देने की सलाह दी, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। वह युद्ध के लिए चल पड़ा। राम से मुठभेड़ हुई। उसने एक अस्त्र छोड़ा उसमें से फूल निकल कर राम के चारों तरफ गिरने लगे। राम ने चकित होकर देखा सामने इन्द्र हैं। रावण इन्द्र के समान सुन्दर रूप धारण